ऐ दिल है मुश्किल : फिल्म समीक्षा

समय ताम्रकर|
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फिल्ममेकर यश चोपड़ा के रोमांटिक सिनेमा से बेहद प्रभावित हैं। अपने करियर के शुरुआत में उनके सिनेमा पर यह छाप महूसस की जाती रही है। पिछली दो फिल्मों 'माय नेम इज़ खान' और 'स्टुडेंट ऑफ द ईयर' में उन्होंने कुछ हटकर करने की कोशिश की थी, लेकिन 'ऐ दिल है मुश्किल' के जरिये वे फिर अपने चिर-परिचित रोमांटिक सिनेमा की ओर लौटे हैं। 

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में रिश्तों के समीकरण को मोहब्बत की चाशनी में लपेट कर उन्होंने पेश किया है। एकतरफा प्यार शायद भारत में सबसे ज्यादा होता है। इस एकतरफा प्यार को उन्होंने प्रमुखता के साथ फिल्म में  दर्शाया है। साथ ही साथ लड़के-लड़की की दोस्ती और मोहब्बत के बीच की महीन रेखा पर भी उन्होंने अपनी फिल्म केन्द्रित की है। 
अयान (रणबीर कपूर) प्राइवेट जेट वाला अमीर है। गाना और इश्क के सिवाय उसकी जिंदगी में कुछ भी नहीं है। अयान उस युवा पीढ़ी का नुमाइंदा है जिसके लिए प्यार और ब्रेकअप एक फैशन की तरह है। गर्लफ्रेंड्स और ब्रेकअप्स को स्टेटस की तरह पेश किया जाता है। 
 
अयान को सच्ची वाली मोहब्बत होती है अलीज़ाह (अनुष्का शर्मा) से, जो कि अली (फवाद खान) के इश्क में गिरफ्त है। वह अयान को अपना सच्चा दोस्त मानती है। वह इश्क में जुनून और दोस्ती में सुकून महसूस करती है। अली के इश्क में उसे वह जुनून नहीं मिलता जो अयान की दोस्ती में मिलता है। 
 
अयान का प्यार एकतरफा है। वह अलीज़ाह से इसका इज़हार भी करता है, लेकिन अलीज़ाह उसे सिर्फ दोस्त मानती है और अली से निकाह कर लेती है। दिल टूटने के बाद अयान की जिंदगी में खूबसूरत शायरा सबा (ऐश्वर्या राय) आती हैं, लेकिन अयान के लिए वह 'जरूरत' है 'ख्वाहिश' नहीं। सबा यह बात समझ जाती है और अयान से अलग हो जाती है। उसका अयान के प्रति एकतरफा प्यार था। सबा तलाकशुदा है। पूर्व पति ताहिर (शाहरुख खान) और उसके बीच भी दोस्ती और एकतरफा प्यार वाला किस्सा है। 
 
करण जौहर ने फिल्म को लिखा और निर्देशित किया है। कुछ कुछ होता है, कभी अलविदा न कहना जैसी अपनी फिल्मों को मिलाजुला कर करण ने 'ऐ दिल है मुश्किल' में पेश किया है। फिल्म की शुरुआत बढ़िया है। अयान और अलीज़ाह के किरदार अच्छे लगते हैं जो पूरी आजादी के साथ अपने दिल की बात सुनते हैं। दोनों की नोक-झोक और बातें अच्छी लगती हैं। 
 
इन दोनों किरदारों को बहुत अच्छी तरह पेश किया है। महानगर में रहने वाले युवा सीधे इससे कनेक्ट होते हैं, उन्हें अयान और अलीज़ाह अपनी तरह लगते हैं। लंदन की लाइफ स्टाइल, कलाकारों का स्टाइलिश लुक, उनकी 'कूलनेस' आपको बांध कर रखती है। इंटरवल के बाद इन बातों का खुमार उतर कर दर्शकों का ध्यान जब कहानी की ओर जाता है तो निराशा हाथ लगने लगती है। 
 
लेखक के रूप में करण जौहर दुविधा में फंसे नजर आते हैं कि कहानी को किस तरह आगे बढ़ाया जाए। दर्शकों का ध्यान बंटाने के लिए ऐश्वर्या के किरदार को डाला जाता है ताकि ऐश्वर्या की खूबसूरती और नए किरदार में दर्शक उलझ जाए। फिल्म और कमजोर पड़ती है तो शाहरुख खान भी एक सीन में आकर अपना असर छोड़ जाते हैं, लेकिन कहानी घिसट कर आगे बढ़ती है। 
 
कहानी के अंत में दर्शकों को इमोशनल करने के लिए अंतिम दांव चला जाता है, लेकिन तब तक दर्शक प्यार और दोस्ती की बहस से उब चुके होते हैं। 
 
