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जानिए, कैसे करें गाभिन भैंसों की देखभाल...

Author राकेश कुमार|
गाभिन भैंसों की की देखभाल उचित तरीके से हो ताकि भैंस और बच्चे दोनों स्वस्थ रहें, इसके लिए आपको गाभिन भैंसों की उचित देखभाल की जानकारी होना बहुत ही महत्वपूर्ण है।
गर्भधारण से भैंस के ब्याने तक के समय को गर्भकाल कहते हैं। भैंस में गर्भकाल 310-315 दिन तक का होता है। गर्भधारण की पहली पहचान भैंस में मदचक्र का बन्द होना है परन्तु कुछ भैंसों में शांत मद होने के कारण गर्भता का पता ठीक प्रकार से नहीं लग पाता। अत: गर्भाधान के 21वें दिन के आसपास भैंस को दोबारा मद में न आना गर्भधारण का संकेत मात्र है, विश्वसनीय प्रमाण नहीं। अत: पशुपालक भाइयों को चाहिए कि गर्भाधान के दो महीने बाद डॉक्टर द्वारा गर्भ जांच अवश्य करवाएं।
 
गाभिन भैंसों की देखभाल के लिए तीन प्रमुख बातें :
1. पोषण प्रबंध
2. आवास प्रबंध
3. सामान्य प्रबंध।
 
गाभिन भैंसों का पोषण प्रबंध :
गाभिन भैंस की देखभाल का प्रमुख तथ्य यह है कि भैंस को अपने जीवन-यापन व दूध देने के अतिरिक्त बच्चे के विकास के लिए भी पोषक तत्वों और ऊर्जा की आवश्यकता होती है। गर्भावस्था के अंतिम तीन महीनों में बच्चे की सबसे अधिक बढ़वार होती है। इसलिए भैंस को आठवें, नौवें और दसवें महीने में अधिक पोषक आहार की आवश्यकता पड़ती है। इसी समय भैंस अगले ब्यांत में अच्छा दूध देने के लिए अपना वजन बढ़ाती है तथा पिछले ब्यांत में हुर्इ पोषक तत्वों की कमी को भी पूरा करती है।

यदि इस समय खानपान में कोर्इ कमी रह जाती है तो निम्नलिखित परेशानियां हो सकती हैं :
* बच्चा कमजोर पैदा होता है तथा वह अंधा भी रह सकता है।
* भैंस फूल दिखा सकती है।
* प्रसव उपरांत दुग्ध ज्वर हो सकता है।
* जेर रूक सकती है।
* बच्चेदानी में मवाद पड़ सकती है तथा ब्यांत का दूध उत्पादन भी काफी घट सकता है।
 
गर्भावस्था के समय भैंस को संतुलित एवं सुपाच्य चारा खिलाना चाहिए। गर्भावस्था के समय भैंस को खनिज लवण और विटामिन्स अवश्य देना चाहिए। खनिज लवण और विटामिंस की पूर्ति के लिए सबसे बेहतरीन और प्रभावकारी टॉनिक है अमीनो पॉवर (Amino Power)। 
 
गाभिन भैंसों का आवास प्रबंध :
* गाभिन भैंस को आठवें महीने के बाद अन्य पशुओं से अलग रखना चाहिए।
* भैंस का बाड़ा उबड़-खाबड़ तथा फिसलन वाला नहीं होना चाहिए।
* बाड़ा ऐसा होना चाहिए जो वातावरण की खराब परिस्थितियों जैसे अत्याधिक सर्दी, गर्मी और बरसात से भैंस को बचा सके और साथ में हवादार भी हो।
* बाड़े में कच्चा फर्श/रेत अवश्य हो। बाड़े में सीलन नहीं होनी चाहिए। स्वच्छ पीने के पानी का प्रबन्ध भी होना चाहिए।
 
सामान्य प्रबंध :
* भैंस अगर दूध दे रही हो तो ब्याने के दो महीने पहले उसका दूध सुखा देना बहुत जरूरी होता है। ऐसा न करने पर अगले ब्यांत का उत्पादन काफी घट जाता है।
 
* गर्भावस्था के अंतिम दिनों में भैंस को रेल या ट्रक से नहीं ढोना चाहिए। इसके अतिरिक्त उसे लम्बी दूरी तक पैदल भी नहीं चलाना चाहिए।
 
* भैंस को ऊंची नीची जगह व गहरे तालाब में भी नहीं ले जाना चाहिए। ऐसा करने से बच्चेदानी में बल पड़ सकता है, लेकिन इस अवस्था में प्रतिदिन हल्का व्यायाम भैंस के लिए लाभदायक होता है। गाभिन भैंस को ऐसे पशुओं से दूर रखना चाहिए, जिनका गर्भपात हुआ हो।
 
* पशु के गर्भधारण की तिथि व उसके अनुसार प्रसव की अनुमानित तिथि को घर के कैलेण्डर या डायरी में प्रमुखता से लिखकर रखें। भैंस की गर्भावस्था लगभग 310 दिन की अवधि की होती है इससे किसान भाई पशु के ब्याने के समय से पहले चौकन्ने हो जाएं व बयाने के दौरान पशु का पूरा ध्यान रखें।
 
