बस इतनी ही है कहानी

फर्नांदो पेसोआ की कविता और चित्रकृति

संगत
रवींद्र व्यास|
Ravindra Vyas
WD
सबकी अपनी कहानी होती है या कहें कि सब की अपनी कहानियाँ होती हैं। सुबह-शाम और रात। और फिर सुबह-शाम और रात। और इन लगातार बीतते दिनों में हमारा जीवन कतरा-कतरा टपकता रहता है। कई बार इसकी आवाज किसी को सुनाई नहीं देती। कई बार हमें ही हमारे जीवन की आवाज सुनाई नहीं देती। यह जीवन इतना सामान्य है कि लगता है कुछ घटित ही नहीं हो रहा है और कभी-कभी लगता है कि इस जीवन में इतना असामान्य घटित होता है कि कहानियाँ बनती चली जाती हैं।

हम अपने आसपास ही नजर दौड़ाएँ तो कितने चेहरे, कितने लोग और उनका बीतता जीवन देख सकते हैं, महसूस कर सकते हैं। पुर्तगाल के महान कवि ने एक इतनी साद कविता लिखी है, इतने सादा व्यक्ति पर कि वह उसके जीवन के दर्द बहुत धीमे से चुपचाप बयाँ कर जाती है। और लगता है यह कहानी सालोमन की नहीं हमारी अपनी ही कहानी है।
तो पढ़िए पेसोआ की यह कहानी एक कविता के रूप में।

बस इतनी ही है की कहानी
दिखता था हमेशा हड़बड़ी में पर जल्दी कभी न थी उसे
वह झींकता, मशक्कत करता जानवरों की तरहलेकिन अन्त में किया कुछ नहीं उसने
बस इतनी ही है सालोमन वेस्ट की कहानी

उसने इच्छा करने और उन्हें पाने की मेहनत में जीवन बिताया
और कुछ बना ही नहीं उसके जीवन का
दर्द और पसीने के बावजूद वह किया करता था मशक्कत
लेकिन किसी काम नहीं आया वह साराबस इतनी ही है सालोमन वेस्ट की कहानी

बाक़ी की चीज़ें शुरू होती थीं ख़त्म नहीं
और बहुत सारा जो किया जाना था नहीं किया गया
तमाम ग़लत चीज़ों को सुधारा नहीं गया
बस इतनी ही है सालोमन वेस्ट की कहानी

हर दिन की नई योजनाओं से मिलता था धोखातो भी हर दिन था बाक़ी दिनों सा
इन्हीं के बीच वह जिया और मरा
वह ख़ुद को चिढ़ाता ख़ुद ही चिन्ता करता था
वह भागा, फ़िक्रमन्द रहा और रोया
लेकिन कुछ और नहीं कहा जा सकता उसके जीवन को लेक
सिवाय इन दो साफ़ तथ्यों के -
वह जिया और मरा। बस इतनी ही है सालोमन वेस्ट की कहानी

क्या हमारी जीवन भी इन दो तथ्यों से ही मिलकर नहीं बनता कि हम जीते हैं और मरते हैं। लेकिन कोई कवि ही है जो इस जीने और मरने के बीच जीवन के मर्म को उसके दर्द को उसकी असल कहानी को देख लेता है, समझ लेता है और महसूस कर लेता है।

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