पच्चीस-पच्चीस, तीस-तीस साल के लड़के हैं। बीस से तीस साल तक की लड़कियाँ हैं। और ये आए हैं शादी करने। टीवी पर एक ऐसे रियलिटी शो में हिस्सा लेने, जिसमें उन्हें जीवनसाथी मिल सके। विवाह नाम की परंपरा से जुड़ी जितनी उल्टी-सीधी बातें हैं, सब इसमें नजर आती हैं। सबसे पहले तो इसका नाम... "परफेक्ट ब्राइड"।
लड़की को ही क्यों किसी के लिए परफेक्ट होना पड़े? लड़का परफेक्ट क्यों न हो? मगर सौंदर्य प्रसाधन का धंधा चलता है लड़कियों से... सो कमी उन्हीं में बताई जाती है ताकि त्वचा को सुंदर और जवान रखने वाला साबुन और क्रीम बिक सके। तमाम ऐसी खुराफात चीजें बिक सकें, जो किसी दुल्हन को कथित रूप से परफेक्ट बनाती हों।
इस शो में एक लड़का एक लड़की को पसंद कर रहा है, लड़के की माँ भी लड़की को पसंद करती है, मगर लड़का शर्त लगा रहा है कि लड़की को नॉनवेज छोड़ना पड़ेगा। लड़की की माँ ने समझाया भी कि हम कोई ऐसे गोश्तखोर नहीं हैं कि रोज हमें वो ही होना। मगर लड़का घमंड से कहता है कि नहीं नॉनवेज की इजाजत तो मैं दे ही नहीं सकता। लड़की की माँ ने फिर समझाया कि रिश्ते के बीच इस बात को मत आने दो, यह निजी मामला है, मगर लड़के का अहं पहाड़ जैसा है। लड़की ने बातों में लगाकर कहा भी कि एक-दूसरे पर शर्तें थोपना बुरी बात है।
बेध्यानी में लड़का मान भी गया, मगर जब ध्यान आया कि इशारा उसी की तरफ है, तो कहा- नॉनवेज वाली बात शर्त के दायरे में आती ही नहीं है। लड़का प्यार से कहता कि नॉनवेज से मुझे दिक्कत है, तो बात अलग रहती। अब लड़की वाले भी अड़े हैं कि पहले यह मामला तय हो। इस बीच लड़के की माँ कह रही है कि तू किसी और लड़की को भी "जान"।
एक दूसरा लड़का है, उसकी एक लड़की से जान-पहचान बनी, दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे। मगर लड़के की माँ अड़ गई कि बहू के रूप में मुझे यह लड़की नहीं चाहिए। जाहिर है लड़की अपमानित हुई। रोई, चिल्लाई। एक लड़की ने पहली नजर में किसी और को पसंद किया था, मगर अब उसकी डेटिंग किसी और से चल रही है। एक शर्मीली लड़की आगे बढ़कर पसंदीदा लड़के को न थाम सकी तो जो बच रहा है, उसी से परिचय बढ़ा रही है।
दिखने में कमजोर लड़कों ने भी बची हुईं लड़कियों को थामा है। यह ऐसा ही है कि पसंद तो आई थी महँगी कार मगर बजट में यह सिंपल-सी, छोटी कार आ रही थी। इस पूरे व्यापार में कहीं भी प्यार नहीं है। प्यार के जोखिम नहीं हैं, दीवानापन नहीं है। सब जैसे किसी पशु हाट में हैं और सौदे कर रहे हैं। थोड़ी देर तक एक पशु के पास खड़े रहकर मोलभाव करते हैं और फिर दूसरी जगह चले जाते हैं। वहाँ जाकर भी ललचाई हुई नजरों से पहले सौदे की तरफ देखते रहते हैं। इस बीच उधर कोई दूसरा आ गया है। पहले की नजर दूसरे पर टिकी है कि उसका सौदा न पटे तो मैं फिर उधर चला जाऊँ। जिससे बात चल रही है, उसका क्या है! कोई भी बहाना बनाकर उसे छोड़ा जा सकता है। सवाल यह है कि आधे-अधूरे मन से की गईं समझौते की ये शादियाँ हो भी गईं तो क्या होगा? क्या ये आदर्श दांपत्य जीवन (अगर ऐसा कोई जीवन होता है तो) जी पाएँगे?
पारंपरिक शादियों में भी यही सब होता है, मगर ढँके-छुपे। इस रियलिटी शो ने तो ढँकी हुई गंदगी को एकदम उभार दिया है। अरेंज मैरेज से जुड़ी केवल एक बुराई बाकी रह गई है और वह है दहेज की बातें। अगर दहेज का लेन-देन गैरकानूनी नहीं होता तो चैनल पर यह भी दिखाया जाता कि लड़की किसी लड़के को ललचाने के लिए कह रही है- मुझसे शादी करोगे तो बाबूजी पाँच लाख नकद देंगे। लड़कों द्वारा लड़की को अपनी कमाई और अमीरी की बात सुनाकर ललचाना भी इसी श्रेणी का गंदापन है। एक तरह से यह लड़की को खरीदने की कोशिश है, बरगलाने का प्रयास है।
इस शो में शामिल होने वाले नाम के ही युवा हैं। ये कितने मंदबुद्धि हैं, इसका पता इसी से चलता है कि इनके फैसले दूसरे लेते हैं। इतनी उम्र लेने के बावजूद ये अपनी पसंद का साथी नहीं ढूँढ सके तो इनसे और क्या उम्मीद की जा सकती है। अब ये टीवी शो में आए हैं, जहाँ केवल चार लड़के हैं और आठ लड़कियाँ, जबकि बाहर पूरी दुनिया पड़ी है।