अमृता प्रीतम की याद में बहती अमृता-धारा

इस बार ब्लॉग चर्चा में रंजना भाटिया का ब्लॉग

रवींद्र व्यास|
यहाँ अमृता प्रीतम की कविताएँ, नज्में हैं तो कहानियाँ भी हैं और उपन्यास के खूबसूरत टुकडे भी हैं। इन्हें प्रस्तुत करते हुए रंजनाजी अपनी तरफ से कोई मार्मिक बात भी जोड़ती चलती हैं। कविताओं के सहारे एक कोलाज भी बनाती चलती हैं। उदाहरण के लिए इमरोज-अमृता के जीवन के एक प्रसंग की बात करते हुए वे अमृता की यह कविता कोट करती हैं-
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आज पवन मेरे शहर की बह रही
दिल की हर चिंगारी सुलगा रही है
तेरा शहर शायद छू के आई है
होंठों की हर साँस पर बेचैनी छाई है
मोहब्बत जिस राह से गुजरकर आई है
उसी राह से शायद यह भी आई है

इस तरह की खूबसूरत चीजें इस ब्लॉग पर जगह-जगह बिखरी पड़ी हैं। यही नहीं इसमें अमृता के व्यक्तित्व के कई पहलुओं को छूती हुई पोस्ट भी हैं। जैसे बच्चों के प्रति अथाह प्रेम की वे बातें जिसमें वे रूस यात्रा में देखे एक स्कूल को देखकर लिखती हैं। इसमें वे लिखती हैं-जैसे मैं हैरान और खुश हुई इसी तरह तुम भी होंगे कि इस स्कूल में सिर्फ़ वही बच्चे लिए जाते हैं, जिनके माँ-बाप जंग में मारे गए या अपंग हो गए हैं ...इसके अलावा उस माँ-बाप के बच्चे जो ज्यादा बच्चे होने के कारण उनका लालन-पालन अच्छी तरह से करने में असमर्थ हैं .....स्कूल में दाखिला लेने में मुश्किल का सवाल ही नहीं, स्कूल वाले गाँव-गाँव घूम-घूमकर जरूरतमंद बच्चो को ढूँढते हैं .....इस वक्त इस स्कूल में 290 बच्चे हैं और अगले महीने तीन सौ बच्चे और आ रहे हैं ...
इस ब्लॉग पर कई ऐसी पोस्ट हैं जिनके जरिये अमृता प्रीतम की जिंदगी के फलसफे को बाआसानी समझा-महसूसा जा सकता है कि उनके लिए एक फूल, हवा, पानी और मोहब्बत, रिश्ते और इन सबसे ऊपर गहरी मानवीयता के क्या मायने होते हैं। इस ब्लॉग को पढ़ना एक बार फिर से मोहब्बत के मुलायम फलसफे को समझना है।

मिसाल के तौर पर अमृताजी के इस खूबसूरत टुकड़े पर गौर फरमाएँ-""इश्क समतल सपाट भूमि का नाम है न ही घटनारहित जीवन का सूचक। जब यह भूमि होता है तब इसके अपने मरुस्थल भी होते हैं, जब यह पर्वत होता है तब इसके अपने ज्वालामुखी भी होते हैं, जब यह दरिया होता है तब इसके अपने भँवर भी होते हैं, जब यह आसमान होता है तो इसके अपने तारे और अपनी बिजलियाँ भी होती हैं, यह खुदा को मोहब्बत करने वाले की हालत होती है ...जिसमें खुदा के आशिक को अपने बल पर विद्रोह करने का भी हक भी होता है और इनकार करने का भी। यह ऐसे हैं जैसे कि खुले आकाश के नीचे जब कोई छत डालता है वह असल आकाश को नकारता नहीं है .""
अमृताजी की यह अमृताधारा ही तो है। इसे ओक में भरकर थोड़ा पी लें, समझ लें और जी लें।
इसे पढ़ने के लिए पता ये रहा-

http://amritapritamhindi.blogspot.com

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