बनारस के चेहरे... चेहरों में बनारस

-वाराणसी से लौटकर जयदीप कर्णिक

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अशोक कपूर जी यों तो उद्योगपति हैं पर बनारस में उनकी पहचान उन सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों के कारण ज़्यादा है जिन्हें वो बहुत शिद्दत के साथ निभाते हैं। अपने कालीन के व्यापार की बड़ी जिम्मेदारी वो अपने बेटे को सौंप चुके हैं। 'बनारस उत्सव' के ज़रिए वो साहित्य और संस्कृति की ऐसी महफ़िल सजाते हैं कि लोग याद रखें। आख़िर जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, हरिप्रसाद चौरसिया और बिस्मिल्ला खाँ साब की नगरी जो ठहरी...। कपूर साहब से जब पूछा कि क्या हाल हैं साहब बनारस के? कौन जीतेगा? तो वो बोले देखिए बड़ा सवाल ये नहीं है कि कौन जीतेगा, बड़ा सवाल ये है कि जीतने वाला बनारस के लिए, इस ऐतिहासिक वाराणसी शहर के लिए क्या करेगा?

सांस्कृतिक राजधानी इसे कहा तो जाता है पर जो सुविधाएँ होनी चाहिए, जो विकास होना चाहिए, वो कहाँ है? केवल महिमामंडन से क्या होगा? अब अगर मोदी जी के चुनाव लड़ने की बात करें तो जाहिर है उनके आने से चर्चा बढ़ी है, लोग आ रहे हैं और लगता नहीं कि बहुत दिक्कत आए पर हाँ, अगर वो केवल बनारस से ही लड़ते तो बात और थी। फिर तो ये प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता। अब लोग थोड़ा असमंजस में हैं। मुख्तार अंसारी के बैठ जाने से अब बड़ा सवाल ये है कि मुस्लिम वोट किसे मिलेंगे? अजय राय का जमीनी संपर्क तगड़ा है और वो निश्चित ही मोदी की राह को आसान तो नहीं होने देंगे। जहाँ तक आम आदमी पार्टी और केजरीवाल की बात है, मुझे नहीं लगता कि उनका कोई ख़ास प्रभाव है और वो कोई बड़ी सफलता हासिल कर पाएँगे। बनारस किसी को भी जिताए, ये जरूर चाहता है कि बनारस का भला हो। ऐसा व्यक्ति आए जो यहाँ से सतत जुड़ा रहे।

काम तो हमने भी किया भाजपा के लिए...
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हर्षपाल कपूर भाजपा के काशी क्षेत्र के कोषाध्यक्ष हैं। पिछली बार तो जोशी जी 17 हजार से बड़ी मुश्किल से जीत गए, अब क्या होगा? मोदी जी जीतेंगे...। पर भाजपा तो यहाँ ख़ास कुछ कर नहीं रही, मोदी जी की अपनी टीम लगी है...। नहीं हम भी कर रहे हैं। आप कर रहे होते तो कल्याणसिंह के बाद अब तक भाजपा का पतन ही क्यों हुआ, ऊपर क्यों नहीं गए...। नहीं कोशिश तो हुई पर अब सही वक्त है...अब उत्तरप्रदेश में भाजपा बेहतर होगी।

हम को मोदी का कैरक्टर नहीं जमता
चाचाजान (नाम बताया नहीं) मिले बजरडीहा की बुनकर बस्ती में आइस्क्रीम की दुकान पर। बोले मोदी से मेरी को जाती दुश्मनी नहीं है। पर बस मुझे उनका कैरेक्टर नहीं जमता। वो हमसे दुश्मनी पाले बैठे हैं तो हम कैसे उनके लिए दोस्ती का हाथ बढ़ा दें। जब उनसे कहा कि ये दुश्मनी कैसे ख़त्म होगी तो बोले बात करने से तो नहीं होगी। एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया। बात करने से क्या होगा। तो किसे वोट देंगे? क्या अजय राय को? दे भी सकते हैं, अभी से क्या कहें? और केजरीवाल को? अभी तो कोई मन नहीं उनको देने का.....।

राहुल गाँधी ने का नुकसान कर दिया...
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धर्मेंद्र सिंह कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता रहे पर अभी हाशिए पर हैं। उनको लगता है कि उनकी सक्रियता का, ऊर्जा का सही सिला उनको नहीं मिला। उनका मानना है कि ये अब वो राजीव और इंदिराजी वाली कांग्रेस नहीं रही। राहुल कांग्रेस ने तो कांग्रेस का नुकसान कर दिया। वो लोगों को पहचान नहीं पाते। कमलापति त्रिपाठी के बाद कौन है जो यहाँ कांग्रेस को उतना ऊपर ले जाए। हमारे चुप रहने से भाजपा इतनी आगे बढ़ गई...।

केवल धर्म से नहीं सोच से चलेगा बनारस
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प्रो. विश्वनाथ पांडेय बीएचयू के पुराने और परिचित हस्ताक्षर हैं। उनका मानना है कि केवल ध्रुवीकरण के आधार पर वोट देना अब पुरानी बात हो गई। अब ऐसा नहीं होगा। लोग विकास चाहते हैं। काम चाहते हैं। नही पीढ़ी अब धर्म वाली बात बहुत नहीं सुनती। मेरा बेटा मेरी बात नहीं सुनता। बातचीत में उनका बेटा जो वहीं पढ़ रहा है वो भी आ गया। उसने कहा कि जिस तरह के नरसंहार से मोदी का नाम जुड़ा है, मैं तो उनका समर्थन नहीं कर सकता।

मोदी जीतेंगे और अच्छे से जीतेंगे
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के सचमुच कई चेहरे हैं... नूतन भी और पुरातन भी। बरसों पुरानी चाय की दुकान से लेकर नए उग आए चमकदार मॉल्स तक सबमें एक अलग तरह का बनारस साँस लेता है। सब बहुत अलग तरह से दिखने, होने और बात करने के बाद भी किसी एक अदृश्य डोर से ज़रूर बंधे हैं। ये वो ही डोर है शायद जो मानव सभ्यता के इस पुरातन प्रतीक को इतने सालों से यों जोड़े और सहेजे हुए है।
चुनाव यात्रा के लिए बनारस में घूमते हुए इन चेहरों से चर्चा के दौरान बात तो चुनाव की ही हुई, पर इन्हीं चेहरों को करीने से जोड़ने पर बनारस का अक्स भी उभर आता है। ये वो चेहरे हैं जो बनारस को काशी और वाराणसी बनाते हैं। इन चेहरों को जोड़ देने भर से बनारस पूरा नहीं होता, वो अधूरा भी नहीं रहता... बिलकुल केदारनाथ सिंह की कविता की तरह....। फिर भी इन चेहरों से मुलाकात दिलचस्प है.... अहम ये है कि बनारस का भला कौन करेगा?
काशी विश्वनाथ के दरवाजे पर ज्ञानवापी के प्रवेश द्वार के ठीक सामने बैठने वाले राकेश कुमार गोंड तो उत्साह से लबरेज हैं। वो कहते हैं कि मोदी की लहर है। बनारस में भी और पूरे हिंदुस्तान में भी। जीत तो मोदी की ही होगी। और बात भी तब है जब जीत बड़ी हो.... जय काशी विश्वनाथ।


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