परफेक्शनिस्ट दिलीप कुमार

समय ताम्रकर|
में भले ही को परफेक्शनिस्ट कहा जाता है, लेकिन भी अभिनय और हर काम के मामले में परफेक्शनिस्ट माने जाते हैं।

दिलीप साहब हर काम को अपनी गति से करना पसंद करते हैं। वे कभी भी कोई काम हड़बड़ी या जल्दबाजी में नहीं करते। उनकी गति से सामने वाले को तालमेल बैठाना पड़ता है। परफेक्शन के चक्कर में काम की गति धीमी पड़ जाती है, शायद इसीलिए दिलीप साहब ने अपने लंबे करियर में बहुत ही कम फिल्में की हैं।

एक फिल्म में दिलीप कुमार को पतंग उड़ाना थी। इस छोटे-से सीन के लिए उन्होंने पतंग की डोर कैसे बनाई जाती है से लेकर पेंच लड़ाने तक के सारे गुर सीखे और उसके बाद ही शॉट दिया। इसी तरह एक फिल्म में दिलीप कुमार को वाद्य यंत्र बजाना था। निर्देशक ने कहा आपको तो सिर्फ ऊँगली घुमाना है और ये शॉट तुरंत फिल्मा लेते हैं। लेकिन दिलीप साहब इसके लिए राजी नहीं हुए। उन्होंने दो महीने तक वो वाद्ययंत्र सीखा और उसके बाद जाकर शॉट दिया।

अभिनय के मामले में ही नहीं बल्कि निजी जिंदगी में भी वे हर काम पूरी तल्लीनता और परफेक्शन के साथ करते हैं। उन्हें किसी समारोह भाषण देना हो तो वे पूरी तैयारी करते हैं। कहाँ जाना है, किन लोगों के सामने बोलना है, क्या बोलना है। सभी बातें मालूम करने के बाद वे अपना भाषण तैयार करते हैं।

वेबदुनिया हिंदी मोबाइल ऐप अब iOS पर भी, डाउनलोड के लिए क्लिक करें। एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें। ख़बरें पढ़ने और राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।



और भी पढ़ें :