26/11 के 10 साल बाद भी दर्द बाकी है

पुनः संशोधित सोमवार, 26 नवंबर 2018 (11:52 IST)
10 साल पहले आज ही के दिन मुंबई पर आतंकवादियों ने हमला कर 166 लोगों की जान ले ली थी। तीन दिन तक शहर मानो बंधक बना रहा। इस घटना के बाद बहुत से लोगों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। पांच ऐसे ही लोगों की कहानी...

वीजू चौहान
वीजू चौहान 26 नवंबर की रात कामा एंड एल्बलेस हॉस्पिटल में लेबर पेन के कारण भर्ती थीं। हथियारों से लैस दो आतंकवादी इमारत के गलियारे में घुस गए। इस बीच आठ दूसरे आतंकवादियों ने शहर की रफ्तार रोक दी थी। इसी बीच वीजू ने अपनी बेटी तेजस्विनी को चुपके से जन्म दिया। वो बताती है, "हमें नहीं लगा था कि जिंदा बचेंगे, नर्स ने बहुत अच्छे से देखभाल की और हमें बचा लिया।"
"गोली"
वीजू की बेटी को लोग प्यार से "गोली" कह कर बुलाते है। गोली अब 10 साल की हो गई है। हर साल उसका जन्मदिन मनाते वक्त उसकी मां को वो लम्हा याद आ जाता है। जन्मदिन का केक काटते वक्त वीजू उन परिवारों को याद करती है जिन्हें उस हमले की चपेट में आने से बचाया नही जा सका।

निर्मला पोन्नुदुरई
निर्मला उस वक्त शादी करने जा रही थीं जब दो हमलावरों ने मुंबई के मुख्य स्टेशन पर अंधाधुंध गोलीबारी कर 52 लोगों की जान ले ली। पोन्नुदुरई कहती हैं, "ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो। लगा जैसे पटाखों की आवाज हो। मैंने महसूस किया कि बहुत गर्मी मेरे शरीर में आ गई है और मेरे पूरे चेहरे पर खून फैल गया है। वहां बहुत धुआं और अफरातफरी थी।"
दिमाग में छर्रा लिए शादी
निर्मला के सिर और दिमाग में छर्रे घुस गए थे। एक भले इंसान ने उन्हें हाथ वाले ठेले में रख कर अस्पताल पहुंचाया। वो बताती हैं, "मैं चाहती थी कि शादी तय समय पर ही हो इसलिए चेन्नई चली गई। 30 नवंबर को मैंने शादी की, दिमाग में छर्रे को निकालने के लिए उसके बाद ऑपरेशन हुआ। उसके बाद छह महीने तक मेरा चेहरा लकवे का शिकार रहा।"

सौरभ मिश्रा
सौरभ मिश्रा अपने दोस्त के साथ लियोपोल्ड कैफे में बीयर का मजा ले रहे थे तभी दो बंदूकधारियों ने ग्रेनेड फेंका और फायरिंग शुरू कर दी। विदेशियों समेत 10 लोग मारे गए। सौरभ याद करते हैं, "मैं टा टा टा आवाज सुन सकता था और तभी मुझे अहसास हुआ कि मुझे गोली लगी है। लोग टेबल के नीचे घुस गए लेकिन मै बाहर सड़क पर आ गया।"
मर कर जिंदा
सौरभ टैक्सी में और अस्पताल जाते वक्त यही सोच रहे थे कि वो नहीं बचेंगे। गोली ने उनके फेफड़ों को छुआ था लेकिन उसे नुकसान नहीं पहुंचाया था। ऑपरेशन कर उसे तुरंत निकाल दिया गया। अस्पताल में हर तरफ शव थे और उनका नाम भी मरने वालों की सूची में डाल दिया गया। एक टीवी चैनल का पत्रकार तो उनके मां बाप का इंटरव्यू करने भी पहुंच गया था।

हेमंत ओबेरॉय
फाइव स्टार ताज पैलेस होटल के हेड शेफ हेमंत ओबेरॉय उस वक्त होटल में ही थे जब आतंकवादियों ने हमला किया। आतंकवादियों ने धमाके किए, लोगों को बंधक बनाया और 30 लोगों की जान ले ली। ओबेरॉय समेत दूसरे होटल कर्मचारी लोगों को बचाने में जुटे रहे। हेमंत ओबेरॉय कहते हैं, "हमने हर मेहमान को बचाने की कोशिश जैसे वो हमारे घर में हों। हम रास्तों को अच्छे से जानते थे तो हम उन्हें एक जगह ले जाने में जुटे रहे।"
एक के बाद एक अंतिम संस्कार
हेमंत ओबेरॉय और उनके साथियों की कोशिश से बहुत से लोगों की जान बच गई। हेमंत बताते हैं, "मेरे कुछ बहादुर साथियों को बंदूकधारियों ने गोली मार दी जब वे किचन में घुस आए। एक के बाद एक कर उनके अंतिम संस्कार में जाना मेरे लिए बेहद मुश्किल था। 10 साल बाद भी वो सब मेरी आंखों के आगे घूम जाता है, मैं आज भी उनके बलिदान को याद करता हूं।"

दिव्या सालसकर
पुलिस अधिकारी विजय सालसकर की बेटी दिव्या उस वक्त 21 साल की थीं जब आतकंवादियों का पीछा करते उनके पिता की गोलीबारी में मौत हो गई। वो बताती हैं, "शुरुआत में तो मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि वो अब मेरे आसपास नहीं हैं। पहले मैं दुनिया से नाराज थी लेकिन धीरे धीरे बीते 10 सालों में आगे बढ़ गई हूं।"
जख्मों के निशान
बीते सालों में हमले की जगहों से सब धो पोंछ कर साफ कर दिया गया है, हमला करने वाले भी मारे जा चुके हैं लेकिन जिन लोगों ने उसकी पीड़ा सही वो अब भी किसी ना किसी रूप में उनके साथ है और शायद कभी खत्म नहीं होंगी।


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