विश्वास सलीब पर

उमेश त्रिवेदी|
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यह संभव नहीं है कि मनमोहनसिंह सरकार द्वारा प्रस्तुत विश्वास मत पर बहस के दौरान मंगलवार को संसद में राजनीति का जो नंगा नाच हुआ, उसे कोसने या गरियाने के लिए शब्दों को भी नंगा किया जाए। हम एक सभ्य समाज का हिस्सा हैं, जिसकी अपनी आचार संहिता, मर्यादा और नैतिक दायरे हैं। इसलिए हम उस भाषा और आचरण का इस्तेमाल नहीं कर सकते जो निषेध माने जाते हैं, लेकिन शर्मसार कर देने वाली ऐसी घटना पर चुप रहना भी संभव नहीं है।

  मनमोहनसिंह सरकार द्वारा प्रस्तुत विश्वास मत पर बहस के दौरान मंगलवार को संसद में राजनीति का जो नंगा नाच हुआ, उसे कोसने या गरियाने के लिए शब्दों को भी नंगा किया जाए। हम एक सभ्य समाज का हिस्सा हैं, जिसकी अपनी आचार संहिता, मर्यादा और नैतिक दायरे हैं      
हम जानते हैं कि सही अर्थों में प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए जो शब्द इस्तेमाल करना पड़ रहे हैं, उनमें लोगों को कम तेजाब महसूस होगा, निश्चित ही उनकी अपेक्षा उससे ज्यादा होगी, लेकिन संभव नहीं है कि जिम्मेदार मीडिया के नाते हम उतने ही नंगे हो जाएँ, जितने कि संसद में आज हमारे राजनेता और राजनीतिक दल हुए।

संसदीय व्यवस्था में सरकारों के खिलाफ विश्वास या अविश्वास प्रस्तावों का रखा जाना, मंजूर होना या खारिज होना लोकतंत्र की एक सामान्य प्रक्रिया है। इसके पहले भी प्रतिपक्ष ने लोकसभा में सरकारों के खिलाफ छब्बीस बार अविश्वास के प्रस्ताव रखे और नौ मर्तबा केंद्र सरकार ने सदन का विश्वास हासिल करने के लिए सांसदों के समक्ष पेशकश की।

इस प्रक्रिया में सरकारें हारी भी, जीती भी। उस दरमियान भी पक्ष-विपक्ष में मतदान के लिए सौदेबाजी के किस्से चर्चा में आए, राजनीतिक लेन-देन भी हुआ, लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि पूरे देश को शर्मिंदा होना पड़े।

  सांसदों की तोड़फोड़ की गरज से रिश्वत का लेना-देना या उसकी रिकॉर्डिंग करना घटनाक्रम का एक पहलू है। इसके गुण-दोषों या सचाई की जाँच-पड़ताल लंबे समय तक होती रहेगी, लेकिन मुद्दा यह है कि देश के राजनीतिक दल या सांसद खुद क्यों बिक रहे हैं      
आज जब भारतीय जनता पार्टी के तीन सांसद 1 करोड़ रु. लेकर संसद के गर्भगृह में पहुँचे तो पूरा देश तमाशा देख रहा था। उनका कहना था कि यह राशि यूपीए सरकार के पक्ष में मतदान करने या अनुपस्थित रहने के लिए रिश्वत के रूप में दी गई है। रिश्वत के लेन-देन की रिकॉर्डिंग भी उनके पास है।

सांसदों की तोड़फोड़ की गरज से रिश्वत का लेना-देना या उसकी रिकॉर्डिंग करना घटनाक्रम का एक पहलू है। इसके गुण-दोषों या सचाई की जाँच-पड़ताल लंबे समय तक होती रहेगी, लेकिन मुद्दा यह है कि देश के राजनीतिक दल या सांसद खुद क्यों बिक रहे हैं अथवा क्यों खरीदे-बेचे जा रहे हैं? उन्हें कौन खरीद रहा है, कौन बेच रहा है, क्यों खरीद रहा है, क्यों बेच रहा है? संसद लोकतंत्र की आस्थाओं का मंदिर है या तवायफों का बाजार, जहाँ हर चीज बिकाऊ होती है।

सवाल है कि आज के घटनाक्रम के लिए कौन दोषी है? क्या इसे रोका नहीं जा सकता था? साठ साल से लोकतंत्र की दुहाई दी जा रही है? उस लोकतंत्र के गौरव को बचाने की जिम्मेदारी किस पर है। सोनिया गाँधी, मनमोहनसिंह, लालकृष्ण आडवाणी, प्रकाश करात, मुलायमसिंह, मायावती का निजी या इन सबका सामूहिक दायित्व नहीं है कि वे लोकतंत्र की गरिमा को खंडित नहीं होने दें?

