इस गांव में लोग क्यों नहीं बेचते दूध?

पुनः संशोधित शुक्रवार, 3 अगस्त 2018 (12:04 IST)
आगरा में विश्व प्रसिद्ध ताजमहल से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक गांव है, कुआंखेडा। यहां लोग पालते जरूर हैं लेकिन नहीं बेचते। पर ऐसा क्यों?

गांव बिल्कुल वैसा ही है जैसा उत्तर भारत के अन्य गांव होते हैं, यानी ज्यादातर लोग खेती और पशुपालन करने वाले। लेकिन इस गांव की एक खास बात यह है कि गाय-भैंस पालने के बावजूद यहां के किसी व्यक्ति ने आज तक दूध का व्यवसाय नहीं किया है।


गांव में पहुंचने पर पता चला कि यह परंपरा तब से चली आ रही है जबसे यह गांव बसा है। 65 वर्षीय कलप सिंह के घर के भीतर एक कोने पर तीन भैंसें और एक भैंस का बच्चा बंधा है। वह कहते हैं, "नौ पीढ़ी से तो हम जानते हैं कि आज तक इस गांव में किसी ने दूध नहीं बेचा। गाय-भैंस सब पालते हैं लेकिन दूध कोई नहीं बेचता। दूध का घी बनाकर जरूर बेचते हैं लेकिन दूध नहीं। दूध हम लोग पीते हैं, जिनके घर नहीं है उनके यहां पहुंचा देते हैं और ज्यादा हुआ तो दूसरे गांव वालों को भी दे आते हैं, लेकिन उसका पैसा नहीं लेते।"

करीब पांच हजार की आबादी वाला यह गांव आगरा से बिल्कुल लगा हुआ है। यूं तो शहर से इसकी दूरी दस किलोमीटर है लेकिन शहर इस गांव के पास तक फैला हुआ है। गांव के ज्यादातर घर पक्के हैं और ऐसा शायद ही कोई घर हो जहां गाय या भैंस न पली हों। हालांकि लोग गाय की तुलना में भैंस ज्यादा पालते हैं, लेकिन दूध न तो गाय का बेचा जाता है और न ही भैंस का।


ऐसा क्यों है, इस बारे में गांव के प्रधान राजेंद्र सिंह बताते हैं, "बड़े बुजुर्ग ऐसा करते चले आ रहे हैं तो हम लोग भी नहीं बेचते। बाकी कहा यह जाता है कि बहुत पहले एक बाबा थे जो बहुत बड़े गोभक्त थे। वो हमारे गांव आए तो उन्होंने कहा कि आप लोग दूध का व्यापार कभी मत करना, नहीं तो बड़ी आफत आ जाएगी।"

एक अन्य बुजुर्ग राम प्रवेश पहले बिजली विभाग में नौकरी करते थे। करीब दस साल पहले वे रिटायर हो गए। वे बताते हैं, "साधु ने लोगों को तीन काम करने से मना किया था- दूध-दही बेचना, जुआ खेलना और बेड़नी की होरी। अब तक तो इस गांव में ये तीनों काम नहीं हुए, अब आगे नई पीढ़ी क्या करती है, हम नहीं कह सकते।" बेड़नी की होरी का मतलब है देह व्यापार।


गांव के ही रहने वाले श्रीनिवास आगरा में एक होटल में नौकरी करते हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या वे लोग इसे अंधविश्वास नहीं मानते, श्रीनिवास कहते हैं, "अंधविश्वास नहीं है, यह तो हमने प्रत्यक्ष देखा है कि जिन लोगों ने दूध बेचा, उनका नुकसान हुआ। दूसरे किसी बात की कोई कमी भी नहीं है लोगों को कि दूध बेचकर कमाई करें।"

गांव के ज्यादातर लोग खेती-किसानी ही करते हैं। हालांकि कई लोग सरकारी नौकरी में भी हैं और कुछ आगरा और दिल्ली में प्राइवेट नौकरी में भी लगे हैं। चाहे कोई गांव में रहता हो या न रहता हो, गांव वालों के मुताबिक, इस परंपरा पर सब अमल करते हैं। हालांकि सरकारी अमले में इस बारे में किसी को कोई खास जानकारी नहीं है। पूछने पर सरकारी अधिकारी आश्चर्य में पड़ जाते हैं।


गांव वालों के मुताबिक वे दूध खरीद सकते हैं लेकिन बेच नहीं सकते। यही नहीं, गांव के रहने वाले इस गांव के बाहर जाकर भी दूध नहीं बेचते। इस बारे में गांव के कुछ लोग किसी फौजी का उदाहरण देते हैं कि उन्होंने इसे अंधविश्वास मान कर गाय-भैंस पालीं और दूध बेचना शुरू किया लेकिन उनके मवेशियों ने दूध देना बंद कर दिया और बाद में उस फौजी को और भी कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा।

लखनऊ के एक कॉलेज में समाजशास्त्र पढ़ाने वाले प्रशांत कुमार इस बारे में कहते हैं, "देश भर में ऐसी तमाम मान्यताएं हैं जिन्हें अंधविश्वास की श्रेणी में रखा जा सकता है, लेकिन अब लोग मान रहे हैं तो क्या किया जा सकता है? ये लोग जो भी उदाहरण दे रहे हों, उसके पीछे दूध का बेचना या न बेचना कोई कारण नहीं हो सकता लेकिन ऐसे उदाहरण इनके अंधविश्वास को और पुख्ता कर देते हैं।"

गांव से कुछ दूर पर ही टोरा थाने पर एक पुलिस कॉन्स्टेबल ने बताया कि मैनपुरी जिले में भी एक ऐसा ही गांव है जहां "सदियों से" लोगों ने दूध नहीं बेचा है। यानी कुआंखेडा गांव अकेला ऐसा नहीं है जहां इस तरह की मान्यता है, बल्कि देश भर में और भी कई गांव या कस्बे हैं।


गांव के बुजुर्गों की तो छोड़िए, युवाओं में भी ये मान्यता घर कर गई है कि यदि वो दूध बेचेंगे तो उनके साथ कोई अनिष्ट हो सकता है। यही नहीं, एक दिलचस्प बात यह भी है कि इतने बड़े गांव में कोई चाय की दुकान नहीं है। लोगों के मुताबिक ऐसा इसलिए है क्योंकि चाय की दुकान दूध के बिना चल नहीं सकती और दूध खरीदने के लिए किसी और गांव में जाना होगा।

रिपोर्ट समीर मिश्रा


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