* गाभिन भैंस को उचित मात्रा में सूर्य की रोशनी मिल सके इसका ध्यान रखें। सूर्य की रोशनी से भैंस के शरीर में विटामिन डी 3 बनता है जो कैल्शियम के संग्रहण में सहायक है जिससे पशु को बयाने के उपरांत दुग्ध ज्वर से बचाया जा सकता है। ऐसा पाया गया है कि गर्भावस्था के अंतिम माह में पशु चिकित्सक द्वारा लगाया जाने वाला विटामिन ई व सिलेनियम का टीका प्रसव उपरांत होने वाली कठिनाइयों जैसे कि जेर का न गिरना इत्यादि में लाभदायक होता है। विटामिन ई, सिलेनियम और विटामिन डी की कमी की पूर्ति के लिए आप भैंसों को ग्रो ई-सेल (Grow E-Sel) और ग्रो-कैल डी3 (Grow-Cal D3) दें।
 
पशुपालकों को संभावित प्रसव के लक्षणों का ज्ञान भी अवश्य होना चाहिए जो इस प्रकार हैं :
* लेवटि का पूर्ण विकास।
* पुट्ठे टूटना यानि की पूंछ के आसपास मांसपेशियों का ढीला हो जाना।
* खाने-पीने में रुचि न दिखाना व न चरना।
* बार-बार उठना-बैठना।
* योनि द्वार का ढीलापन, तरल पदार्थ का बहाव होना।
* प्रसव अवस्था।
 
प्रसव के आसपास का समय मां और बच्चा दोनों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। थोड़ी सी असावधानी भैंस और उसके बच्चे के लिए घातक हो सकती है तथा भैंस का दूध उत्पादन भी बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।
 
प्रसव के बाद भैंस की देखभाल में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए :
* पिछले हिस्से व अयन को धोकर, एक-दो घंटे के अंदर बच्चे को खीस पिला देनी चाहिए।
 
* भैंस को गुड़, बिनौला तथा हरा चारा खाने को देना चाहिए। उसे ताजा या हल्का गुनगुना पानी पिलाना चाहिए। अब उसके जेर गिरा देने का इंतजार करना चाहिए।
 
* आमतौर पर भैंस ब्याने के बाद 2-8 घंटे में जेर गिरा देती है। जेर गिरा देने के बाद भैंस को अच्छी तरह से नहला दें। यदि योनि के आसपास खरोंच या फटने के निशान हैं तो तेल आदि लगा दें जिससे उस पर मक्खियां न बैठें।
 
* भैंस पर तीन दिन कड़ी नजर रखें, क्योंकि ब्याने के बाद बच्चेदानी का बाहर आना, परभक्षी द्वारा भैंस को काटना,दुग्ध ज्वर होना आदि समस्याओं की सम्भावना इसी समय अधिक होती है।
 
नवजात बच्चे की देखभाल : 
* जन्म के तुरंत बाद बच्चे के ऊपर की जेर/झिल्ली हटा दें तथा नाक व मुंह साफ करें।
 
* यदि सांस लेने में दिक्कत हो रही है तो छाती मलें तथा बच्चे की पिछली टांगें पकड़कर उल्टा लटकाएं।
 
* बच्चे की नाभि को तीन-चार अंगुली नीचे पासपास दो स्थानों पर सावधानी से मजबूत धागे से बांधें। अब नए ब्लेड या साफ कैंची से दोनों बंधी हुर्इ जगहों के बीच नाभि को काट दें। इसके बाद कटी हुर्इ नाभि पर टिंचर आयोडीन लगा दें।
 
* बच्चे को भैंस के सामने रखें तथा उसे चाटने दें। बच्चे को चाटने से बच्चे की त्वचा जल्दी सूख जाती है, जिससे बच्चे का तापमान नहीं गिरता, त्वचा साफ हो जाती है, शरीर में खून दौड़ने लगता है तथा मां और बच्चे का बंधन पनपता है। इससे मां को कुछ लवण और प्रोटीन भी प्राप्त हो जाती है।
 
* यदि भैंस बच्चे को नहीं चाटती है तो किसी साफ तौलिए से बच्चे की रगड़कर सफार्इ कर दें। नवजात बच्चे को जन्म के 1-2 घंटे के अंदर खीस अवश्य पिलाएं। 
 
* जन्म के 1-2 घंटे के अंदर बच्चे को खीस अवश्य पिलाएं। इसके लिए जेर गिरने का इंतजार बिलकुल न करें। एक-दो घंटे के अंदर पिलाया हुआ खीस बच्चे की रोगप्रतिरोधक क्षमता का विकास करता है, जिससे बच्चे को खतरनाक बीमारियों से लड़ने की शक्ति मिलती है।
 
* बच्चे को उसके वजन का 10 प्रतिशत दूध पिलाना चाहिए। उदाहरण के लिए आमतौर पर नवजात बच्चा 30 किग्रा का होता है। वजन के अनुसार उसे 3 किग्रा दूध (1.5 किग्रा सुबह व 1.5 किग्रा शाम) पिलाएं।
 
* यह ध्यान जरूर रखें कि पहला दूध पीने के बाद बच्चा लगभग दो घंटे के अंदर मल त्याग कर दे।
 
*  बच्चे को अधिक गर्मी व सर्दी से बचाकर साफ जगह पर रखें।
 
* भैंस के बच्चे को जूण के लिए दवार्इ (कृमिनाशक दवा) 10 दिन की उम्र पर जरूर पिला दें। यह दवा 21 दिन बाद दोबारा पिलानी चाहिए।
 
इस तरह अगर आप उपयुक्त बातों का ध्यान रखें और इन बातों पर अमल करें तो भैंस और बच्चे दोनों स्वस्थ रहेंगे।
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