मिलिए व्यंग्यकार शिव शर्मा से

भीका शर्मा|
रूबरू में इस बार मिलिए प्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ. शिव शर्मा से जो उज्जैन में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले टेपा सम्मेलन के प्रणेता हैं। शर्माजी पिछले 38 वर्षों से समाज की बड़ी-बड़ी हस्तियों को टेपा सम्मेलन के मंच पर बुलाकर उनकी कमियों पर हास्य-व्यंग्य के माध्यम से प्रहार करते आ रहे हैं। वेबदुनिया के भीका शर्मा ने उनसे एक खास मुलाकात की। पेश हैं उसके कुछ मुख्य अंश...

प्रश्न : अपने छात्र जीवन के बारे में कुछ बताइए?
उत्तर : मेरी प्रारंभिक शिक्षा ब्यावरा और मिडिल तथा हाईस्कूल शिक्षा नरसिंहगढ़ में हुई। वैसे मेरा बचपन कुछ खास नहीं रहा। मुझे अपना बचपन काला नजर आता है और हमने बहुत अभाव सहा। इसलिए मैं इसे याद नहीं करता। जब मैं आठवीं में पढ़ता था तब शाकिर अली खान और होमी दाजी के संपर्क में आकर मार्क्सवादी हो गया। ...और तब से पढ़ने का शौक लग गया। दसवीं कक्षा के बाद मैं सीधा उज्जैन चला आया। मेरा शुरू से ही उज्जैन के प्रति आकर्षण रहा है। एक तरफ कम्युनिस्ट पार्टी और दूसरी ओर यहाँ की प्राचीनता- दोनों ने मुझे आकर्षित किया। यहाँ के माधव कॉलेज को मैंने विद्यार्थी से लेकर प्राचार्य के रूप में पूरे 50 साल समर्पित किए। शुरू से यह कॉलेज स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र रहा और यहाँ महान हिन्दी साहित्य के विद्वान रहे और उनका प्रभाव मुझ पर रहा। थोड़े समय प‍त्रकारिता की फिर काफी लोगों के सहयोग से टेपा सम्मेलन की शुरुआत की जो सिलसिला 38 सालों से जारी है।
प्रश्न : ये टेपा सम्मेलन क्या है?
उत्तर : मूलत: गोपालप्रसाद मिश्र दिल्ली में महामूर्ख सम्मेलन आयोजित किया करते थे, परंतु हमारे देश में अशिक्षा की वजह से लोग इसे महत्व नहीं देते परंतु मेरा मानना है कि विश्व में बहुमत ही मूर्खों का है। बुद्धिमान लोग तो पनपते ही मूर्खों की वजह से हैं। टेपा एक मालवी शब्द है जिसका अर्थ है भोला-भाला व्यक्ति। भारत का कोई भी व्यंग्यकार, साहित्यकार, संपादक ऐसा नहीं है जो मेरे सम्मेलन में नहीं आया हो। 200 लोगों से शुरू किए इस सम्मेलन में आज बीस हजार लोग भाग लेते हैं। ‍इसमें हम उच्च पदों पर आसीन लोगों की व्यंग्यात्मक रूप से पोल खोलते हैं। बस लोगों को हँसाना ही हमारा उद्देश्य होता है।
प्रश्न : आप व्यंग्यकार कैसे बने?
उत्तर : यूँ तो सफल प्रोफेसर बनना चाहता था। उस तरफ कुछ खास रुचि नहीं थी इसलिए मैं विद्वान तो नहीं बन पाया तो सोचा मूर्खों में मूर्ख शिरोमणि ही बन जाया जाए। मालवा में वाचिक परंपरा खत्म हो गई थी, जिसे हमने फिर से स्थापित किया और जब मेरे व्यंग्य छपने शुरू हो गए तब लोगों ने मुझे बताया कि आप तो व्यंग्यकार हैं। मेरे पिता भी हँसोड़ थे। वे राजा-महाराजाओं को लतीफे सुनाया करते थे। शायद ये वंशानुगत गुण मुझमें आ गए।
प्रश्न : आप युवा व्यंग्यकारों को क्या संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर : वैसे मैं खुद को कोई पुराना व्यंग्यकार नहीं मानता, परंतु आज के व्यंग्यकारों से मुझे बड़ी नाउम्मीदें हैं। व्यंग्य निरर्थक हास्य नहीं होता। क्लर्क, प्रेमिका और पत्नियों पर हास्य करने की बजाय समाज की विकृतियों पर व्यंग्य कसने का उद्देश्य होना चाहिए। व्यंग्य आक्रमण की शैली होती है। लोग आज हास्य को व्यंग्य समझ रहे हैं। हास्य के माध्यम से व्यंग्य की चोट करना ही श्रेष्ठ व्यंग्य करना कहलाता है।
प्रश्न : वेबदुनिया के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर : मैं वेबदुनिया को शुभकामनाएँ देना चाहता हूँ। वेबदुनिया द्वारा सबसे पहला हिन्दी पोर्टल निकाला जाना सराहनीय है। और अब तो यह नौ भाषाओं में अपनी सेवाएँ दे रहा है। जब मैं लंदन गया था तो वहाँ के लोगों ने मुझसे कहा कि हम वेबदुनिया के माध्यम से ही भारत की खबरों, साहित्य और संस्कृति से जुड़े हुए हैं।

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