मिलिए ख्यात शायर राहत इंदौरी से

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प्रश्न : अपनी पहली पाकिस्तान यात्रा के कुछ अनुभव बताइए?
उत्तर : ये लगभग 1986 का दौर था। उससे पहले जंग की वजह से करीब 10 सालों तक भारत-पाक रिश्तों में एक दरार-सी आ गई थी। एक लंबे अंतराल के बाद शायरों का एक दल पाकिस्तान गया, जिसमें कई महान शायर जैसे सरदार कौर, महेंद्रसिंह बेदी, फजा निजामी, प्रोफसर जगन्नाथ आजाद वगैरह थे और मैं इन सबके सामने एकदम नौसिखिया-सा था। आपको जानकर हैरत होगी कि आजादी के बाद हिन्दुस्तान में पैदा हुआ मुशायरा पाकिस्तान में जाकर खत्म हो चुका था। जब हम वहाँ पहली मर्तबा गए तो कराची में एक क्लब में करीब बीस हजार लोग मौजूद थे। ये जादू तो हिन्दुस्तानी परफार्मर्स का था। हिन्दुस्तानी राइटर्स का था। यानी कह सकते हैं कि मुशायरा पाकिस्तानी जमीं पर हिन्दुस्तान ने बोया है। ये मेरा तजुरबा है।

प्रश्न : दुनिया के किन-किन मुल्कों में आपने शायरी पढ़ी और श्रोताओं में आपने क्या अंतर पाया?
उत्तर : दुनिया के किसी भी मुल्क में जाइए, शायरी को सुनने वाले तो एक समान ही हैं। चाहे वो आजमगढ़ में सुनी जाए या लखनऊ, हैदराबाद में या फिर न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी में या नार्वे में क्योंकि श्रोता हिन्दुस्तानी या पाकिस्तानी होते हैं। इसलिए वे चाहे जहाँ भी जाकर बस जाएँ परंतु उनके सोचने का तरीका, माहौल, रहन-सहन और उनकी तहजीब अपने सीने से लगाए होते हैं। बस एक फर्क होता है कि बाहर के देशों में श्रोताओं की संख्या कम होती है।

भीका शर्मा|
रूबरू में इस बार मिलिए उर्दू के जाने-माने शायर राहत इंदौरी से, जिनकी शायरी ने हिन्दुस्तान ही नहीं वरन दुनिया के 45 मुल्कों में धूम मचा रखी है। राहत साहब ने अपनी शायरी का जो जादू फिल्मी दुनिया में बिखेरा है, वह वाकई काबिले तारीफ है। वेबदुनिया के भीका शर्मा ने उनके साथ एक खास मुलाकात की। पेश है मुलाकात के खास अंश...
प्रश्न : आपने दस साल की उम्र में ही चित्रकारी करना शुरू कर दिया था?उत्तर: चित्रकारी कभी भी मेरा शौक नहीं रहा बल्कि मेरा प्रोफेशन रहा या कहें कि मेरी मजबूरी रही। प्रोफेशनल आर्टिस्ट की हैसियत से मैंने नौ बरस की उम्र में ही अपने हाथ में ब्रश थाम लिया था। फिर बरसों तक यही काम करता रहा। इस दौरान मैंने फिल्मों के बैनर्स भी बनाए।प्रश्न : आपने अपना पहला शेर कहाँ और कब पढ़ा? क्या तब आपने सोचा था कि इसे ही अपना मुकाम बनाना है?उत्तर : मेरा एजुकेशन का मीडियम उर्दू ही रहा और तब आलम यह था कि जब में उर्दू शायरी की कोई किताब पढ़ता था तो एक बार में ही मुझे पूरी किताब याद हो जाया करती थी। अचानक दूसरे के शेर पढ़ते-पढ़ते मैंने खुद का शेर पढ़ लिया और कब शायर बन गया यह मालूम ही नहीं पड़ा। मैं तो यूँ ही उल्टा-सीधा कुछ लिखा करता था, परंतु बाद में मालूम हुआ कि यही शायरी है और फिर दुनिया ने उस पर मुहर लगा दी। फिर मैं पेंटर से शायर बन गया।प्रश्न : कॉलेज के जमाने की अपनी शायरी के बारे में बताइए?उत्तर : 1972-73 में कॉलेज के दौरान ही मैंने मंचों पर शायरी पढ़ना शुरू किया था। पहली बार देवास में किसी मुशायरे में मैंने शायरी पढ़ी थी। उसी के बाद मुझे श्रोताओं की तरफ से ब्रेक मिला। मेरा कभी भी कोई गॉड फादर नहीं रहा। दो साल के भीतर ही मैं पूरे मुल्क में शायरी की वजह से पहचाना जाने लगा।
आपको जानकर ताज्जुब होगा कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में हमने अपने सामने एक लाख श्रोताओं को घंटों शायरी सुनते हुए देखा है। वे शायरी के दीवाने होते हैं। मैं करीब 40-45 मुल्कों में जा चुका हूँ।

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