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सिमी आतंकवादी मारे गए, पर इनका जेल से भागना चिंताजनक

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अवधेश कुमार
भोपाल केंद्रीय कारागार से भागे स्टुडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया(सिमी) के 8 आतंकवादियों के मारे जाने पर जो बवंडर खड़ा करने की कोशिश हुई है, उससे किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भारत में याकूब मेनन से लेकर अफजल गुरु तक पर बवंडर खड़ा किया गया, इशरत जहां के तीन साथियों के साथ मुठभेड़ को प्रश्नों के घेरे में लाने की कोशिशें अभी तक जारी है। यह घटना भी कुछ ऐसी है। आठों पहले जेल से भागते हैं और 9 घंटे के भीतर ही द्वारा इनको ढेर कर दिया जाता है। सामान्यतः पुलिस को ऐसी सफलता नहीं मिलती, इसलिए भी बहुत लोगों को शंका हो रही है। कुछ ऐसे लोग हैं जो ऐसे मामलों पर स्थायी शंका पैदा करते हैं। 

कुछ समय के लिए यह मान लेते हैं कि सभी लोगों के प्रश्नों का जवाब पुलिस संतोषजनक ढंग से नहीं दे पा रही है। ऐसे मामले में यह स्वाभाविक है। किंतु जिस गांव में वे मारे गए, वहां के लोग तो बताएंगे कि सच क्या है। इन होहल्ला और छाती पीट माहौल से अलग प्रश्न यह पैदा होता है कि क्या इस मामले का यही महत्वपूर्ण पहलू है? क्या इनका जेल में एक आरक्षक की हत्या कर तथा दूसरे को घायल कर भाग जाना महत्वपूर्ण नहीं है? कोई निर्दोष एवं कभी अपराध न करने वाला व्यक्ति इस तरह न हत्या कर सकता है न जेल से भागने का ऐसा षड्यंत्र रच सकता है। दूसरा, इस मामले पर विचार करते समय उन पर आतंकवाद सहित जो अन्य आरोप हैं उनको भी ध्यान में रखना चाहिए। तीसरा, यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इन आठों में से तीन ऐसे हैं, जो पहले भी से भाग चुके हैं। इसलिए उनके मारे जाने को संदेह के घेरे में लाकर और उस पर फोकस करके हम इनसे जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज कर देंगे। 
 
इसमें सबसे पहला है, भोपाल जैसे अति सुरक्षित माने जाने वाले कारागार से इनका निकल भागना। यह जेल की पूरी सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्न खड़ा करता है। ऐसा षडयंत्र जेल के अंदर के लोगों की मिलीभगत के बगैर सफल हो ही नहीं सकता। आखिर रात के दो से चार बजे के बीच ये किस तरह एक साथ प्रधान आरक्षक हमला करने में सफल रहे? ध्यान रखिए, प्रधान आरक्षक की चम्मच या प्लेट से बनाए गए धारदार हथियार से गला रेतकर हत्या कर दी और दूसरे आरक्षक को हल्का घायल कर हाथ-पैर बांध दिए। इसके बाद चादर में लकड़ी बांधकर उसकी सीढ़ी बनाई और करीब 25 फीट ऊंची दीवार को फांदकर निकल गए। इस पूरी वारदात में समय लगा होगा। यह 5-10 मिनट में संभव नहीं होगा। क्या भोपाल जेल में सुरक्षा इतनी लचर है कि इतने समय तक इन पर किसी प्रहरी की नजर गई ही नहीं? आठ लोग यदि चादर और लकड़ी की सीढ़ियों से दीवाल फांदेंगे तो उसमें भी समय लगा होगा। प्रश्न तो यह भी है कि आखिर आतंकवाद के इन आरोपियों को एकत्रित होने का अवसर कैसे मिला? वह भी इस पृष्ठभूमि के बाद कि उनमें से कई पिछली बार 12 अक्टूबर 2013 में ही खंडवा जेल से भाग चुके थे। 
 
खंडवा में ये जेल के बाथरूम की दीवार तोड़कर फरार हुए थे। खंडवा फरारी घटना के बाद सरकार ने मध्यप्रदेश के अलग-अलग जेलों में बंद सिमी के आरोपियों को भोपाल जेल स्थानांतरित कर दिया ताकि वे फिर भाग न सके। जाहिर है उनको विशेष प्रत्यक्ष और परोक्ष निगरानी में रखा जाना चाहिए था, जिसमें साफ कमी दिखाई देती है। अब एनआईए इनकी जांच कर रही है तो मान लेना चाहिए कि सच सामने आ जाएगा तथा उसकी अनुशंसाओं के आधार पर अन्य जेलों की सुरक्षा में भी सुधार किया जा सकेगा। 
 
