विश्व पुस्तक मेले में हुई विश्व हिन्दी दिवस पर परिचर्चा, 'रंग कितने, संग मेरे' का लोकार्पण

Last Updated: सोमवार, 14 जनवरी 2019 (11:42 IST)


के स्टॉल पर दोपहर 12 से 1 बजे के मध्य के अवसर पर हिन्दी का ताना-बाना और वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर परिचर्चा आयोजित की गई। इसमें प्रतिभागी थे- कवि, अनुवादक व गद्यकार सुरेश सलिल, कहानीकार, उपन्यासकार व नाटककार महेश कटारे, उपन्यासकार रत्नेश्वर पांडेय। इनके साथ ही एसआर हरनोट, जो कि कथाकार व उपन्यासकार हैं, ने भी परिचर्चा में भाग लिया।
प्रतिभागियों ने मुख्य रूप से भाषा की मृत्यु की आशंका, भाषा प्रदूषण, अंग्रेजी के वर्चस्व और भाषा के साथ मनुष्यता के संकट पर भी बात की। महेश कटारे ने कहा कि हिन्दी समावेशी भाषा है। भाषा के साथ एक परंपरा व संस्कृति चलती है।

अनुराग सौरभ ने कहा कि हमारी भाषा में शब्दों की कोई कमी नहीं है, जो हम अन्य भाषा के शब्दों को लें, वहीं सुरेश सलिल का कहना था कि यह दौर मनुष्यता के लिए सबसे मुश्किल दौर है। इससे अगर उबर गए तो सब ठीक होगा। भाषा बहता नीर है, जैसे नदी में प्रदूषण होता है, उसी प्रकार भाषा भी प्रदूषित होती है। एसआर हरनोट ने हिमाचल के बारे में बताया, साथ ही वहां की बोलियों के लिए भाषायी चिंता जाहिर की। हिन्दी तो ऐसी भाषा है, जो स्वागत करती है अन्य सभी भाषाओं का। इस तरह इस परिचर्चा का अंत हुआ, जो हिन्दी दिवस के लिए आयोजित हुआ।
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पानी में ठहराव की तरह नहीं, पानी के बहने की तरह रहना चाहता हूं। -मोहनदास नैमिशराय

विश्व पुस्तक मेले में वाणी प्रकाशन के स्टॉल पर (हॉल नं. 12ए, स्टॉल 254-269) पर 10 जनवरी 2019 को वाणी प्रकाशन से प्रकाशित वरिष्ठ लेखक मोहनदास नैमिशराय की आत्मकथा 'रंग कितने, संग मेरे' का लोकार्पण व चर्चा का आयोजन किया गया।
चर्चा में नैमिशरायजी ने कहा कि आज नए तरह के पिंजरे बनाए जा रहे हैं। पृष्ठभूमि रही मेरठ, फिर मेरठ, दिल्ली, लखनऊ, पटना सभी के रंग। इस आत्मकथा में राजनीतिक, सामाजिक व धार्मिक सभी रंगों को समाहित किया गया है। ये सभी रंग इस पुस्तक में हैं इसलिए इसको यह नाम दिया 'रंग कितने, संग मेरे।' अलग-अलग मुद्दे इसमें उठाए गए हैं। लेखक इन सभी से जूझता है। मोहनदास नैमिशराय ने चौथा खंड भी प्रारंभ कर दिया है, क्योंकि यह विषय गंभीर है। किसी-न-किसी रूप में दलित समाज नए तरह के पिंजरे में कैद किया जा रहा है।
दलित समाज का व्यक्ति जब तक रहता है, उसे दलित होने की कीमत चुकानी पड़ती है। चर्चा को आगे बढ़ाते हुए नैमिशरायजी से प्रश्न पूछा गया कि आपकी विचारधारा में गुलाबी गैंग बनाने का अभिप्राय क्या है? तब उनका कहना था कि महिलाओं का सशक्त समुदाय है। कोई भी गैंग यदि मेरे खिलाफ है तो मैं कुछ लिखता हूं। यदि उसकी प्रतिक्रिया मिलती है, तो यह अच्छी बात है।

नैमिशरायजी कहते हैं कि मैं जिन लोगों से प्रभावित हूं उनमें मेरी पत्नी, अंबेडकर और राहुल सांकृत्यायन हैं। पानी जैसे बहता रहता है, वैसे नैमिशराय बहता रहता है। उन्होंने अंत में कहा कि पानी में ठहराव की तरह नहीं, पानी के बहने की तरह रहना चाहता हूं।
वाणी प्रकाशन के बारे में...

