पत्रकारिता के युग निर्माता मूर्धन्य पत्रकार राजेन्द्र माथुर

पुनः संशोधित सोमवार, 7 अगस्त 2017 (12:21 IST)
7 अगस्त, जन्मदिन के अवसर पर...
हिन्दी पत्रकारिता के अमिट हस्ताक्षर और बहुमुखी प्रतिभा के धनी (रज्जू बाबू) की 7 अगस्त को जन्मतिथि है। रज्जू बाबू जैसा बहुमुखी प्रतिभा का एवं सदैव जाग्रत अनेकानेक जिज्ञासाओं का धनी, मात्र पत्रकारिता के क्षेत्र में ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी बिरला ही होता है, बहुत ही बिरला।
 
राजेन्द्र माथुर, हिन्दी के प्रसिद्ध थे। स्वाधीन भारत में हिन्दी पत्रकारिता को स्थापित करने वाले स्वर्गीय राजेन्द्र माथुर का पूरा जीवन हिन्दी के लिये समर्पित रहा। वे भारतीय परंपराओं और संस्कृति का हवाला देते हुए संकीर्णता की बेड़ियाँ काट आधुनिक दृष्टिकोण अपनाने पर भी जोर देते रहे। वे सभ्यता को अक्षुण्ण रखने के लिए जंगली जिंदादिली को जरूरी मानते थे। वे आदर्श महापुरुषों की पूजा करवाने के बजाय उनके गुणों और विचारों को अपनाने के पक्षधर थे। 
 
मूर्धन्य पत्रकार राजेन्द्र माथुर के लेखन की समय सीमा तय नहीं हो सकती। इतिहास की परतें निकालने के साथ 21वीं सदी की रेखाओं को असाधारण ढंग से कागज पर उतार देने की क्षमता भारत के किसी हिन्दी में देखने को नहीं मिल सकती। इसीलिए 1963 से 1969 के बीच राजेन्द्र माथुर द्वारा 'नईदुनिया' में लिखे गए लेख आज भी सामयिक और सार्थक लगते हैं। 
 
अगस्त 1963 में उन्होंने लिखा था- 'हमारे राष्ट्रीय जीवन में दो बुराइयाँ घर कर गई हैं जिन्होंने हमें सदियों से एक जाहिल देश बना रखा है। पहली तो अकर्मण्यता, नीतिहीनता और संकल्पहीनता को जायज ठहराने की बुराई, दूसरी पाखंड की बीमारी, वचन और कर्म के बीच गहरी दरार की बुराई।' 
 
लगभग 50 साल बाद भी भारत उन बुराइयों से निजात नहीं पा सका है और पत्रकारिता में माथुर साहब को पे्ररक मानने वाले पत्रकारों या सामान्य पाठकों का कर्तव्य है कि वे उन बुराइयों के विरुद्ध अभियान जारी रखें। माथुर साहब की दृढ़ मान्यता थी कि केवल अनेकता के गौरव का शंख बजाने से काम नहीं चल सकता। देश को एक बनाने के लिए ज्यादा कष्ट उठाने पड़ेंगे। एकता का मतलब है देश में धर्म-निरपेक्ष, धन-निरपेक्ष, अवसर की समानता यानी आर्थिक और सामाजिक एकता।
 
माथुर साहब के लेखन में गाँधी, नेहरू, मार्क्स, लोहिया के विचारों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। आप उन्हें किसी धारा से नहीं जोड़ सकते। वे भारतीय परंपराओं और संस्कृति का हवाला देते हुए संकीर्णता की बेड़ियाँ काट आधुनिक दृष्टिकोण अपनाने पर भी जोर देते रहे। 
 
वे सभ्यता को अक्षुण्ण रखने के लिए जंगली जिंदादिली को जरूरी मानते थे। वे आदर्श महापुरुषों की पूजा करवाने के बजाय उनके गुणों और विचारों को अपनाने के पक्षधर थे। उनके लेखन में राष्ट्रवाद कूट-कूटकर भरा है, लेकिन भाषा, धर्म, क्षेत्र के आधार वाली कट्टरता कहीं नहीं मिलती।
 
राजेन्द्र माथुर यदि जीवित होते तो आज 74 वर्ष के होते। 1991 में उनके निधन के बाद हिन्दी पत्रकारिता में बड़ी रिक्तता आई है। लेकिन उनके जीवन-मूल्यों और पत्रकारिता को आदर्श मानने वालों की संख्या भी बहुत है।
 
उन्होंने विदेशी आक्रमण, अकाल, भूकम्प की परिस्थितियों में भी निराशा भरी टिप्पणियाँ नहीं लिखीं। ऐसे नाजुक अवसरों पर भी समाज में आत्मविश्वास पैदा करने का प्रयोग उन्होंने सदा किया। आज 2009 में हम अमेरिकी बाजार से प्रभावित आर्थिक मंदी से विचलित हैं। ऐसा लगता है कि इतनी भयंकर परिस्थितियाँ कभी नहीं थीं। 
 
