मोदी की लोकप्रियता में कमी आई है...

 
गुजरात में अपनी कमजोरियों के कारण भले ही चुनाव नहीं जीत पाई हो लेकिन इससे इस बात का पता चलता है कि मतदाताओं को 'कांग्रेसमुक्त भारत' नहीं वरन 'कांग्रेस युक्त गुजरात' चाहिए। मोदी को अगर लगता है कि अपनी चुनावी सफलताओं के बावजूद वे देश की आम जनता की आवाज को प्रभावित कर सकते हैं, तो यह उनकी जिद ही कही जा सकती है। इसका अर्थ यह भी है कि वे अपने फैसलों को लोगों को थोपकर जनादेश का नाम नहीं दे सकते हैं। लगातार 22 वर्ष तक सत्ता में रहने वाली भाजपा अगर दावा करे कि उसका प्रभाव अक्षत है तो यह समझदारी नहीं कही जा सकती है। 
 
इसी तरह अगर प्रधानमंत्री मोदी को लगता है कि तीन वर्ष से अधिक समय तक पद पर रहने के बाद भी उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है, तो यह भी ए‍क दिवास्वप्न है। नोटबंदी और जीएसटी उनके ऐसे फैसले हैं जिन्हें समूचे देश के सारे लोग उचित नहीं मान सकते हैं लेकिन मोदी का हमेशा ही आग्रह (या दुराग्रह) रहा है कि देश की जनता उनकी नीतियों से बहुत खुश है। वे अपनी प्रबल चुनावी सफलताओं को जनादेश का नाम नहीं दे सकते हैं। जनादेशों को हमेशा ही सरल रेखा की तरह नहीं समझा या मापा जा सकता है और चुनावों में प्रतिद्वंद्वी पार्टियां हर हाल में चुनाव जीतने को तत्पर रहती हैं। भले ही कुछ भी उलटे सीधे कदम को अनदेखा न करना पड़े। 
 
गुजरात चुनाव के दौरान भी बहुत सारे मामले ऐसे आए है जिन्हें पूरी तरह से निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता है लेकिन देश के सर्वज्ञानी मीडिया और न्यूज चैनलों को इसमें कहीं कोई गलती नहीं दिखी। देश के न्यूज चैनलों ने नेताओं को इन्हें सरल रेखा में ही समझने व समझाने की ऐसी लत लगा दी है कि गुजरात व हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों के नतीजों के भाजपा के पक्ष में नजर आते हैं। इतना ही नहीं, ज्यादातर बुद्धिजीवियों को इस निष्कर्ष पर पहुंचने में देर नहीं लगी कि मोदी का जादू बरकरार है और कांग्रेस की राहुल गांधी क्या कोई भी नेता हार नहीं टाल सकता है।  
 
बेहतर होता कि इंस्टेंट बुद्धिजीवी नतीजों के पक्ष-विपक्ष का सम्यक विश्लेषण करते और मतदाताओं के उन संकेतों को संयत होकर समझते, जो उन्होंने इन चुनावों में भिड़ी दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों को एक जैसे भाव से दिए हैं। लेकिन ज्यादा समझदार होने या दिखने के चक्कर में ऐसा कुछ करना जरूरी नहीं समझा गया।
 
जहां तक हिमाचल प्रदेश का सवाल है तो सभी जानते हैं कि 1985 से ही मतदाता हर पांच साल पर सत्ता परिवर्तन करते और भाजपा के बाद कांग्रेस तो कांग्रेस के बाद भाजपा को अपनाते रहे हैं। शायद इसीलिए कांग्रेस ने यह मानकर भाजपा को वाकओवर-सा दे रखा था कि यह उसकी बारी है और इस कारण से वह सारी शक्ति गुजरात में झोंक रही थी।
 
इस लिहाज से देखें तो हिमाचल का परिणाम पूरी तरह से तय रूटीन सा है। ऐसा नहीं लगता है कि हिमाचल में भाजपा की जीत प्रधानमंत्री के पराक्रम, लहर या जादू का नतीजा है। ऐसा होता तो भाजपा राज्य में 2014 के लोकसभा चुनाव में हासिल उपलब्धि को दोहरा देती। तब उसने 53.85 प्रतिशत मत हासिल कर राज्य की चारों सीटें अपने नाम कर ली थीं लेकिन यह चमत्कार नहीं हो सका।
 
प्रधानमंत्री और उनकी सरकार का पराक्रम तो उनके गृहराज्य गुजरात में भी कोई चमत्कार नहीं कर पाया है। लोकसभा चुनाव के उनके करिश्मे में, जिसमें तथाकथित विकास मॉडल के प्रचार का भी कुछ कम रोल नहीं था, इसलिए पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने मान लिया कि कांग्रेस तो कब की खत्म हो चुकी है। पार्टी के अध्यक्ष शाह ने डेढ़ सौ से ज्यादा विधानसभा सीटें जीतने का लक्ष्य निर्धारित कर रखा था। लेकिन वह ‘मोदी लहर’ की काल्पनिक कहानी गढ़े जाने से पहले 2012 में हुए विधानसभा चुनावों में हासिल सीटों की संख्या भी नहीं छू पाई। आखिर ऐसा क्यों हुआ?
 
