गुरु मंत्र : गुरु से है शिष्य, शिष्य से है गुरु...


- मनीष शर्मा 
 
गुरु अरस्तु और का प्रेरक प्रसंग 
 
सिकंदर अपने गुरु अरस्तु के साथ एक बार बरसात के दिनों में कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक उफनता हुआ नाला मिला। इस पर गुरु-शिष्य में पहले नाला पार करने को लेकर बहस छिड़ गई, क्योंकि नाला दोनों के लिए नया था और उसकी गहराई का भी उन्हें अंदाजा नहीं था।
 
सिकंदर ने गुरु की बात मानने से इंकार कर दिया और वह नाले में उतर गया। सावधानीपूर्वक आगे बढ़ते हुए उसने नाला पार कर लिया। इसके बाद उसने अरस्तु से नाला पार करने को कहा। अरस्तु भी उसी जगह से पार पहुंच गए। पार पहुंचकर वे अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए बोले- सिकंदर, आज तुमने हमारी बात न मानकर हमारा अपमान किया है।
 
इसके पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ कि तुमने हमारा कहना न माना हो। फिर आज ऐसा क्यों? क्या इसलिए कि तुम अब सम्राट हो गए हो? इस पर सिकंदर बोला- मुझे गलत न समझें गुरुदेव। मैंने सम्राट के नाते नहीं, बल्कि एक शिष्य के नाते पहले नाला पार करके केवल अपना फर्ज निभाया।
 
अरस्तु- कैसा फर्ज? 
 
सिकंदर- अपने गुरु की सुरक्षा का फर्ज। क्योंकि यदि अरस्तु रहता है तो वह हजारों सिकंदर खड़े कर सकता है, लेकिन सिकंदर अरस्तु कहां से लाएगा। इसलिए मैं नाले में बह जाता तो उतना नुकसान नहीं होता, जितना आपके बह जाने से। अब आप ही बताएं, मैंने क्या गलत किया?
 
 

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