उसैन बोल्ट – काँस्य से काँस्य तक

Author जयदीप कर्णिक|
शिखर पर अकेलापन होता है। महान प्रतिभाएँ महान संकटों के लिए अभिशप्त हैं। ऊपर चढ़ते वक्त वो कौन सा बिन्दु है जिसे आप अंतिम पड़ाव मान लेंगे? आपकी यात्रा में सर्वोच्च क्या है? आपके मन का हिमालय कौन सा है? सफलता के झिलमिल सितारों के बीच वो कौन सा वक्त होगा जब आप बत्ती बुझाकर शुभ रात्रि कह देना चाहेंगे? क्या जितना धमाकेदार आगमन है उतना ही धमाकेदार प्रस्थान भी होगा? ये कौन जानता है और ये कैसे तय होगा? आप चाहे सर डॉन ब्रैडमेन हों, सचिन तेंदुलकर हो, माइकल फैल्प्स हों या फिर उसैन बोल्ट.... पिच पर, स्वीमिंग पूल में या मैदान में आपकी आख़िरी सलामी भी आपके चमकदार खेल की ही तरह सुनहरी होगी कि नहीं, ये कौन तय करेगा? और इन सबके साथ ऐसा नहीं हो पाया तो क्यों? यही होता है तो आख़िर यही होता क्यों है? एक मुकाबला वो जो हमें खिलाड़ियों के बीच दिखता है और एक वो भी है जो खेल और खिलाड़ी के बीच भी चलता रहता है। नियति इतनी निष्ठुर क्यों है?
इसीलिए कि आख़िरी हँसी वो हँस सके, कि वो किसी को अपराजेय और सर्वश्रेष्ठ का दंभ ना पालने दे, कि वो नई कोंपलों को भी बरगद बन जाने का हौसला दे, कि कोई भी मनुष्य अपनी सीमाओं को ख़ुद ना तय कर सके, कि उस पहली पायदान पर संघर्ष, जीवट और संभावनाओं का स्थान बना रहे। तरणताल को सोने से नहला देने वाले माइकल फैल्प्स तो फिर भी ख़ुश हो सकते हैं कि विश्व चैम्पियनशिप में उनके सात स्वर्ण के रिकॉर्ड को 20 वर्षीय सेलेब ड्रेसेल ने छू लिया। फ्लोरिडा के इस नौजवान छात्र ने जुनून और लगन से उस मकाम को पा लिया जिसके लिए तैराकों की एक पीढ़ी पानी में खप गई।
की ही तरह फेल्प्स को भी अपने आख़िरी एकल मुकाबले में सिंगापुर के जोसेफ स्कूलिंग ने 100 मीटरबटरफ्लाय में हरा दिया था। उन्हें संयुक्त रजत से संतोष करना पड़ा था। ये भी महत्वपूर्ण संयोग है कि इसके कुछ समय पहले ही फेल्प्स ने युवा तैराक स्कूलिंग को सिंगापुर में सम्मानित किया था। स्कूलिंग ने रियो डी जेनेरियो के तरण ताल में ही दक्षिणा के रूप में सुनहरा तमगा जीत लिया और फेल्प्स की विदाई को फीका कर दिया।
बोल्ट के साथ तो इससे भी बुरा हुआ। बोल्ट से हार गए!! 35 साल के जस्टिन गैटलिन!! वो गैटलिन जो पिछले एक दशक से भी अधिक समय से बोल्ट को हराने का सपना संजोए हुए थे!! वो गैटलिन जिनका लंदन के स्टेडियम में सबने तिरस्कार किया, वो जो प्रतिबंधित दवाएँ लेने के आरोप में दो बार मैदान से बाहर कर दिए गए। जो खेल मैदान में एक “बुरे आदमी” के रूप में ज़्यादा चर्चित रहे। जो बस अपनी छवि सुधारने के लिए एक मौके की तलाश में थे और जबर्दस्त मेहनत कर रहे थे। और इसी तैयारी में कहीं बोल्ट का आत्मविश्वास और गैटलिन की मेहनत अपना मुकाबला शुरू कर चुके थे। मैदान में दिखाई देने वाले मुकाबले से कहीं पहले। और आख़िर ज़रा से फासले से गैटलिन जीत गए।
जस्टिन गैटलिन ने 9.92 सेकंड में 100 मीटर की दौड़ पूरी की और बोल्ट ने 9.95 सेकंड में। बोल्ट तीसरे स्थान पर रहे। हालाँकि 9.58 सेकंड का बोल्ट का विश्व रिकॉर्ड अब भी कायम है। उन्होंने खेल के मैदान को जुनून की एक नई परिभाषा दी है। जीत जाने के बाद भी गैटलिन बोल्ट के कदमों में झुक गए। निश्चित ही इस हार से बोल्ट की महानता कम नहीं हुई और भविष्य की फर्राटा दौड़ भी उन्हें याद कर होती रहेगी, फिर कोई दीवाना मेहनती दौड़ाक आएगा और उस 9.58 के आँकड़े को भी पीछे छोड़ देगा। पर हाँ बोल्ट की विदाई की चमक ज़रूर फीकी हुई। के ये खेल का मैदान ही कुछ ऐसा निष्ठुर है। नहीं तो क्या कारण है कि सर डॉन ब्रेडमैन अपने आखिरी मैच में शून्य पर आउट हो गए? और हमेशा के लिए उनका औसत 99.94 दर्ज हो गया। अगर वो 4 रन भी बना लेते तो 100 का औसत हो जाता। और ये हो जाता तो फिर खिलाड़ी बड़ा हो जाता और.... खेल और उसका मैदान हमेशा बड़े रहेंगे ... खिलाड़ी आएँगे, अपना जौहर दिखाएँगे, मैदान भी मार लेंगे, पर उससे बड़े नहीं हो पाएँगे क्योंकि पीछे खड़ा कोई ड्रेसेल, कोई स्कूलिंग, कोई गैटलिन उसी मैदान को चूमने के लिए आतुर होगा।

फिलहाल तो उसैन बोल्ट को दौड़ के मैदान में जबर्दस्त ऊर्जा और जीवट फूँक देने के लिए सलाम और बधाई। उनके द्वारा स्थापित कीर्तिमान फर्राटा दौड़ को रोमांचक और चुनौतीपूर्ण बनाए रखेंगे। ये भी एक संयोग है कि बोल्ट ने अपनी ज़िंदगी का पहला पदक बाधा दौड़ में 80 बाधाओं को पार कर जीता था और वो भी एक कांस्य पदक ही था। 2008, 2012 और 2016 के ओलिम्पिक खेलों में तीनों बार तीन स्वर्ण पदक जीतने का जादुई कीर्तिमान रचने के बाद वो अपनी विदाई के वक्त फिर उसी कांस्य पर लौट आए जहाँ से उन्होंने शुरू किया था .... एक पूरा चक्र .... और इस बीच एथलेटिक्स की दुनिया बदल गई... ।


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