क्या मंज़िल पर पहुँच जाएगी नोटबंदी की रेल?

Author जयदीप कर्णिक|
आठ नवंबर 2016 को रात आठ बजे अचानक ये घोषणा हुई कि अब ये रेल नोटबंदी के स्टेशन की तरफ़ जाएगी। एक ऐसी रेल जिसमें सवार यात्रियों को ना इसके चलने का समय पता था ना अचानक से गंतव्य बदल दिए जाने की जानकारी थी। भीतर बैठे यात्री कुछ चौंक गए, कुछ सकते में आ गए, कुछ सोच में पड़ गए, कुछ घबराए, कुछ हताश, कुछ निर्विकार, कुछ स्थितप्रज्ञ.... और बहुत सारे ख़ुश। जब रेल को हरी झंडी मिली तो हर्ष और जयकारे। उल्लास, उम्मीद और उमंग। ये सब वो लोग थे जो बरसों से इस रेल में बस इसी उम्मीद से सवार थे कि किसी दिन तो ये मंज़िल पर पहुँच ही जाएगी। ये वो लोग थे जो बहुत परेशान रहते थे कि इस रेल को हर ड्राइवर ने अपनी मर्जी कभी रोका, कभी चलाया, चाहे जहाँ घुमाया। और फिर वो स्वार्थी लोग भी थे जो चाहे जब चेन खींचकर इस रेल को रोक देते थे। मनमानी करते थे। उनको जुर्माना कभी होता, तो कभी नहीं होता। कुछ यात्री गुस्सा करते, कुछ चिल्लाते। कुछ कहते कि इस रेल का चालक बदलो। कई बार चालक बदला। कुछ हालात भी बदले। पर मंज़िल दूर ही लग रही थी। 
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कुछ ऐसे भी थे इस रेल में जो चालक बदलने के बाद भी हालात बदलता ना देख किसी ना किसी स्टेशन पर उतरे और रेल ही बदल ली। कभी हिचकोले खाते और कभी सरपट चलती यह रेल आगे बढ़ ज़रूर रही थी। समस्या हर यात्री की अलग थी। सामान्य श्रेणी वालों का संघर्ष वो ही था – खिड़की के रास्ते घुसकर जगह रोक लेने से लेकर, झगड़ा करने, लू के थपेड़े और ठंड की मार सहने से लेकर लकड़ी के फट्टों वाली सीट पर जैसे-तैसे जगह बनाकर सो जाने तक। दूसरे दर्जे वाले कुछ बेहतर स्थिति में थे।
तीसरे, दूसरे और पहले एसी वाले अपने-अपने दर्जे के हिसाब से सुकून और सुविधा में थे। कुछ लोगों के लिए तो अलग सैलून लगा ही हुआ था। उनके अपने डिब्बे थे। अपनी सुख-सुविधाएँ। सामान्य श्रेणी और दूसरे दर्जे वालों तक इनकी ख़बरें भी पहुँचती। वो मन मसोसते और सोचते कि एक ही रेल में सवार होकर भी कितना फर्क है हम में!! पर क्या करते? कुछ नियति मान बैठे। कुछ नियति से लड़ते हुए आगे बढ़े और ज़्यादा दर्जेदार हो गए। कुछ जोड़, जुगाड़ और कुछ आरक्षण से अपग्रेड हो गए। सब अपने दु:ख-सुख और मस्ती में थे। सोच भी यही थी कि अच्छी-बुरी जैसी भी है ये ट्रेन चल तो रही है। इसने भाखड़ा नांगल से लेकर चंद्रयान तक के कितने ही स्टेशन हमें दिखाए!! कभी टकराए भी, कुछ तकलीफ भी हुई, पर ट्रेन चलती रही। 
 
इस बीच चालक फिर बदल गया था। लगा कि ये रेल को एकदम ठीक से चलाएगा। गति भी सही होगी और दिशा भी। रेल ने कुछ रफ्तार भी पकड़ी। पर इंजन और डिब्बे तो वही पुराने थे। इसे अपनी गति से चलाना आसान भी नहीं था। कुछ पुर्जे बदलने की कोशिश हुई। कुछ तेल-पानी। ... और फिर अचानक ये नोटबंदी वाली घोषणा हो गई। ये छोटी घोषणा नहीं थी। एकदम से झटका देने वाली घोषणा थी। एकदम पिछले सामान्य दर्जे के अनारक्षित कोच में बैठे यात्री से लेकर एकदम आगे वीवीवीआईपी सैलूनों में बैठे खासमखास तक सभी को प्रभावित करने वाला निर्णय था। बहुतों में तो हर्ष इसीलिए था कि ये एसी और ख़ास डिब्बों वाले अब मजा चखेंगे। मस्ती उनकी भी निकल जाएगी जो बिना टिकट लिए इस रेल में सवार हो गए, ऊधम भी मचाते हैं, बाकी यात्रियों को भी धमकाते हैं, खाते भी इसी रेल का हैं पर इनका कुछ नहीं बिगड़ता। टीटी भी इनका चालान नहीं बना पाता।

