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ब्लॉग चर्चा में इस बार इंडियन बाइस्कोप

WD
अतीत के चलचित्र पोस्ट में उनका कहना कितना दुरुस्त है कि- कभी निर्मल वर्मा ने इस उपन्यास के सिलसिले में कहा था कि एक अच्छे उपन्यास कपहचान यह होती है कि उन शब्दों में बसा जीवन हमारे खुद के जीवन में उतर आता है। क्या यह सिनेमा का भी सच नहीं है? सिनेमा उतना ही मेरी यादों में बसा है, जितनी कि मेरे वास्तविक जीवन की छवियाँ... प्रोजेक्टर के पीछे से झिलमिलाती रंगीन रोशनियाँ आती-जाती साँसों में बस चुकी हैं।

यही नहीं, एक अन्य पोस्ट में वे हॉलीवुड की एमिनेशन फिल्मों की बेहतर और परिष्कृत फिल्मों पर अपने ढंग से, निहायत ही सादगीपन से टिप्पणी करते हुए आइस एज की खूब तारीफ करते हैं और इसके बहाने उसकी मार्मिकता और मानवीय संदेश का महत्व बताते हैं। इसके अलावा वे हॉलीवुड की उन फिल्मों का भी नोटिस लेते हैं जिसमें भयावह समय की कल्पना की गई है और जिन फिल्मों को स्पेशल इफेक्ट्स, निर्देशकीय क्षमता और कल्पनाशीलता से एक देखने लायक अनुभव बना दिया गया है। इसमें वे ट्रांसफॉर्मर से लेकर डाई हार्ड, जुरासिक पार्क से लेकर मैट्रिक्स तक पर बात करते हैं

जेपी दत्ता निर्देशित और सनी देओल अभिनीत फिल्म यतीम पर वे निर्देशकीय कुशलता का बयान करते हैं तो सनी देओल को एक नई दृष्टि से देखे जाने की प्रशंसा भी करते हैं।

रवींद्र व्यास|
लो दिल की सुनो दुनिया वालों पोस्ट में वे सिनेमा से जुड़ी अपनी निजी यादों का आत्मीयता से बखान करते हैं जिनमें पोस्टर से लेकर, कवर्स और ग्रामोफोन रिकॉर्ड्‍स की सुनहली यादें हैं। वे इसमें लिखते हैं कि सिनेमा अपने आसपास खूबसूरत रचनात्मक संसार रचते हुए चलता है। इसमें उन्होंने याद किया है कि किस तरह ब्लडप्रेशर की शिकार उनकी माँ रात को लाइट बंद कर बिस्तर पर लेटकर उनसे ग्रामोफोन पर गाने सुनवाने के लिए कहती थी। कहने की जरूरत नहीं कि और मैं यह बात पहले भी कहीं कह चुका हूँ कि हिंदी फिल्मी गीतों ने न जाने कितने हजारों-लाखों लोगों को उनके जीवन में किसी मोड़ और मूड्स पर कितनी राहत दी होगी, उनके दुःख में उन्हें कितने खूबसूरत अंदाज में थाम लिया होगा। श्रीनेत की यह पोस्ट इसकी एक मार्मिक झलक प्रस्तुत करती है।
किस्सा-ए-बॉलीवुड तथा अतीत के कुछ और चलचित्र या किस्सा-ए-बॉलीवुड में वे अपने किशोरवय में देखी फिल्मों से जुड़ी अपनी यादों को शेयर करते हैं तो भविष्य में लड़ी जाने वाली जंग में वे हॉलीवुड की कुछ खास फिल्मों पर टिप्पणी करते हैं जिनमें टर्मीनेटर से लेकर मैट्रिक्स फिल्में शामिल हैं। किस्सा-ए-बॉलीवुड शीर्षक अपनी पोस्ट में वे लिखते हैं कि भाषा अक्सर आड़े आती थी। परिवेश भी अनजाना था और उँगली पर गिने जाने लायक अभिनेताओको हम पहचानते थे। इसके बावजूद कई छवियाँ आँखों से होती मन में और मन से होती अतीहोती किसी अँधेरी गुफा में भीत्ति चित्र की तरह कैद हो गई हैं....
कल तुमसे जुदा हो जाऊँगा गीत को भावुकता से याद करते हैं और कहते हैं कि यह हिन्दी सिनेमा का न भुलाने वाला गीत बन गया। पहला गीत जीवन के नश्वर होने की बाकहता है मगर इसकी खूबी यह है कि यह आपके भीतर बेचारगी का भाव नहीं पैदा करता। यदरअसल जीवन के प्रति एक ईमानदार स्वीकारोक्ति है। यह आपको अहंकार से मुक्त होने कलिए नहीं कहता, आपको खुद-ब-खुद अहंकार से मुक्त कर देता है।

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