स्क्रिप्ट की सबसे बड़ी कमी यह है कि फिल्म के मुख्य किरदारों के प्यार और अलगाव के भावना की त्रीवता दर्शक महसूस नहीं कर पाते। उन्हें सब सतही लगता है। मुख्य किरदारों की बुद्धिमानी पर शक होने लगता है। मुख्य किरदारों के एकतरफा प्यार से लेखक का दिल नहीं भरा तो ढेर सारे किरदार ऐसे डाल दिए जो एकतरफा प्यार करते हैं। ऐसा लगता है कि करण को ही अपनी कहानी पर ही विश्वास नहीं था।

अयान और सबा के रिश्ते को इतनी तेजी से दिखाया गया है कि हैरत होती है। दो मुलाकातों के बाद वे सीधे बिस्तर पर नजर आते हैं। सबा अपने पति से क्यों अलग हुई, यह बताया नहीं गया। अलीज़ाह और अली के ब्रेकअप की भी ठोस वजह सामने नहीं आती। ये सारे सवाल और स्क्रिप्ट की कमियां फिल्म देखते समय दर्शकों के दिमाग में निरंतर उठती हैं। 
 
 
ऐसा भी नहीं है कि फिल्म बहुत ज्यादा उबाती या पकाती है। निर्देशक के रूप में करण जौहर अपने लेखन की कमी को ढंकने में कुछ हद तक सफल भी रहे हैं। उनका प्रस्तुतिकरण ताजगी से भरा है। इस तरह की कहानी को परदे पर पेश करने का सलीका उन्हें आता है। कुछ दृश्य ऐसे भी हैं जो मनोरंजन करते हैं। पुराने हिट गानों का बेहतरीन उपयोग किया है, लेकिन इस तरह के दृश्य ज्यादा नहीं है। खासतौर पर सेकंड हाफ में करण के हाथों से फिल्म छूट जाती है और बहुत लंबी लगती है।  
संगीत के मामले में फिल्म अमीर है। गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य और संगीतकार प्रीतम चक्रवर्ती ने वाकई में मेहनत की है। अमिताभ द्वारा लिखे शब्द किरदारों को ताकत देते हैं और प्रीतम की धुनें पहली बार में ही पसंद आ जाती है। 'ऐ दिल है मुश्किल', 'बुलेया', 'क्यूटीपाई' बेहतरीन बन पड़े हैं।
 
सभी कलाकारों के बीच अनुष्का शर्मा का अभिनय सबसे अच्छा रहा है। बिंदास, बेपरवाह, मजबूत अलीज़ाह का किरदार उन्होंने बेहतरीन तरीके से जिया है। दृश्य के अनुरूप उन्होंने चेहरे पर भाव लाए हैं। प्यार में जुनून और दोस्ती में सुकून वाली बात को उनके चेहरे से पढ़ा जा सकता है। कई दृश्यों में उन्होंने को बैकफुट पर धकेल दिया है जो कि बेहतरीन अभिनेता माने जाते हैं। रणबीर की तारीफ इस बात के लिए करना होगी कि उन्होंने अपने कैरेक्टर की बारीकी को ठीक से समझा और पूरी फिल्म में सधा हुआ अभिनय किया। 
 
ऐश्वर्या राय बच्चन का किरदार पॉवरफुल नहीं है। यदि उनका कैरेक्टर फिल्म से निकाल भी दिया जाए तो फिल्म पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ता। उनका अभिनय औसत से बेहतर माना जा सकता है। जिस पाकिस्तानी अभिनेता फवाद अली खान को लेकर इतना हल्ला मचाया गया है वे चंद मिनटों के लिए स्क्रीन पर नजर आते हैं। लगता है करण ने उनके रोल पर कैंची चला दी है। 
 
शाहरुख खान एक सीन में आकर साबित कर देते हैं कि क्यों उन्हें रोमांस का बादशाह कहा जाता है। लिसा हेडन का काम तारीफ के काबिल है।   
 
फिल्म को सिनेमाटोग्राफर अनिल मेहता ने अपने कैमरे की आंख से दिखाया है जो आंखों को सुकून और दिल को ठंडक देती है। उनकी हर फ्रेम खूबसूरत है। फिल्म को स्टाइलिश लुक देने के लिए काफी पैसा खर्च किया गया है। 
 
ऐ दिल है मुश्किल का पैकेजिंग बेहद आकर्षक है, लेकिन कंटेंट में कसर रह गई। 
 
बैनर : धर्मा प्रोडक्शन्स 
निर्माता : अपूर्वा मेहता, हीरू यश जौहर, करण जौहर 
निर्देशक : करण जौहर 
संगीत : प्रीतम चक्रवर्ती 
कलाकार : रणबीर कपूर, अनुष्का शर्मा, ऐश्वर्या राय बच्चन, फवाद खान, लिसा हेडन, शाहरुख खान (कैमियो) 
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 37 मिनट 59 सेकंड 
रेटिंग : 2.5/5 
 
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