लागी बेरिया पिया के आवन की

ND|
- अजातशत्रु

बहती हुई हवा की तरह गाती थी। जैसे कली में पंखुड़ियाँ खुल रही हों अथवा सपने में झूला चल रहा हो। जो गाना मुझे सबसे ज्यादा प्रिय है, वह सिनेमा का न होकर एक प्राइवेट गीत है। सुमन चौरसिया गवाह हैं कि उसे सुनकर मैं बच्चे की तरह फूट-फूटकर रो पड़ा हूँ। ये आँसू परा आनंद के हैं। उस दोआवे के हैं जहाँ उदासी, खुशी, पीड़ा और अशरीरीपन, हडि्‌डयों पर गोश्त रहते भी, एक जगह जमा हो जाते हैं। और आँसू की बूँद के भीतर खुशियों को नचा जाते हैं। लागी बेरियाँ ऐसा ही जाँलेवा गीत है।
इस दादरे को बेगम अख्तर ने गाया हैं। काश! इस नगमे को साहब बीवी और गुलाम में छोटी बहू (मीना कुमारी) पर पिक्चराइज किया जाता या तीसरी कसम में सदा सोहागन (तवायफ) नौटंकी वाली वहीदा रहमान पर दिखाया जाता।

लागी बेरिया पिया के आवन की उन्हीं पर फबता है जिनके पिया नहीं आते या जिनकी किस्मत में पिया नहीं, उनके आने के गीत होते हैं। बेगम ने इस विरह गीत में प्रोषितपतिका या प्रतीक्षिणी के दर्द को ऐसा उड़ेला है कि औरत पीछे छूट जाती है। बस, उसका दर्द ही बचता है। औरत जरूर इस दर्द के बाद ही पैदा हुई होगी। बुरा न मानें यह कलमकार बड़बखानियों के बिना अपनी बात नहीं कह सकता-क्योंकि कुछ गीते सीधे, सस्ते और चल्लू होते कहाँ हैं। अनुपम को कहा कैसे जाए?
इस गीत की मर्मान्तक अपील और मिठास का कारण बेगम अख्तर हैं। सहगल के बाद शायद वही एक गायिका है जो गीत को गाती नहीं है बल्कि गायन में बातचीत करती है। ऐसी सहजता, ऐसा जमीनीपन, रोजमर्रा का ऐसा घरेलूपन गाने में आ जाए, भवानीप्रसाद मिश्र की कविताओं की तरह तो वह गाना, साधारण नगमे से उठकर, खासों में खास हो जाता है। लता को देखिए बेगम के मुकाबिले वे कुछ श्रम आयाम से गाती है। पर बेगम तो हवा की तरह बहती है और गाने के भाव तथा रस को ऐसा पैदा करते जाती है जैसे कली में पंखुड़ियाँ खुल रहीं हों या सपन में झूला चल रहा है। उन्हें जैसे गाना नहीं पड़ता बल्कि गाना खुद उन्हें गुनगुनाने लगता है।
एक बात और बेगम इस्लाम की परंपरा से आई है। इस्लाम में दर्द की विशेष और केंद्रीय जगह है। मिजाज, रवायत और हालात से बेगम को जो दर्द मिला है, वह बिना कोशिश के उकी गायिकी में उतर आता है। उनके गाने में एक काँटा है जो बुलबल के सीने में जाने कब टूट गया था और उसकी कसक है कि खुद ब खुद बेगम की गुलूकारी में चली आती है। बेगम सा दरका हुआ दिल और अनबुझी प्यास फिर कोई नहीं गा पाया। इसी के साथ उनकी एक और खासियत जेहन में रख लीजिए। वह है उनके आलाप, उनकी तानों को सुनकर लगता है, पहाड़ जाने कब से जल रहे हैं, बगीचे कब से झुलसे पड़े हैं और सहरों की दोपहर में, घायल हिरनी जाने कब से पानी का सोता खोजती भटक रही है। जी हाँ ऐसा ट्रांसडेंटल टच, पारलौकिक स्पर्श बेगम अख्तर से मिलता है। अब आपको यह सब नजर नहीं आता तो दीवार से कैसे रूठा जाए।
इस गीत के बारे में, अपने जीवन के सर्वोत्तम गीत के बारे में मैं आगे कुछ कहूँ, पेश्तर उसके आप गीत की, शब्द रचना पढ़ लीजिए-

लागी बेरिया पिया के आवन की,
हो गई बेरिया पिया के आवन की,
हो गई बेरिया पिया के आवन की,
हो गई बेरिया पिया के आवन की।
दरवजवा पर ठाड़ी रहूँ
हो गई बेरिया पिया के आवन की,
रैन अंधेरी बिरहा की मारी,
रैन अंधेरी बिरहा की मारी
अँखियन बरने बूंदिया मानव की,
लागी बेरिया पिया के आवन की।

कौन नगरिया/कौन नगरिया
पिया तुम छाए,
कौन...कौन नगरिया पिया तुम छाए,बीत ना जाए, रुत तुमरे मिलन की,
बीत ना जाए, रुत तुमरे मिलन की,
हो गई बेरिया.../लागी बेरिया-
हो गई बेरिया.../लागी बेरिया-
बीत ना जाए रुत/बीत ना जाए
रुत तुमरे मिलन की
हो गई बेरिया पिया के आवन की!

अर्थात पिया के आने की बेला हो गई, पर पिया नहीं आए। इसके बाद पीड़ा ही पीड़ा रह जाती है। वुजूद की छाती पर! उत्तरप्रदेश की अनपढ़, मेहनतकश ग्रामनारी के इस असीम विरह को बेगम अपने गायन में खूब पकड़ती है। लागी और हो गई लफ्जों पर हर बार उन्होंने ऐसी विकट मुरकी ली है कि कलेजा मुँह को आता है। हो लफ्ज को एक बार वे ऐसी खीच देती हैं कि लगता है, विरहाकुल गुजरिया ने दरवाजे पर दोनों हाथ मारकर चूड़ियाँ झड़ा ली। अलावा इसके धुन और राग का ऐसा मिजाज है कि नजर के सामने अलस्सुबह का वातावरण छा जाता है और इस बेला में किसी का दुःख और भी चुभने लगता है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे सुबह की ठंडक में आग लग गई और सुबह के काजल में अवसाद घुल गया। बावजूद इन सबके गीत के मजाहिया स्वाद को संपूर्ण और सटीक वाणी नहीं दी जा सकती। क्योंकि गाना बेगम के दर्दभरे दिल से उतरा है, ऐसे दर्द से,जिसे वे अपने खून में लिखाकर लाई थी। उनकी ठुमरियों और दादरों ने पूर्बिया रंग को अमर कर दिया है। इस गीत को मैं दर्जनों बार सुनता हूँ। पर आत्मा तृप्त नहीं होती। लगता है इसे मरकर भी सुनते रहें और बेअख्तियार आँखों को भिगोते रहें। देवदास ने पारों से कहा था...!
और यह उदास शेर चलते-चलते-
ये बेढब हँसी, गुस्ताख़ कहकहे, बेअदब ठहाके
चल 'असीर' कि अब कहाँ रहे रोने वाले।

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