ध्यान रखिए, 12 अक्टूबर 2013 को खंडवा जेल से सात कैदी भागे थे। ये थे, अबू फैजल खान, एजाजुद्दीन अजीजुद्दीन, असलम अय्यूब, अमजद, जाकिर, शेख महबूब और आबिद मिर्जा। भागने के बाद उन्होंने 1 फरवरी 2014 को तेलंगाना के करीमनगर में डकैती की थी। इसके बाद चेन्नई, पुणे, बिजनौर शहरों में तीन बम धमाके करने में इनकी संलिप्तता सामने आई। इन पर अहमदाबाद में बम धमाके का भी आरोप है। 12 सितम्बर 2014 को बिजनौर के मोहल्ला जाटान स्थित एक मकान में विस्फोट हो गया था। विस्फोट के बाद असलम, एजाजुद्दीन उर्फ एजाज, मोहम्मद सालिक उर्फ सल्लू उर्फ अबु फैजल, महबूब उर्फ गुड्डू उर्फ मलिक, अमजद, जाकिर हुसैन उर्फ सादिक फरार हो थे। बम बनाते समय विस्फोट में महबूब झुलस गया था। जाटान विस्फोट मामले में छह मुकदमे दर्ज हुए थे। आतंकवादियों की मदद करने के आरोप में हुस्ना, नदीम, रईस टेलर, उसका पुत्र अब्दुल्ला, झालू निवासी फुरकान को जेल भेजा गया था। पांचों को पिछले साल लखनऊ जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। 3 अप्रैल 2015 को तेलंगाना के जिला नलगोडा में पुलिस ने इनमें से दो असलम व एजाजुद्दीन को मुठभेड़ में मार गिराया था। बाकी फरार हो गए थे। 24 दिसंबर 13 को सरगना अबू फैजल को बड़वानी जिले के सेंधवा से गिरफ्तार करने में सफलता मिली थी। 17 फरवरी 2016 को महबूब, अमजद, जाकिर हुसैन उर्फ सादिक को उड़ीसा पुलिस ने राउरकेला से गिरफ्तार किया था। आबिद को कुछ ही देर बाद पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। देश के विभिन्न प्रांतों में दहशत फैलाने और लूट की वारदातों को अंजाम देने के मामले में एनआईए को इनकी तलाश थी। राउरकेला में उड़ीसा की स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप, मध्यप्रदेश की एंटी टेरिस्ट स्क्वाड (एटीएस) और तेलंगाना पुलिस की टीम ने संयुक्त कार्रवाई की थी। राउरकेला के कुरैशी मोहल्ले में चारों  एक कमरा किराए पर लेकर रह रहे थे। इनको गिरफ्तार करने के दौरान पुलिस को छह रिवाल्वर सहित अन्य हथियार, मोबाइल, छह बाइक, पैन ड्राइव, बैंक पासबुक, दो पैन कार्ड भी मिले। पैन कार्ड दीपक साहू और कुलदीप सिंग के नाम बने हुए हैं। ये इनका उपयोग पहचान पत्र के रूप में करते थे। एक कार टाटा इंडिका यूपी-16-एडी-3896 भी जब्त की गई। जब्त की गई छह बाइक छत्तीसगढ़ परिवहन विभाग में दर्ज थी।
 
पुलिस के अनुसार पिछली बार जब अबू फैजल ने पकड़े जाने के बाद पूछताछ में बताया था कि वे तालिबान से संपर्क में थे। खंडवा में एटीएस जवान सीतारात यादव, अधिवक्ता संजय पाल और बैंककर्मी रविशकंर पारे की हत्या का आरोप भी इन पर था। कहने का तात्पर्य यह कि इनके अपराधी होने को लेकर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। इन सबका सरगना अबू फैजल था जिसे सुरक्षा एजेंसियां बड़ा आतंकवादी मानती रहीं हैं। इनके कारनामे ही इनके खूंखार होने का प्रमाण देतीं हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि इनकी सुरक्षा में जेल में ऐसी चूक कैसे हो गई। जाहिर है यह चूक अक्षम्य है। अगर ये बच गए होते, तो क्या करते कहना कठिन है। कारण, हाल के वर्षों में आतंकवादियों के लिए वारदात करना कठिन हो गया है। यहां तक कि माओवादी भी अब पहले की तरह हमले नहीं कर पाते हैं। बवजूद इसके ये हमारे आपके अंदर तो भय पैदा कर ही सकते थे। हो सकता है फिर ये आतंकवादी वारदात का षड्यंत्र रचते। 
 
जहां तक पुलिस की कार्रवाई पर संदेह की बात है तो यह हमारे यहां होगा। असदुद्दीन ओवैसी ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि जेल से भागते हुए इन विचाराधीन कैदियों ने पूरे कपड़े, जूते, घड़ियां और कलाई पर बैंड पहने हुए थे। उनकी पैंट में बेल्ट भी लगी थी। उनकी यह बात ठीक है कि विचाराधीन कैदियों को ये सब वस्तुएं नहीं दी जाती हैं, लेकिन जेल में तो किसी तरह का हथियार भी नहीं मिलता। उनने गला रेतने का काम किया। जब ये साजिश के तहत भागे हैं तो उनने अपने लिए सारी व्यवस्थाएं करवाई हों। इसलिए तो जांच की आवश्यकता है कि इनके भागने में अंदर किनका सहयोग मिला, बाहर से कौन सहयोग कर रहा था....ये कब से योजनाएं बना रहे थे..आदि आदि। प्रश्न उठाने वाले उठाएं, लेकिन देश में पुलिस की कार्रवाई का व्यापक समर्थन है। हालांकि इससे जेल की सुरक्षा चूक का मामला हाशिए में नहीं चला जाता।
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