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बद्रीनाथ की दुल्हनिया : फिल्म समीक्षा

समय ताम्रकर|
स्त्रियों के हित में भले ही भारत में कितनी बात की गई हो, लेकिन लोगों की सोच में थोड़ा-सा ही फर्क पड़ा होगा। अभी भी बेटे को हथियार और बेटी को सिर पर लटकती तलवार माना जाता है। बेटी होते ही उसके माता-पिता दहेज की रकम जोड़ना शुरू कर देते हैं क्योंकि समाज की कुरीतियां ही ऐसी हैं। इस वजह से लड़कियों को लड़कों की तुलना में कमतर आंका  जाता है। पुरुष शासित समाज में कई स्त्रियां योग्य होने के बावजूद न चाहते हुए रसोई संभालती है और उनसे आगे बढ़ने के अवसर गृहस्थी के नाम पर ‍छीन लिए जाते हैं।  
 
इन सब बातों को निर्देशक-लेखक ने 'बद्रीनाथ की दुल्हनिया' में समेटा है। यह विषय काफी पुराना है और कई फिल्मकार इस पर अपनी फिल्म बना चुके हैं। विषय पुराना होने के बावजूद शशांक का लेखन और निर्देशन फिल्म को देखने लायक बनाता है। युवाओं की पसंद के अनुरूप उन्होंने कॉमेडी, डांस, गाने के जरिये उन्होंने अपनी बात को पेश किया है। 'हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया' 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' से प्रेरित होकर बनाई थी, लेकिन दूसरी फिल्म में वे अपनी पिछली फिल्म से आगे निकल गए। 


 
फिल्म की कहानी झांसी में रहने वाला बद्रीनाथ बंसल (वरुण धवन) की है जो अमीर बाप का बेटा है। उसे इस बात का थोड़ा-सा घमंड भी है। बद्री के पिता रूढि़वादी हैं। अपनी बड़ी बहू को वे काम करने की इजाजत नहीं देते हैं। कोटा में रहने वाली वैदेही त्रिवेदी (आलिया भट्ट) पर बद्री का दिल आ जाता है। वैदेही की बड़ी बहन भी अविवाहित है और उसके पिता को दिन-रात बेटियों के विवाह की चिंता सताती रहती है। बद्री को वैदेही पसंद नहीं करती, लेकिन जब बद्री उसकी बड़ी बहन के लिए लड़का ढूंढ देता है तो वह शादी के लिए तैयार हो जाती है। 
 
यहां तक फिल्म में मनोरंजन की धारा बहती रहती है। कई ऐसे सीन हैं जो दर्शकों को हंसाते हैं। इंटरवल ऐसे मोड़ पर होता है कि दर्शक आगे की कहानी जानने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। इंटरवल के बाद फिल्म में इमोशन हावी हो जाता है और उठाए गए मुद्दों के प्रति फिल्म गंभीर हो जाती है। क्लाइमैक्स थोड़ा ड्रामेटिक जरूर है, लेकिन अच्छा लगता है। 
 
बद्रीनाथ की दुल्हनिया को बहुत अच्छे से लिखा गया है। चिर-परिचित फिल्म होने के बावजूद ताजगी महसूस होती है। फिल्म में कई उम्दा सीन हैं, जैसे बद्री और उसके दोस्त की लड़ाई और फिर समुंदर में बद्री का दोस्त को मनाना, बद्री और वैदेही के बीच बस वाला दृश्य, माता की चौकी में बद्री का वैदेही की बहन के लिए लड़का ढूंढना, वैदेही का बद्री को कहना कि वह अपने पिता के सामने क्या मुंह खोलने की हिम्मत कर सकता है। 
 
शशांक ने फिल्म में दिए गए संदेशों को थोपा नहीं है। मनोरंजन की आड़ में उन्होंने अपनी बात इतने चुपके से कही है कि महसूस की जा सकती है। फिल्म में एक छोटा सा सीन है जिसमें आलिया अपने पिता को लड़के के पिता के सामने झुकता हुआ महसूस करती है और उनके चेहरे के भाव इस सीन को धार देते हैं। 
 
हालांकि कुछ सीन अखरते भी हैं जैसे वैदेही का बद्री द्वारा लगातार पीछा करना। इस तरह के दृश्य इस बात को बल देते हैं कि लड़कियों को पटाना है तो लगाता उनका पीछा करो, हालांकि स्क्रिप्ट में इसे जस्टिफाई किया गया है, लेकिन फिर भी इस तरह के दृश्यों से बचा जा सकता था। फिल्म में एक सीन में वैदेही को पकड़ कर बद्री कार की डिक्की में बंद कर देता है और यह भी फिल्म में जंचता नहीं है। सेकंड हाफ में फिल्म कही-कही थोड़ा कमजोर पड़ती है, खासतौर पर सिंगापुर वाला प्रसंग कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया है, लेकिन अच्छी बात यह है कि इसके बावजूद फिल्म में दर्शकों की रूचि बनी रहती है। 
 
शशांक निर्देशक के रूप में प्रभावित करते हैं। उन्होंने अपने सारे कलाकारों से अच्छा काम लिया है। गीतों का सही इस्तेमाल किया है। उनका प्रस्तुतिकरण हल्का-फुल्का है और फिल्म में मैसेज होने के बावजूद मनोरंजन का पूरा ध्यान रखा है। झांसी, कोटा और सिंगापुर में उन्होंने फिल्म को फिल्माया है और हर जगह का अच्छा उपयोग किया है। फिल्म के संवाद भी इस काम में उनकी खासी मदद करते हैं।  
 
और आलिया की केमिस्ट्री शानदार रही है। फिल्म वरुण को भरपूर असवर देती है जिसका उन्होंने पूरी तरह उपयोग किया है। वे हरफनमौला कलाकार हैं और कॉमेडी, इमोशन और रोमांटिक दृश्यों में अपनी छाप छोड़ते हैं। डांस उनकी खासियत है और इसका भी निर्देशन ने खासा उपयोग किया है। वरुण की ऊर्जा से फिल्म भागती हुई महसूस होती है। का किरदार ठहराव लिए हुए है। उन्हें कुछ कठिन दृश्य भी दिए गए हैं और वे बखूबी उन्हें निभा ले गई हैं। बद्रीनाथ के दोस्त के रूप में साहिल वद ने भी शानदार अभिनय किया है। फिल्म की कास्टिंग अच्छे से की गई है और हर किरदार में कलाकार फिट लगता है। 

फिल्म के विषय को देखते हुए सवाल उठाया जा सकता है कि क्या ये अच्छा नहीं होता कि फिल्म का नाम शशांक 'वैदेही का दूल्हा' रखते? पर बॉलीवुड भी नायक प्रधान है। 
 
होली के त्योहार पर प्रदर्शित हुई 'बद्रीनाथ की दुल्हनिया' मनोरंजन के कई रंग समेटे हुई है और साथ में संदेश भी है। 
 
बैनर : फॉक्स स्टार स्टुडियोज़, धर्मा प्रोडक्शन्स
निर्माता : करण जौहर, हीरू जौहर, अपूर्वा मेहता
निर्देशक : शशांक खेतान
संगीत : तनिष्क बागची, अमाल मलिक, बप्पी लाहिरी
कलाकार : वरुण धवन, आलिया भट्ट, साहिल वेद, गौहर खान, श्वेता बसु 
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 19 मिनट 25 सेकंड
रेटिंग : 3.5/5 
 
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