जबकि माथुर साहब के 1965 में लिखे गए लेखों-संपादकीय टिप्पणियों में आर्थिक मायूसी के उल्लेख के साथ इस बात को रेखांकित किया गया कि विकास का रथ भी चलता रहता है। 1965 में लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे। जहाँ जमशेदजी टाटा तक आर्थिक मायूसी पर चिंता व्यक्त कर रहे थे, वहाँ माथुर साहब याद दिला रहे थे-
 
'बरौनी में रिफाइनरी शुरू हुई। बोकारो में 15 लाख टन इस्पात बनाने वाला कारखाना तैयार हुआ। मुंबई में परमाणु संयंत्र का उद्‍घाटन हुआ। ईरान में तेल की खोज के लिए समझौता हुआ।' इन विकास कार्यों के बावजूद एक अंदरूनी खोखलेपन पर उन्होंने प्रहार किए। आज भी इसी तेवर की आवश्यकता है।' 
 
इस समय हम चीन से प्रतियोगिता करते हुए अमेरिका के साथ रिश्ते प्रगाढ़ करते जा रहे हैं। 1962 के युद्ध के कटु अनुभवों के बाद भी अगस्त 1963 में राजेन्द्र माथुर ने अपने लेख में चेताया था- 'यदि हमें चीन की चालों को सफल नहीं होने देना है, तो अपने समाजवादी औद्योगीकरण को तेजी से आगे बढ़ाएँ ताकि प्रतिस्पर्धा में पीछे न रहें, जो चीन और भारत के बीच चल रही है। दूसरे अमेरिका से हथियार लेने के बाद हम यह ध्यान रखें कि अमेरिका का राजनीतिक या आर्थिक प्रभुत्व हम पर हावी न हो जाए और बीजिंग के पंजे से बचने के लिए हम वाशिंगटन के प्यादे न बन जाएँ।' 
 
वास्तव में माथुर साहब समाज के हर व्यक्ति की गरिमा की रक्षा के पक्षधर थे। उनके लेखन में बेहद पैनापन था, लेकिन किसी तरह का पूर्वाग्रह और दुर्भावना का अंश कभी देखने को नहीं मिला। पं. नेहरू को आदर्श मानने के साथ वे स्वयं सच्चे अर्थों में 'डेमोक्रेट' संपादक थे। 
 
अपने सहकर्मियों की राय को सुनने तथा लेखन के लिए पूरी स्वतंत्रता देने के साथ ही पाठकों के पत्रों की राय को सम्मान देना उन्हें बहुत अच्छा लगता था। 'नईदुनिया' और 'टाइम्स' में अत्यंत व्यस्त प्रधान संपादक रहकर भी वे पाठकों के अधिकांश पत्र खुद पढ़ते और संपादित करते थे। 
 
वे कहते थे-'यदि देश कहीं दो बुनियादों पर टिका है तो वह राजनेताओं पर कम और न्यायपलिका तथा पत्रकारिता पर ज्यादा टिका है, क्योंकि जब कहीं आशा नहीं रहती तो निराश व्यक्ति या तो अदालत के दरवाजे खटखटाता है और उम्मीद करता है कि अमुक प्रकरण में उसे न्यायालय से न्याय मिलेगा। फिर वह अखबार के दफ्तर में जाता है, जहाँ सबको लगता है कि जहाँगीर के जमाने की घंटी लगी है जिसको यदि बजाएँगे तो एकदम संपादक नामक जहाँगीर आएँगे और न्याय करके ही उसे वापस लौटाएँगे।' 
 
इस महती अपेक्षा को पूरी करने के लिए माथुरजी जीवनभर जिम्मेदार पत्रकारिता पर बल देते रहे। यही कारण है कि उनके लेखन में कभी जहर की बूँद नहीं दिखाई दी। वे ऋषि की तरह समाज और राजनीति का आकलन करते रहे।
 
राजेन्द्र माथुरजी के 60 के दशक (1963 से 1969) तक के लेखों का महत्व इक्कीसवीं शताब्दी में और बढ़ गया है। समय का रथ चलता रहता है, लेकिन परिस्थितियाँ कभी विकट होती हैं और कभी सुखद। राजेन्द्र माथुर यदि जीवित होते तो आज 74 वर्ष के होते। 1991 में उनके निधन के बाद हिन्दी पत्रकारिता में बड़ी रिक्तता आई है। लेकिन उनके जीवन-मूल्यों और पत्रकारिता को आदर्श मानने वालों की संख्या भी बहुत है।

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