दिनशा के दोनों हाथ में लड्‍डू

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-जनकसिंह झाल
'मैं और मेरी पार्टी 101 प्रतिशत से विजयी होंगे और मैं गुजरात से मोदी को हमेशा-हमेशा के लिए रवाना कर दूँगा।' यह बयान है उस शख्स का जिसने गुजरात विधानसभा की चुनावी जंग में मोदी की तलवार के वार को झेलने के लिए के लिए अपनी ढाल को सामने रखा है।

आखिर लंबे समय की महेनत रंग लाई और गुजरात में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को टक्कर दे सके, एक ऐसा शख्स कांग्रेस को मिल ही गया। 70 वर्षीय होने के बाद भी उसमें वो ही उत्साह है, जो एक योद्धा में होना चाहिए।

जब टेक्सटाइल प्रधान शंकरसिंह वाघेला, प्रदेश कांग्रेस प्रमुख भरत सोलंकी और नरहरि अमीन ने मोदी के सामने अपने हथियार डाल दिए, तब पटेलों से प्रभावित मणिनगर सीट पर मोदी का मुकाबला करने वाला यह शख्स कांग्रेस का तारणहार बनकर सामने आया है।
जी हाँ, यह शख्स हैं दिनशा जेवरभाई पटेल। गुजरात के बड़ोदा में 25 मई 1937 को उनका का जन्म हुआ। नडियाद के इस रहवासी ने 1956 से एक युवा कार्यकर्ता बनकर राजनीति की राह पकड़ी। 1972 में वे एक साथ दस बार नडियाद नगर पालिका के पार्षद चुने गए। लेकिन यहीं पर उनके कदम नहीं थमे और 1975 में वे गुजरात विधान परिषद के सदस्य के रूप में चयनित हुए। 1975 से 1996 तक उसी सीट पर एमएलए बने रहने का रेकार्ड भी उन्होंने अपने नाम किया।
1990 से लेकर 1995 तक लोक निर्माण विभाग (रास्ता और आवास) के सफल मंत्री कहे जाने वाले दिनशा के विभाग द्वारा जारी किया गया बजट हर साल बिना किसी विरोध के मंजूर होता रहा है। जो अपने आप में उनकी श्रेष्ठ कार्यप्रणाली को सिद्ध करता है।

एक आम कार्यकर्ता के रूप में राजनीति में अपने कदम रखने वाले दिनशा 1996 में खेड़ा विधानसभा क्षेत्र से चुने गए और उसी पद पर उसी क्षेत्र मे वे वर्ष 1998, 1999 और 2004 में चार बार पुन: चुने गए।
दिनशा ने कॉमर्स स्थायी समिति, भारी उद्योग स्थायी समिति, रेलवे स्थायी समिति की सलाहकार समिति और अखिल भारतीय नमक आयोग के सदस्य के तौर पर भी काम किया।

दिनशा विदेश मंत्रालय की स्थायी समिति, इंफॉर्मेशन और ब्रॉड कास्टिंग और कल्चरल सलाहकार समिति, इंडियन काउन्सिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च के सभ्य पद पर रहने के साथ वर्तमान में कायरा मतदान क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। दिनशा वर्तमान में केन्द्रीय मंत्री हैं।
वैसे भी मोदी के साथ टक्कर लेने से उनका कोई नुकसान होने वाला नहीं है, क्योकिं अगर वे गुजरात विधानसभा के चुनाव में विजयी बनते हैं तो छह माह में केन्द्र का मंत्री पद और विधायक पद दोनों में से किसी एक को कायम रखने का निर्णय कर सकते हैं और अगर उनकी पराजय हुई तो भी केन्द्र में उनका पद बरकरार रहेगा ही। कुल मिलाकर गवाने के लिए दिनशा के पास कुछ भी नहीं है।

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