ऐसा लगा कि नोटबंदी का ये नया स्टेशन पता नहीं कितने चमत्कार कर देगा। ये ऊधम मचाने वाले कालेधन और रेल की रफ्तार रोकने वाले भ्रष्टाचार का तो रास्ते में ही दम निकल जाएगा। इस बीच इंजन से लेकर बोगी तक कुछ सुधार जारी रहेंगे और फिर तरक्की, उम्मीद और विश्वास के स्टेशनों को पार कर ये रेल मंजिल पर पहुँच ही जाएगी। ज़्यादा डिब्बे तो सामान्य और दूसरे दर्जे के ही थे। ये सब तो कब से ही चाहते थे कि हमारा सफर भी कुछ आरामदायक हो, हमें भी सुविधा मिले। अच्छे खाने और आरामदायक बिस्तर की जो बंदरबाँट आगे हो रही है वो रुके और कुछ हम तक भी पहुँचे। तो वो तो अपने पूरे आशावाद के साथ खिड़की से बाहर झाँक कर इसे नए सफर पर चल पड़े। 
 
इनसे कहा गया कि कुछ दिक्कत होगी। कुछ हिचकोले भी आएँगे। आपको अगले कुछ स्टेशनों पर खाने-पीने की भी दिक्कत आएगी। पर उसके बाद के स्टेशन एक से एक आएँगे। तो वो तो सब तैयार हो गए। हमारी तो कितनी ही पीढ़ियाँ इसी आशावाद से इस रेल में सवार हैं साहब! ये सब सपने तो पहले भी दिखाए गए। पर मंज़िल आई ही नहीं। पर अब लगता है कि आ ही जाएगी। सो हम सब तकलीफ झेल लेंगे। आप तो चलाओ गाड़ी!  
 
रेल जैसे-जैसे आगे बढ़ती, कुछ नए नज़ारे देखने को मिलते कुछ नई घोषणाएँ होती रहतीं। सब ध्यान से सुनते। तकलीफ तो बहुत थी। पर उफ्फ करने वाले बहुत कम थे। कुछ चिल्लाना चाह भी रहे थे तो चेहरे पर मुस्कुराहट थी– बेटिकट जो थे। कुछ वो लोग जिनको लगता है कि रेल तो बस वो ही बेहतर चला सकते हैं, वो चिल्लाने भी लगे। पर उनकी आवाज़ बहुत हद तक अनसुनी ही रही। क्योंकि वो भी चालक बनने की दौड़ में शामिल हैं सो उनके खींचे से तो ये रेल नहीं रुक रही फिलहाल। फिर दूसरे और सामान्य दर्जे वालों को पता लगा कि खाना और कंबल तो फिर से आगे ही बँट गए!! चालक भले ही बदल गया हो, ये बाँटने की व्यवस्था और बाँटने वाले तो वही हैं!! अब एकसाथ ये सारा स्टाफ तो बदला नहीं जा सकता।

सवाल ये भी है कि इतना सारा ऐसा स्टाफ है क्या जो साधनों का बँटवारा सही तरीके से कर सके?? बहरहाल घोषणा ये हुई कि चिंता मत करो, आप तो इस नोटबंदी के स्टेशन पर ध्यान दो। ये गलत बाँटने वालों को हम सजा भी देंगे। कुछ को सजा होने भी लगी। सवाल वही था कि इतने चेकिंग करने वाले भी तो चाहिए!! कुछ ने अपने नए टिकट बनवा लिए, नए तकिए, कंबल ले लिए और निश्चिंत हो गए। कुछ चेन खींचकर भागे और कुछ अब भी जुगाड़ में सिर धुन रहे हैं। इसी बीच रेल की गति कुछ धीमी होने लगी। पता चला कि सबसे बड़ी दिक्कत क्या है? 
 
