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ब्लॉग चर्चा में आलोक पुराणिक का अगड़म-बगड़म

रवींद्र व्यास| Last Updated: बुधवार, 1 अक्टूबर 2014 (19:49 IST)
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ब्लॉग की दुनिया फैल रही है। फल रही है, फूल रही है। खिल रही है, महक रही है। समाज से लेकर राजनीति, अर्थ से लेकर विज्ञान तक, खेल से लेकर रोमांच तक, काम से लेकर धाम तक, ज्योतिष से लेकर खगोल तक। रोग से लेकर राग तक और रंग से लेकर व्यंग्य तक भी। कई रंगतें हैं, कई तेवर। इसी दुनिया में एक तेवर व्यंग्य का भी है। व्यंग्यकार हैं आलोक पुराणिक और उनका ब्लॉग है- आलोक पुराणिक की अगड़म-बगड़म।

इनके व्यंग्य कई पत्र-पत्रिकाओं में छपते हैं। यहाँ भी वे उन्हीं तेवरों के साथ हैं। उनके व्यंग्यों में वक्रता है, मारकता है। ये कभी हँसाते हैं, कभी गुदगुदाते हैं और कभी तीखा कटाक्ष करते हुए सोचने पर भी विवश करते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि बात को कहने का अंदाज अनूठा है, इसीलिए ये पठनीय हैं। डॉलर माँगता है शीर्षक व्यंग्य का एक नमूना देखिए-

बच्चो, आज नए टॉपिक पर डिस्कशन करेंगे- पार्लियामेंट में नोट फॉर वोट पर जाँच शुरू हो गई है। इस मसले को सीरिसयली समझो। आपत्तिजनक बात है कि पार्लियामेंट में नोटों की गड्डी उछाली गईं- मैंने क्लास में पढ़ाई शुरू की।

  मोबाइल कंपनी से आवाज आएगी- अगर आप लश्कर-ए-तोइबा से हैं, तो 1 दबाइए, लश्कर ए झँगवी से हैं, तो 2 दबाइए, अगर मुजाहिदीन इंटरनेशनल से हैं, तो 3 दबाइए, तालिबान पाकिस्तान से हैं, तो 4 दबाइए, मेन मैनू के लिए जीरो दबाइए।      
इसमें आपत्तिजनक क्या है, अभी इंडिया इत्ता ग्लोबलाइज थोड़े ही हुआ है कि यहाँ डॉलर उछाले जाते। भारत है, यहाँ नोट ही उछाले जाएँगे। सरजी अब रेजगारी तो नहीं उछाली जा सकती, सदन में। सदन की गरिमा का भी ख्याल रखना होता है। रेजगारी उछलती देखकर मुझे एक पुराना गीत याद आ जाता है- राजा दिल माँगे चवन्नी उछालकर। अब माननीय सांसदों के लिए इस तरह के भाव न उठें, इसलिए नोटों की गड्डी ही उछाली गई।
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