25 दिसंबर पर विशेष : क्रिसमस का शुभ संदेश

Jesus
- डॉ. केपी पोथन

क्रिसमस संपूर्ण विश्व का एक महत्वपूर्ण त्योहार है। क्रिसमस सभी राष्ट्रों एवं महाद्वीपों में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के आँक़ड़ों के अनुसार विश्व के करीब 150 करोड़ लोग ईसाई धर्म के अनुयायी हैं। सौभाग्यवश भारत में भी क्रिसमस मनाया जाता है यद्यपि यहाँ की जनसंख्या के केवल 2.5 प्रतिशत ईसाई लोग हैं।
ईसा के बारह शिष्यों में से एक, संत योमस, ईस्वी वर्ष 52 में दक्षिण भारत आए थे। योमस सुतार का धंधा करते थे और उन्होंने दक्षिण भारत के कुछ प्राचीन राजाओं के महल में भी कार्य किए थे। अपने कामों के साथ-साथ योमस ईसा के सुसमाचार का प्रचार भी करते थे और उन्होंने कई चमत्कारी कार्य भी किए। इन सबसे प्रभावित होकर कुछ ब्राह्मणों ने ईसाई धर्म ग्रहण किया।

इसी कारण दक्षिण भारत में कई पुराने गिरजाघर देखने को मिलते हैं। मेरे स्वयं के गाँव में करीब एक हजार वर्ष पुराना एक गिरजाघर है। लोगों में यह भ्राँति फैली हुई है कि ईसाई धर्म एक विदेशी धर्म है। जब यह धर्म प्रथम शताब्दी से ही भारत में मौजूद रहा है तो इसे विदेशी धर्म मानने का क्या औचित्य है?
अधिकांश लोग यह समझते हैं कि भारत में ईसाई धर्म विदेशी मिशनरियों द्वारा लाया गया है। यह पूर्णरूपेण गलत है यद्यपि पुर्तगाल, स्पेन, फ्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी, इटली आदि राष्ट्रों से मिशनरी लोग चौदहवीं शताब्दी से भारत में आए हैं और सुसमाचार का प्रचार किया है। ईसाई धर्म प्रारंभ से ही प्रेम, शांति, क्षमा, त्याग एवं दूसरों की सेवा आदि सिद्धांतों पर विशेष ध्यान देता आया है।

ईसा का जन्म मानव के प्रति परमेश्वर के प्रेम को प्रकट करता है। बाइबल पवित्र शास्त्र में स्पष्ट लिखा है कि ईश्वर प्रेम है और मानव के प्रति ईश्वर के अपार प्रेम के कारण ही उन्होंने अपने एकलौते पुत्र को जगत में भेजा। ईसाई धर्म में ईश्वर के तीन स्वरूप बताए गए हैं- पिता, पुत्र एवं पवित्र आत्मा। यह त्रिएक परमेश्वर सृष्टि के प्रारंभ से ही एकसाथ अस्तित्व में है, परंतु 2000 वर्ष पूर्व ईसा मसीह ने (परमेश्वर के पुत्र) मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर जन्म लिया। पवित्र शास्त्र कहता है- 'परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करें, वह नष्ट न हो, परंतु अनंत जीवन पाए।' (यूहन्ना रचित सुसमाचार 3:16)।
ईश्वर ने मानव को स्वयं के स्वरूप में रचा, परंतु मानव पाप करके ईश्वर से दूर भटक गए। इसी खोई हुई मानव जाति को वापस अपने पास लाने के लिए ईश्वर ने ईसा मसीह को मानव के रूप में जगत में भेजा। मानव जाति की सृष्टि के बारे में पवित्र शास्त्र में लिखा है- 'परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की।' (उत्पत्ति 1:27)।

मानव ईश्वर की सृष्टियों में सर्वश्रेष्ठ है। ईश्वर मानव से प्रेम रखता है और यही चाहता है कि मानव उसकी संगति एवं निकटता में रहे। अदन की वाटिका में परमेश्वर आदम तथा हव्वा के साथ संगति रखते थे, परंतु इन दोनों ने ईश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करके पाप किया। इस प्रकार ईश्वर और मानव के बीच एक खाई उत्पन्न हुई। इस खाई को दूर कर मानव को वापस अपने निकट लाने के लिए परमेश्वर ने अपने पुत्र ईसा मसीह को मानव के रूप में जगत में भेजा। यह लूका रचित सुसमाचार के पंद्रहवें अध्याय में लिखा हुआ उडाव पुत्र की कहानी से मिलता-जुलता है।

