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माँ की यादों के सघन रेशमी आँचल में

इस बार 'शेष है अवशेष' ब्लॉग की चर्चा

रवींद्र व्यास|
अनुराग अपने परिचय में कहते हैं कि -हमेशा कोशिश होती है कि कुछ नया करूँ, कुछ अलग करूँ। कुछ ऐसा रचूँ, जो ख़ुद के जी के साथ-साथ दूसरों के मन को भी भाए। मुझे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की यह कविता बेहद लुभाती है :

'लीक पर वे चलें
जिनके चरण दुर्बल और हारे हैं।
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पथ प्यारे हैं।'

जाहिर है, मेरा मन हमेशा अपने अनगढ़ तरीके से बनाए रास्ते को पसंद करता है पर दूसरों की कोई सलाह या सुझाव रास आ जाए तो उसे स्वीकार भी करता है और उस पर अमल भी। शायद उनका यह उनके नई राह और अलग राह पर चलने की जिद का एक सार्थक परिणाम है। इसी पर उन्होंने अपनी माँ की एक और मार्मिक कविता पोस्ट की है। -

कैसे बीत जाते हैं!
प्यार और खुमार में डूबे हुए,
मीठे मनुहारों-से रूठे हुए,
उजले फव्वारों-से भीगे हुए,
कैसे बीत जाते हैं वर्ष!

चक्की के पाटों में पिसे हुए,
जिंदगी के जुए में जुते हुए,
भारी चट्टानों से दबे हुए,
कैसे बीत जाते हैं वर्ष!

मौसम की चौरंगी चादर-से
बोरों में भरे हुए दुःख,
मुट्ठी भर हर्ष
विजय पराजय के नाम के संघर्ष,
कैसे बीत जाते हैं वर्ष!

टूटे संबंधों के धागे-से,
दूर की यात्रा में संगी-से,
कैसे बीत जाते हैं वर्ष!

कितनी मार्मिक और जीवन रस से छल-छल कविता है यह। इस ब्लॉग पर जाना ऐसा लगता है जैसे हम अपनी ही माँ के उस कमरे में से होकर आ रहे हैं जो उनके जाने के बाद अक्सर ही अंधेरे में बंद रहता है। और हम इसमें जाकर एक बार फिर अपनी माँ को पा लेते हैं, उसकी यादों के आँचल में मचल जाते हैं, उसके स्नेहाशीष में भीग जाते हैं। किसी भी माँ से मिलना अपनी माँ से मिलने जैसा लगता है। क्या आप भी अपनी माँ से मिलना नहीं चाहेंगे। यदि हाँ, तो यहाँ जरा धैर्य के साथ हो आइए। ये रहा माँ का पता-

http://shailpriya.blogspot.com
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