इस रेल को अचानक नोटबंदी की तरफ मोड़ देने में सबसे बड़ी दिक्कत ये ही थी कि जिस तरफ अब इस रेल को चलना था वहाँ आगे पटरी बिछी हुई नहीं थी!! और चुनौती यही थी कि रेल की दिशा बदलने के बाद रेल के पहुँचने से पहले पटरी बिछाते जाना है। रेल तो अब पलट नहीं सकती थी, ये तय है। सो रेल कहीं गिर ना जाए इस डर से बस पटरी बिछाते जाना है। आप अंदाज़ लगा सकते हैं कि ये कितना जोखिम भरा और चुनौतीपूर्ण काम है!! कुछ लोग तो साहस के साथ आगे की पटरी बिछाने में जुट गए। कुछ को समझ में आ गया कि इसके अलावा कोई चारा नहीं। वो भी काम पर लग गए। कुछ शांत और संयमित रहे। कुछ ने सोचा खाना नहीं तो बिस्किट ही मिल जाएंं, काम चला लेंगे! कुछ को लगने लगा कि ये क्या बेवकूफी हुई, ये रेल किस दिशा में मोड़ दी? ये तो आगे जाकर बेपटरी हो जाएगी!! टकरा जाएगी! ये स्टेशन ही गलत है!! 
 
कुछ ने पूछा अगर रेल यहाँ ले ही जानी थी तो फिर पहले से पटरी क्यों नहीं बिछाई? जवाब आया– ये संभव नहीं था, अगर पहले से नया स्टेशन बता देते तो बदमाश लोग चेन खींच देते और फिर ना रेल उस दिशा में जा पाती, ना हम नए स्टेशन पर पहुँच पाते!! सो अब हम पटरी बिछाते जा रहे हैं, आप चिंता ना करें हम मंज़िल पर ज़रूर पहुँचेंगे। इतनी बड़ी और भारी रेल के लिए पटरी बिछाते जाना कोई मजाक तो है नहीं? और ऐसा भी नहीं है कि आगे पटरी बिलकुल भी नहीं है। ये झूठा भ्रम फैलाया जा रहा है। कई जगहों पर पटरी है और अच्छे से बिछी है। ये तो पुराने चालकों का स्वार्थ था, जो रेल को कभी इधर से गुजरने ही नहीं दिया। अब जब रेल चल ही पड़ी है तो बाकी पटरी भी बिछ ही जाएगी।
 
इस सब में ख़ास बात ये है कि रेल को यों अचानक इस नए स्टेशन की तरफ मोड़ देने वाले चालक को लेकर, और इसे यों अचानक मोड़ देने के दुस्साहस पर उँगली कम ही उठी। नई मंजिल की आशा से भरे लोग परिणामों और प्रभावों के आकलन में पड़े बगैर बस चालक में भरोसा जताने की कोशिश कर रहे थे/हैं। उनको लगता है कि आख़िर किसी ने तो ये किया। हिम्मत तो की। और जिस तरीके से वो रेल चल रही थी वो तो हमें भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, आतंकवाद, नक्सलवाद, कालाधन और स्वार्थ के स्टेशनों से गुजरती हुई एक लंबी गहरी सुरंग में ही तो ले जा रही थी। वहाँ से तो हम विनाश के काले समंदर में ही डूब जाते!! नहीं क्या? तो फिर किसी ने साहस से पूरी ताकत लगाकर अगर हैंडल घुमा ही दिया है, रेल की दिशा बदल ही दी है तो फिर ग़लत क्या है? हमें तो नए मुकाम पर पहुँचने के लिए बस पटरियाँ बिछाते जाना है!! 
 
हम उम्मीद ही कर सकते हैं कि ये सारा आशावाद उतना ही सच हो जितना कि ये दिखाई दे रहा है। इस सफर के लिए पटरियाँ बिछाने में कुछ लोगों की जान भी गई है और कुछ हताहत भी हुए हैं। आगे कितने होंगे ये अभी तय नहीं। पर उम्मीद तो ये ही की जा सकती है कि अभी जिस बोगदे में ये रेल घुस चुकी है, इसके उस पार नई सुबह का वो उजाला हमारा इंतज़ार करता हुआ मिलेगा। नोटबंदी कि ये ट्रेन मंज़िल पर पहुँचे, इसके आख़िरी डिब्बे में बैठे यात्री को भी वो स्टेशन दिखाई दे, इस इंतज़ार में हम सब इस रेल के खिड़की-दरवाज़ों पर टकटकी लगाए बैठे हैं। ये कब पहुँचेगी पता नहीं। पहुँचेगी भी कि नहीं, पता नहीं। पर ये सफर तो फिर भी तय करना है। और फिर कहीं ये भी तो बताते चलना है कि जो आने वाला है वो भी बस एक स्टेशन ही है, मंज़िल तो अब भी बहुत दूर है।

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