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Written By रवींद्र व्यास

ब्लॉग की दुनिया में खिलते हजारों फूलों के लिए

ब्लॉग की दुनिया में खिलते हजारों फूलों के लिए -
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ब्लॉग की दुनिया ने अभिव्यक्ति की नई और कई खिड़कियाँ खोल दी हैं। एक तरफ ये खिड़कियाँ हमारा उस संसार से परिचय कराती हैं जो मीडिया की मुख्य धारा में आने से हमेशा से वंचित रहा है और उसे गाहे-बगाहे ही कहीं मुश्किल से जगह मिलती थी। दूसरी तरफ ये खिड़कियाँ उन अनाम लोगों के दिलों और उनके सुख-दुःख में झाँकने का मौका भी देती हैं जो अपनी बात को कहने के लिए किसी अखबार, पत्रिका, रेडियो या टीवी पर निर्भर थे।

ब्लॉग की दुनिया ऐसे लोगों के लिए बाँहे पसारे उन्हें अपने पास बुला रही है और कह रही है कि आओ और अपनी बात को कहो। यहाँ किसी प्रकाशक और संपादक का कोई दबाव नहीं, कोई नियंत्रण नहीं, कोई संपादकत्व नहीं। जैसा कि चीन के महान नेता माओ त्से तुंग ने कहा था कि एक साथ हजारों फूलों को खिलने दो, ब्लॉग दुनिया ने उस बात को एक हद तक संभव बनाया है।

इन दिनों लिखे जा रहे ब्लॉगों को पढ़ेंगे तो पाएँगे कि यहाँ हजारों लोग हजारों तरीके से हजार तरह की बातें लिख रहे हैं और ब्लॉग की दुनिया में खिलते और खुलते हुए अपने रंग औऱ खुशूब फैला रहे हैं। मुख्य धारा के विपरीत इस दुनिया ने अपना एक प्रति संसार रच लिया है जहाँ अपने मन की बातें लोग बेधड़क और बेहिचक लिख रहे हैं।
  ब्लॉग की दुनिया ने अभिव्यक्ति की नई और कई खिड़कियाँ खोल दी हैं। एक तरफ ये खिड़कियाँ हमारा उस संसार से परिचय कराती हैं जो मीडिया की मुख्य धारा में आने से हमेशा से वंचित रहा है और उसे गाहे-बगाहे ही कहीं मुश्किल से जगह मिलती थी।      


ब्लॉग की इस परम और चरम लोकतांत्रिक व्यवस्था ने लगातार बेचैन और बेकरार लोगों को वह जगह दी है जहाँ वे हर तरीके से अपनी बातों को कहने के लिए रोज ही कुछ न कुछ लिख रहे हैं। इनमें प्रेम के खिलते हुए फूल हैं, हताशा की पीली होती पत्तियाँ हैं, दुःख की रिमझिम है, सपनों के झुलसे हुए पंख हैं तो उम्मीद के आसमान में आत्मविश्वास की उड़ान भी है।

इसमें किसी के गाल पर सूख चुकी आँसू की लकीर है तो रोम-रोम बहती खुशी की उमंगें भी हैं। टूटन की धीमी आवाज है तो, नई कली के चटकने की आवाज भी। यदि जिंदगी की ढलती शाम में पतझड़ का पीला होता आकाश है तो कहीं नई कोंपलें हवा में हिलती अपनी मौजदूगी का कोमल अहसास भी करा रही हैं। कहीं नए विचार की चमक है, तो कहीं बड़े लेखक की धमक भी।

और हाँ, इन हजारों खिले फूलों से महकती दुनिया में किसी गायक का सीने को चाक कर देने वाला आलाप है तो किसी गायिका का विकल कर देने वाला तराना भी है भी। कहीं भुला दी गई गायिका की आवाज में एक विरहणी का झरता दुःख है तो प्रेम में विह्लल स्त्री का गुनगुनाता संसार भी है।

तो जाहिर है कि अभिव्यक्ति के इस नए संसार की कैसे अनदेखी की जा सकती है। इसलिए वेबदुनिया एक बार फिर अपने कॉलम ब्लॉग चर्चा की आज से इस भूमिका के साथ शुरुआत कर रहा है जिसमें नामी-गिरामी ब्लॉगरों के साथ ही अनाम ब्लॉगरों के ब्लॉग पर हर शुक्रवार चर्चा होगी। तो मिलते हैं अगले शुक्रवार एक ब्लॉग के साथ।