ठीक है कि वह अपना किला, सरकार या कि लाज बचाने में कामयाब रही, लेकिन किसे नहीं पता कि इसके पीछे प्रधानमंत्री का लोकसभा चुनाव जैसा करिश्मा नहीं हुआ। विकास के महानायक के ऊंचे आसन से नीचे उतरकर मोदी ‘पुनर्मूषकोभव’ की गति को प्राप्त हुए और प्रचार के लिए उन्हें हिंदुत्व के पोस्टर बॉय योगी आदित्य नाथ को बुलाना पड़ा। इस्लामोफोबिया और पाकिस्तान को अपने भाषणों का अंग बनाना पड़ा जबकि वे अपने प्रधानमंत्रित्व के शुरुआती बरसों में इससे सायास परहेज बरतते रहे थे।
 
जमीनी हकीकत पर जाएं तो गुजरात में कांग्रेस 2014 के लोकसभा चुनाव में 26 की 26 सीटें भाजपा के हाथों गंवाकर एकदम खाली हाथ रह गई थी। थोड़े दिनों पहले हुए राज्यसभा चुनाव तक अपने ही दोषों से पीड़ित और शंकरसिंह बाघेला जैसे नेताओं की भगदड़ से इस कदर पीड़ित थी कि उसे अपने विधायकों को बचाए रखने के लिए उन्हें लेकर अपने द्वारा शासित कर्नाटक भागना पड़ा था। यह कांग्रेस का पराक्रम था, कारनामा था जिससे कांग्रेस के राज्य नेतृत्व के बारे में समझा जा सकता है। 
 
वास्तव में, यह प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी के लिए आनंद का नहीं वरन खतरे की घंटी सुनने का अवसर है क्योंकि मतदाताओं ने यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि अगर उन्होंने अपनी रीति-नीति नहीं बदली तो वे उन्हें उस ‘विकल्पहीनता’ का मजा नहीं लेने देंगे, जिसके बूते वे लंबी पारी खेलने की मानसिकता बना चुके हैं।
 
नेता विकल्प देने की जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे, तो मतदाता खुद उपयुक्त विकल्प तलाश कर उसे आगे लाएंगे और धूल झाड़कर खड़ा कर देंगे। सौराष्ट्र के चुनाव में हार्दिक पटेल का उदाहरण सामने है जो कि 25 वर्ष के न होने पर चुनाव लड़ने की उम्र के भी नहीं थे। लेकिन अभी भी लगता नहीं है कि अपनी ‘जीत के अनवरत सिलसिले’ को लेकर आत्ममुग्ध भाजपा या प्रधानमंत्री इस घंटी को सुनना चाहेंगे। सत्तारुढ़ पार्टियों में वैसे भी ऐसी घंटियां सुनने का रिवाज कम होता है या भाजपा की तरह से होता ही नहीं है।
 
यह तो भाजपा का सौभाग्य कि उन्हीं की तरह प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को भी, सारे दुर्दिनों के बावजूद, अपनी चूकों व गलतियों को पहचानकर उनकी पुनरावृत्ति से बचने या आत्मावलोकन करने की आदत नहीं है। अगर कांग्रेस को यह आदत होती तो चुनाव अभियान में ‘विकास पागल हो गया है’ जैसी बेहतर शुरुआत के बाद वह भाजपा को उसी के हथियारों से मात देने के चक्कर में आकर उसके ट्रैप (फंदे) में जा नहीं फंसती। यह भी स्वाभाविक है कि मोदी की घाघ राजनीति के आगे राहुल गांधी कहीं नहीं लगते हैं और इस बीच सॉफ्ट हिंदुत्व का प्रवेश और मणिशंकर अय्यर जैसों के बयान भी आते गए। शायद कांग्रेस को लगा होगा कि जैसा सत्यानाश वैसा ही सवा सत्यानाश।   
 
उसे इतना तो समझना ही चाहिए था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या भाजपा के अन्य छुटभैये-बड़भैये, अपनी सरकारों के कामकाज के मुद्दे पर घिरेंगे, तो ‘औरंगजेब’ या ‘औरंगजेब राज’ जैसे बयानों पर तो उतरेंगे ही और बदले में किसी मणिशंकर अय्यर ने ‘नीच’, ‘पागल’, ‘बददिमाग’ या ‘गंदी नाली का कीड़ा’ जैसी शब्दावली इस्तेमाल कर दी तो इसे ‘गुजराती अस्मिता’ का मामला बनाकर ‘पाकिस्तानी’, ‘गद्दार’, ‘मीरजाफर’, ‘जयचंद’ और ‘पाक को सुपारी देने वाला’ तक खींच ले जा सकते हैं। सच को कांग्रेस नो मोदी ने अपने ही प्रचार के जाल में उलझाकर जीतने लायक नहीं छोड़ा। अय्यर कांड के बाद जब तक राहुल अपराधभाव से डैमेज कंट्रोल पर उतरते, बात हाथ से निकल चुकी थी।
 
