Widgets Magazine

अलौकिक व दिव्य चरित्र के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण...


 
 
 
 
* अपने जीवनकाल में ही महापुरुष के रूप में पूजे जाने लगे थे श्रीकृष्ण 
 
- पं. बाबूलाल जोशी
 
अर्जुन को उपदेश प्रदान करते हुए श्रीकुरुक्षेत्र के मैदान में कहते हैं कि 'हे अर्जुन जब-जब भी अपने कर्तव्य से शासन व्यवस्थाएं विमुख होती हैं, अन्याय, अत्याचार, आतंक, भ्रष्टाचार के अपराध बढ़ जाते हैं और जनजीवन दुःखी हो जाता है, तब-तब इन सबको मिटाने के लिए मैं स्वयं अवतरित होता हूं।' 

श्रीमद् भागवत्‌ गीता के चौथे अध्याय के सातवें श्लोक की यह उद्घोषणा श्रीकृष्ण के अवतार लेने की युगों-युगों से पुष्टि कर रही है।
 
हमारे बड़े से बड़े साहित्यकारों व कवियों को भी श्रीकृष्ण ने आकर्षित किया है। अब तक की इस लंबी अवधि में पुराण वेत्ता-कथावाचकों, संतों, महंतों व श्रोताओं का जी भी उससे नहीं भर पाया है। अभी भी श्रीकृष्ण की जादू भरी बाँसुरी के स्वर से गुंजित कालिन्दी का तट कलाकारों की हृदय वीणा के तारों को हिलाए बिना नहीं रहता।
 
किन्तु यह कहना भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि कुछ दुस्साहसी लोग मर्यादा का अतिक्रमण करते हुए श्रीकृष्ण की किशोर जीवन की कथा को गलत रीति से अतिरंजित करने से भी बाज नहीं आए, जिसका बुरा असर हमारी लोक भावनाओं पर गहराई तक पड़ा है। 
 
ये लोग श्रीकृष्ण का गोप बालों-ग्वालों के साथ यमुना (कालिन्दी) तट पर गौओं को चराने वाले, निर्दोष भाव से भांति-भांति के बाल सुलभ खेल रचाने वाले, कंस के अत्याचारों से लोहा लेने को कटिबद्ध, इन्द्र की व्यक्तिगत पूजा के अंधविश्वास से ब्रज के भोले- भाले ग्रामीणों को मुक्त करने वाले महापुरुष श्रीकृष्ण को तो भूल बैठे और इसके बजाय उनकी बालचर्या की कहानी तोड़-मरोड़कर मनमाने ढंग से अपने-अपने समयकाल की गंदी मिट्टी से लीप-पोत कर उनका ऐसा कामुकता से भरा (रासलीला के संदर्भ में अथवा सोलह हजार रानियों की मनगढ़ंत कहानी रचकर) विकृत रूप जनता के सामने रख दिया जो, हमारे साहित्य साधना का महाकलंक भी बन गया। जबकि वे आरंभ से ही योग शिक्षा से शरीर की सोलह हजार नाड़ियों के नियंत्रक थे।
 
कैसा अद्भुत और अलौकिक जीवन था उनका, कैसा था उनका! श्रीकृष्ण जीवन की लीला के मर्म को ठीक से समझ पाना और उनकी निर्लिप्तता की गहराई को पूरी तरह हृदय में उतार लेना हर एक के बस की बात नहीं थी। 
 
वे अपने उस युग के बड़े स्तर पर हुए उलटफेर में सबको नचाने वाले महाकाल के प्रतीक जैसे जान पड़ते थे, वे थे दारुण प्रपंच से सर्वथा परे स्थित प्रज्ञ महायोगी।

इसीलिए तो अपने जीवनकाल में ही एक के रूप में पूजे जाने लगे थे और भीष्म, विदुर तथा व्यास जैसे गुरुजन तक ईश्वर के साक्षात्‌ अवतार एवं युगपुरुष के रूप में उनकी वंदना करते पाए जाते थे।

 
 
वेबदुनिया हिंदी मोबाइल ऐप अब iOS पर भी, डाउनलोड के लिए क्लिक करें। एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें। ख़बरें पढ़ने और राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।
Widgets Magazine
Widgets Magazine