वाणी प्रकाशन अपने 55 वर्ष के साहित्यिक-सांस्कृतिक सफर में हिन्दी के गौरव के लिए सक्रिय और संकल्पित है। हिन्दी विश्व की आज दूसरी बड़ी भाषा है। हम किताबों की बदलती दुनिया के साथ हमकदम हैं। वाणी प्रकाशन की गहरी प्रतिबद्धता अपने पाठकों तक पहुंचने की रही है। हमारी किताबों की उपस्थिति आज 3 लाख से अधिक गांवों, 2,800 कस्बों, 54 शहरों के साथ 12 मुख्य ऑनलाइन स्टोर्स के माध्यमों से पाठकों के बीच है। यह संतोष की बात है कि साहित्य अकादेमी, तथा अन्य राष्ट्रीय पुरस्कारों से संबंधित किताबें और उनके लेखक हमारे साथ हैं। आज प्रिंट, इलेक्ट्रॅानिक और ऑडियो प्रारूप की 6,000 से अधिक किताबें पाठकों के लिए उपलब्ध हैं। हिन्दी महोत्सव का देश-विदेश में अनवरत आयोजन करने वाला वाणी फाउंडेशन पहला न्यास है।
गत 3 वर्षों से यह महत्वाकांक्षी समारोह दिल्ली के अलावा यूके में भी किया गया है। वाणी फाउंडेशन, यूके हिन्दी समिति, वातायन और यूके के सान्निध्य में वर्ष 2018 का आयोजन क्रमश: लंदन ऑक्सफोर्ड, बर्मिंघम और स्लोह में हुआ जिसे करने में वाणी फाउंडेशन अग्रणी है।

वाणी फाउंडेशन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है भारतीय भाषाओं से हिन्दी व अंग्रेजी में श्रेष्ठ अनुवाद का कार्यक्रम। इसके साथ ही इस न्यास के द्वारा प्रतिवर्ष डिस्टिंगविश्ड ट्रांसलेटर अवॉर्ड भी प्रदान किया जाता है जिसमें मानद पत्र और 1 लाख रुपए की राशि अर्पित की जाती है। वर्ष 2017 के लिए यह सम्मान सुप्रसिद्ध लेखिका अनामिका को दिया गया है।
वाणी फाउंडेशन पुस्तकों के प्रसार, विचार-विमर्श और आयोजन अभियान में जयपुर बुक मार्क का विश्वस्त सहयोगी है। विश्व पुस्तक मेले में वाणी के स्टॉल पर जयपुर बुक मार्क साथ होगा।

विश्व पुस्तक मेले में हमारी चुनिंदा नई किताबें :

विश्व पुस्तक मेले के अवसर पर वाणी प्रकाशन कई महत्वपूर्ण किताबों के साथ पाठकों से रू-ब-रू होगा। वर्ष 2019 में पाठकों के लिए जहां एक ओर स्थापित और युवा लेखकों के सृजनात्मक लेखन के नए आयाम व रंग होंगे, वहीं बदलते समय के प्रासंगिक विषयों की किताबें होंगी। इतिहास, समाजशास्त्र, धर्म, विज्ञान पर नए विमर्श का आलोक होगा। इन किताबों से नए विचार-विमर्श को केंद्रीय परिदृश्य में लाने का एक सपना साकार होगा।
दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक लेखकों ने चिंतन को एक नया परिप्रेक्ष्य दिया है और हमारी दृष्टि में ये विषय न केवल महत्वपूर्ण हैं बल्कि अपरिहार्य हैं। हिन्दी समाज को अधिक चिंतनशील दिशा में ले जाना वाणी प्रकाशन का प्रमुख ध्येय है। आज समाज नए सत्यों के अन्वेषण का आकांक्षी है। इसका प्रतिबिम्ब साहित्य में भी आकार ले रहा है। अपने प्रयास में हम हाशिए के जीवन-समाज के प्रति अधिक संवेदनशील और गंभीर हैं।
नई पीढ़ी यानी किशोर वर्ग और बच्चे हमारा भविष्य हैं। इनके अध्ययन की बदलती दिशाओं के गतिशील समय में हम बाल साहित्य को एक ओर सृजनात्मक, प्रयोगशील और प्रगतिशील नजरिए से प्रस्तुत कर रहे हैं तो वहीं युवा रचनाकारों की नई सोच को प्रस्तुत कर रहे हैं। कुल मिलाकर हिन्दी के नवजागरण को हम विश्वस्तर ले जाने पर के लिए कटिबद्ध हैं।

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