आज पीवी सिंधु की लड़ाई अपने आप से है...

Author जयदीप कर्णिक|
हाँ, वो सवा सौ करोड़ उम्मीदों पर सवार है....हाँ, अब सबको उसमें सोने की चमक नज़र आने लगी है.... हाँ, अब सब उसकी पिछले सात सालों की मेहनत की बात कर रहे हैं... हाँ, अब सब उसके गुरु पुलेला के प्रयत्नों की तारीफ़ कर रहे हैं... गुरु को द्रोणाचार्य पुरस्कार मिला है और उसको अर्जुन पुरस्कार मिला है... हाँ, पूरा देश चाहता है कि सोने के मैडल रूपी मछली की आँख पर निशाना लग ही जाए... हाँ, इस आधुनिक युग में ओलंपिक के सभागार में देश की करोड़ों उम्मीदों, लज्जित आँखों, तड़पती हसरतों और आहत भावनाओं को ढँकने वाला वस्त्र लेकर घूम रही हैं ... हाँ, उसके और साक्षी मलिक के कारण लोग सोशल मीडिया पर कन्या भ्रूण हत्या और बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ का मंत्रोच्चार कर रहे हैं… हाँ, अब सब उसके वॉलीबॉल खेलने वाले माता-पिता और उनके समर्पण के बारे में जानना चाहते हैं... मैदान में ना जा सकने वाले उसके लिए हवन कर रहे हैं और दुआएँ दे रहे हैं...
 
हाँ, ये सारा देश पुसरला वेंकट सिंधु की तरफ हिमालयी उम्मीदों के साथ देख रहा है। में महिलाओं के बैडमिंटन फाइनल में उनका मुकाबला स्पेन की कैरोलिना मारिन से है। पर जो लोग पीवी सिंधु का खेल देखते आए हैं और जिन्होंने ख़ास तौर पर सेमीफ़ाइनल में नोज़ोमी ओकुहारा के साथ उनका मुकाबला देखा है, वो सब जानते हैं कि पीवी सिंधु का मुकाबला आज कैरोलिना मारिन से नहीं ख़ुद से है। हाँ, वो इससे पहले कैरोलिना से छ: में से चार बार हारी हैं। जब दो बार वो जीती भी हैं तो मुकाबला तीन सेट में हुआ जबकि सिंधु के ख़िलाफ़ मारिन ने चारों बार सीधे सेटों में जीत हासिल की है।
 
सेमीफ़ाइनल में जिस जापानी खिलाड़ी नोज़ोमी ओकुहारा को सिंधु ने करारी शिकस्त दी है, उससे भी वह चार में से तीन बार हारी थीं। एक बार जब वो जीती थीं वो भी तब जब ये दोनों जूनियर खिलाड़ी थीं। तो आँकड़ों में तो जापानी खिलाड़ी का ही पलड़ा भारी था। पर सेमीफ़ाइनल में दूसरे सेट के उत्तरार्ध में तो जैसे जापानी खिलाड़ी जमीन पर बिछ गई। गोया कि बैडमिंटन नहीं कुश्ती का मुकाबला चल रहा हो!! 11-10 की बढ़त के बाद जब सिंधु कोर्ट में आईं तो फिर उन्होंने ओकुहारा को पॉइंट लेने ही नहीं दिया... अचानक क्या बदला? कशमकश क्यों ख़त्म हो गई? ... इसलिए क्योंकि सिंधु ख़ुद से जीत गई थीं ... फिर तो ओकुहारा को हराना बस लम्हों की बात थी... इसके पहले वाले सेट में भी सिंधु दरअसल ख़ुद से ही खेल रही थीं... ओकुहारा कहीं नहीं थी... लंबी रेलियों में कठिन संघर्ष के बाद सिंधु पॉइंट हासिल कर रही थीं.. और अगले ही पल अपनी ही ग़लती से अगला पॉइंट गँवा रही थीं... जल्दी पॉइंट लेने के चक्कर में शटल जाली में उलझ रही थी या लाइन के बाहर गिर रही थी। आसान-सी ओपनिंग या ड्रॉप शॉट भी पॉइंट में नहीं बदल पा रहे थे... इसीलिए पहला सेट और दूसरे का पूर्वार्ध कशमकश भरा नज़र आ रहा था। वरना सिंधु मैच में शुरू से ही हावी थीं। जिस पल मिड-गेम ब्रेक के बाद उन्होंने अपने अंतर्द्वंद को ख़त्म कर दिया उसी पल वो कोर्ट में भूखी शेरनी की तरह टूट पड़ीं... वो उस ‘किलर इंस्टिंक्ट’ के साथ कोर्ट में थीं जो अपने यहाँ के खिलाड़ियों में कम ही देखने को मिलती है। 
 
उनके गुरु पुलेला गोपीचंद ने उनके भीतर के इस द्वंद को बहुत बारीकी से पकड़ लिया था। तभी तो उन्होंने एक बार अपनी अकादमी में अभ्यास के दौरान उनसे कहा था कि उनको हर पॉइंट के बाद ज़ोर से चिल्लाना है। वो ऐसा नहीं कर पा रही थीं। गोपीचंद ने उनसे कहा कि अगर वो ऐसा नहीं करेंगी तो वो सिंधु को जिंदगी भर रैकेट नहीं उठाने देंगे... वो ख़ूब रोई पर उसने ऐसा करना शुरू कर दिया।   
उसको अपनी जीत की भूख को जगाना था बजाय दबाने के ... चीखना था... सामने वाली खिलाड़ी पर हावी होना था ... और उन्होंने ऐसा ही किया ...। अब भी उनको ख़ुद से ही लड़ना है ... सामने दुनिया की बेहतरीन खिलाड़ी स्पेन की कैरोलिना मारिन खड़ी होंगी ... करोड़ों भारतीयों की उम्मीदें उन पर टिकी होंगी... पर वो ख़ुद से लड़ेंगी ... और हम सब चाहेंगे कि वो इस संघर्ष में ज़रूर जीतें।
 
मंगल पर यान और चाँद पर इंसान भेजने वाले इस देश में खेलों को लेकर एक नए तरह का जो स्फुरण है, जो रोमांच है, जो उत्साह है वो अच्छा है। बहुत सारी नकारत्मकताओं के बाद भी और बीच भी ये सुकून देने वाला है। क्रिकेट के दीवाने इस देश में अगर लोग आधी रात को जागकर दीपा कर्माकर का प्रदर्शन देख रहे हैं ... अगर वो साँस थामे श्रीकांत किदांबी और पीवी सिंधु का मैच देख रहे हैं तो ये बहुत आशा जगाता है। 
 
हम उम्मीद करें कि सिंधु हम सब के लिए वो सुनहरी चमक लेकर आए जिससे इस देश में खेलों को लेकर ये उत्साह क्षणिक आवेग बनने की बजाए एक व्यवस्थित प्रक्रिया और जीवन शैली का हिस्सा बने, खेलना, लड़ना और जीतना हमारी आदत बने... सोने की चिड़िया .. सोने के अधिक और बेहतरीन तमगे बटोर सके तो ही इस आवेग और उत्साह के मायने हैं ... । 

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