कांग्रेसी नेताओं को यह बात समझ में नहीं पाई कि मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, लेकिन देश या इसकी जनता नहीं। वे गुजरात की जनता भी नहीं हैं कि उनका एक नेता के बयान से अपमान या सम्मान हो जाए। लेकिन बात महज अय्यर की ही नहीं है। आत्मावलोकन करते और आगा-पीछा देखते तो विकास के मुद्दे पर बढ़त बना चुके राहुल ही अचानक 2012 की सोनिया जैसे नरम हिंदुत्व के एजेंडे पर क्यों उतर आए? जबकि उन्हें समझना चाहिए था कि देश में कहीं भी चुनावी लड़ाई को हिंदुत्व के नरम व गरम दो रूपों के बीच सीमित कर धर्मनिरपेक्षता को मैदान से गैरहाजिर कर दिया जाता है तो जीत गरम हिंदुत्व की ही होती है। यह सोची समझी रणनीति के तहत प्रचार का अचूक हथकंडा साबित हुआ।
 
मोदी के इसी ट्रैप में कांग्रेस और राहुल गांधी फंस गए जबकि राहुल को उनके नए गुरु अशोक गहलोत ने अपना ज्ञान 'मंदिर-मंदिर घूमने' और खुद को 'जनेऊधारी हिंदू सिद्ध करने में लगा दिया। इससे अरुण जेटली को यह कहने का मौका हाथ लगा कि जब असली हिंदू पार्टी मौजूद है तो लोग क्लोन पर क्यों भरोसा करें? बात साफ थी कि जब योगी आदित्यनाथ सामने थे तो सचिन पायलट का क्या काम था। कांग्रेसियों की मूर्खता यहीं तक समाप्त नहीं हुई और पार्टी के रणनीतिकारों ने पाटीदारों को पटाने के चक्कर में दलितों, पिछड़ों व अल्पसंख्यकों के अपने पुराने आधार को सहेजने में ज्यादा रुचि नहीं ली। 
 
कांग्रेसियों ने मान लिया कि वे तो अपने ही वोट बैंक हैं सो हर हाल में साथ देंगे ही। जबकि अपने खिलाफ हिंदू ध्रुवीकरण से आशंकित होकर उसने पूरे चुनाव अभियान में कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों की शुभचिंतक दिखने से इस हद तक परहेज किया गया कि उन बेचारों के सामने ‘कोई भी जीते, हमें क्या’ जैसी स्थिति पैदा हो गई। कांग्रेस ने उन कारणों का भी समय रहते विश्लेषण नहीं किया कि अब ऐसे प्रदेशों में, जहां उसके व भाजपा के बीच सीधी भिड़ंत नहीं है यानी कोई तीसरी शक्ति भी है, तीसरी शक्तियां भी भाजपा को आसानी से हरा सकती हैं। उदाहरण के लिए अगर बंगाल में चुनाव हो तो तृणमूल कांग्रेस, भाजपा के सामने इतनी आसानी से आत्म समर्पण नहीं करेगी जितनी आसानी से कांग्रेस कर देती है।  
 
भाजपा के एकजुट विरोधियों को उससे ज्यादा वोट मिल सकते हैं लेकिन वह जी-जान लगाकर भी उससे क्यों पार नहीं पाते? क्योंकि धनबल और बाहुबल में भाजपा सभी दलों से आगे है। देशवासियों को 2019 के फाइनल से पहले वर्ष 2018 में सात राज्यों में भाजपा व कांग्रेस की ऐसी कई और भिड़ंतें देखने को मिलेंगी, जिनमें ‘हर हाल में जीत’ के उनके ऐसे और कितने ही गुल खिलेंगे। इसलिए जो भी देशवासी लोकतांत्रिक व संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की वास्तविक चिंताओं से किंचित भी जुड़ाव महसूस करते हैं, उनको याद रखना होगा कि गुजरात में दोनों राष्ट्रीय पार्टियों ने इन मूल्यों की कैसी ऐसी-तैसी की है। 
 
रही सही कसर चुनाव आयोग जैसे 'कथित निष्पक्ष' रेफरी ने पूरी कर दी। इसके चलते चुनाव आयोग को भी रेफरी के तौर पर अपनी प्रतिष्ठा का बड़ा हिस्सा खोना पड़ा है। यह अच्छी बात है कि उसने आचार संहिता तोड़ने के एक जैसे कुसूर में राहुल को नोटिस देने और प्रधानमंत्री को बख्श देने की अपनी गलती सुधारते हुए राहुल को दिया गया नोटिस वापस ले लिया है। लेकिन चुनाव आयोग को भी याद रखना चाहिए कि न्याय करते समय, न्याय होते हुए भी दिखना चाहिए अन्यथा एकतरफा फैसले होने का धब्बा लगे बिना नहीं रहता है।

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