  सिर्फ 1 करोड़ करंसी सदन में फेंक देने मात्र से यह नहीं सिद्ध हो सकेगा कि यह राशि बतौर रिश्वत भाजपा सांसदों को दी गई। फिर जिस 'स्टिंग ऑपरेशन' या रिकॉर्डिंग की बात उनके सांसद कर रहे हैं, क्या वह प्रायोजित या 'फेब्रिकेटेड' नहीं हो सकता      
संसद की मर्यादा को खंडित करने के पाप में सब बराबर के भागीदार हैं, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने मंगलवार को संसद में जो कुछ किया, क्या वह अतिरंजित नहीं था? जो लालकृष्ण आडवाणी देश के प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं, क्या वे इस तथाकथित 'एक्सपोजर' को जरूरी मानते हैं? उन्हें जनता के मन में घुमड़ रहे कई सवालों का जवाब देना होगा, क्योंकि मंगलवार को संसद में भाजपा के तीन सांसदों ने जो किया, प्रतिपक्ष के नेता के नाते सीधी-सीधी जिम्मेदारी उनकी है।

क्या उन्हें नहीं पता था कि सिर्फ 1 करोड़ करंसी सदन में फेंक देने मात्र से यह नहीं सिद्ध हो सकेगा कि यह राशि बतौर रिश्वत भाजपा सांसदों को दी गई। फिर जिस 'स्टिंग ऑपरेशन' या रिकॉर्डिंग की बात उनके सांसद कर रहे हैं, क्या वह प्रायोजित या 'फेब्रिकेटेड' नहीं हो सकता? यदि सांसदों को रिश्वत के पैसे दिए जाने की सूचना थी तो उसकी पूर्व सूचना पुलिस या मीडिया को क्यों नहीं दी गई? जिन सांसदों ने नोट पेश किए, उनमें से एक फग्गनसिंह कुलस्ते को भाजपा स्वयं विकास निधि के दुरुपयोग के मामले में निलंबित कर चुकी है। ऐसे लोगों के आरोपों की विश्वसनीयता तो वैसे ही संदेह के घेरे में आ जाती है।

फिर जो घटना सदन के बाहर हुई, उस घटना को सदन की कार्रवाई का हिस्सा बनाना कितना जायज है? इस घटना से भाजपा को क्या हासिल हुआ? क्या यह पता नहीं था कि नोट कांड से सारी दुनिया में भारत का लोकतंत्र बदनाम हो जाएगा? यह बात रिकॉर्ड में दर्ज हो जाएगी कि भारत की संसद में ऐसे कारनामे भी होते हैं?

भाजपा चाहती तो देश का लोकतंत्र मंगलवार को इस तरह शर्मसार होने से बच सकता था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका, क्योंकि उसने अपने राजनीतिक स्वार्थों और राजनीतिक इरादों को देश से ऊपर और देश के लोकतंत्र से ऊपर रखा...। देश की जनता किस पर विश्वास करे, क्योंकि कोई भी देश को आगे रखकर काम नहीं कर रहा है। जनता की बातें उनके लिए गौण हैं। सत्ता उनके लिए सर्वोपरि है। इसके लिए देश और लोकतंत्र की अस्मिता और हित सबकुछ दाँव पर लगाने के लिए तैयार हैं। मंगलवार को भाजपा ने जो कुछ किया, देश उसे आसानी से भुला नहीं पाएगा। भाजपा को इससे बचना चाहिए।

भारत के लोकतंत्र ने कई विपरीत परिस्थितियों में मजबूती का परिचय दिया है। देश के भीतर से बाहर कई ताकतें चाहती हैं कि लोगों में लोकतंत्र के प्रति आस्था कम हों। अलग तरीके से इसके लिए कोशिशें भी होती रही हैं, लेकिन भारत का लोकतंत्र ऐसे सभी संकट से उबरता रहा है। हमें विश्वास है कि इस संकट से भी वह उबर आएगा...।
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