उडाव पुत्र अपने पिता का दिल तोड़कर अपना हिस्सा लेते हुए घर से निकल गया, परंतु पिता उससे निरंतर प्रेम करता रहा और उसके लौटने का इंतजार करता रहा। इसी प्रकार परमेश्वर भी प्रत्येक मानव के उनकी ओर लौटने का इंतजार करता रहता है। ईसा मसीह जब पृथ्वी पर रहे, अपने साथ चलने एवं कार्य करने के लिए बारह शिष्यों को चुना। उन्होंने उनको यह सिखाया कि आपस में प्रेम रखें। निःस्वार्थ प्रेम ही ईसाई धर्म का पहला सिद्धांत है।
क्रिसमस शांति का संदेश लाता है। पवित्र शास्त्र में ईसा को 'शांति का राजकुमार' नाम से पुकारा गया है। ईसा हमेशा अभिवादन के रूप में कहते थे- 'शांति तुम्हारे साथ हो।' शांति के बिना कोई भी धर्म का अस्तित्व संभव नहीं है। घृणा, संघर्ष, हिंसा एवं युद्ध आदि का धर्म के अंतर्गत कोई स्थान नहीं है। ईसा के जन्म के समय स्वर्गदूतों ने गाया- 'आकाश में परमेश्वर की महिमा और पृथ्वी पर उन मनुष्यों में जिनसे वह प्रसन्न है, शांति हो। (लूका 2:14)।

शांति एवं सद्भावना ईसाई धर्म के बुनियादी आदर्श हैं। पहाड़ी उपदेश के दौरान ईसा ने कहा- 'धन्य है वे जो मेल कराने वाले हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलाएंगे। (मत्ती 5.9)। धार्मिक कट्टरपंथ, पूर्वाग्रह, घृणा एवं हिंसा कोई भी धर्म का आधार नहीं बन सकता है।

दूसरों की गलतियों को माफ करना ईसाई धर्म का एक अन्य महत्वपूर्ण सिद्धांत है। ईश्वर के निकट जाने के लिए दूसरों की गलतियों को हृदय से माफ करना नितांत आवश्यक है। ईसा ने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर। (मत्ती 6.12) ईसा के अनुसार दूसरों को माफ करने के लिए कोई शर्त नहीं रखी जाना चाहिए।
त्याग एवं सेवा की भावना भी ईसा की शिक्षा के मुख्य भाग रहे हैं। ईसा के कुछ चेले जैसे पतरस, याकूब, यूहन्ना आदि मछुवारे थे और उनके काम के स्थान से ही यीशु ने उन्हें बुलाए थे। यीशु ने कहा- 'मेरे पीछे चलो, मैं तुम्हें मनुष्य को पकड़ने वाला बनाऊंगा।' दूसरे शब्दों में ईसा ने उनको इसीलिए बुलाया कि उनके द्वारा अन्य मनुष्यों के जीवन में सुधार हो सके। जब यीशु ने उन्हें बुलाया तो वे सब कुछ छोड़कर उनके पीछे हो लिए। सांसारिक संपत्ति और वस्तु ईसा के पीछे चलने में बाधा नहीं बनना चाहिए।
यीशु ने अपने शिष्यों से कहा- कोई अपने आपको इंकार करने और अपना क्रूस उठाने में असमर्थ है तो वह मेरे योग्य नहीं है। ईसा के अनुसार उनके अनुयायियों को दुःख उठाने एवं यहां तक कि अपने प्राण त्याग के लिए भी सर्वदा तैयार रहना चाहिए। इसीलिए कहा- 'शहीदों का रक्त ही कलीसिया का बीज है।'

वर्तमान जगत के लिए अत्याधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज सपूर्ण विश्‍व स्वार्थ, घृणा, हिसा, शोषण, उत्पीड़न, भ्रष्टाचार, युद्ध आदि से भरा है। क्रिसमस का शुभ संदेश हमारे दिलों में प्रेम, शांति, क्षमा एवं सेवा की नई ज्योति जलाते हैं।

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