बादशाहो : फिल्म समीक्षा

समय ताम्रकर|
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पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता, राजनीतिक ईर्ष्या, शाही रहस्य, धोखे और खतरनाक रेगिस्तान के बीच ट्रक भर कर सोना ले जाया जा रहा है। एक काबिल अफसर पर इसकी जिम्मेदारी है और चार लोगों का मिशन इस ट्रक को रोकना है। क्या यह मिशन दमदार है, आइए जानते हैं। 
 
बादशाहो की कहानी उस समय की है जब आपातकाल लगा था। रानी गीतां‍जलि (इलियाना डीक्रूज) का एक शक्तिशाली नेता से विवाद हो जाता है। अपने पॉवर का उपयोग करते हुए वह गीतांजली का करोड़ों रुपये का सोना जब्त कर लेता है। गीतांजलि को जेल में डाल कर सोने को ट्रक के जरिये दिल्ली ले जाने का फैसला लिया जाता है। यह जिम्मेदारी मेजर सेहर सिंह  (विद्युत जामवाल) को सौंपी जाती है जो बेहद काबिल अफसर है। भवानी सिंह (अजय देवगन) गीतांजलि का वफादार है। गीतांजली को यकीन है कि वह उसका सोना बचा लेगा। भवानी सिंह एक टीम बनाता है। दलिया (इमरान हाशमी) उसके लिए कुछ भी कर सकता है। टिकला उर्फ गुरुजी (संजय मिश्रा) की उम्र हो गई है, वह शराबी है, लेकिन ताला खोलने में माहिर है, उसकी उंगलियां चाकू से भी तेज है। संजना (ईशा गुप्ता) की इस टीम में शामिल हो जाती है जो गीतांजलि की वफादार है। ये सब मिल कर उस ट्रक को लूटने के मिशन पर हैं। 
 
फिल्म को रजत अरोरा ने लिखा है जो मिलन के लिए कुछ फिल्में लिख चुके हैं। रजत मसाला फिल्म लिखने के लिए जाने जाते हैं। 'बादशाहो' की कहानी पढ़ने में उम्दा लगती है, लेकिन जिस तरह से ये सारा घटनाक्रम होता है वो बेहद निराशाजनक है। स्क्रीनप्ले इस तरह लिखा गया है कि लूट का यह खेल विश्वसनीय नहीं बन पाया है। 
 
फिल्म के शुरुआती 40 मिनट उबाऊ हैं। लेखक और निर्देशक को समझ ही नहीं आया कि ट्रक लूटने वाला प्रसंग शुरू होने के पहले दर्शकों को कैसे बांधा जाए। फटाफट दो गाने दिखा कर खानापूर्ति की गई। भवानी सिंह और गीतांजलि के बीच मोहब्बत होने वाली बात अत्यंत ही सतही है। इस मोहब्बत की सिचुएशन ही ठीक से नहीं बनाई गई। हालांकि बाद में गीतांजलि ने मोहब्बत क्यों की, इस बारे में बताया जाता है, लेकिन भवानी क्यों इश्क में दीवाना हो गया यह बात ठीक से स्थापित नहीं की गई। 
 
भवानी और दलिया को जब पता चलता है कि ट्रक से सोना ले जाने की जिम्मेदारी सेहर को सौंपी गई है। उसके बारे में जानकारी लेने के लिए दलिया उसका बटुआ चुरा लेता है। सेहर उसके पीछे भागता है, लेकिन पकड़ नहीं पाता। इस चक्कर में सेहर की मुलाकात भवानी से हो जाती है। यह प्रसंग बेहद कमजोर और तर्कहीन है। जिसकी नाक के नीचे से सोना चुराना है उसके सामने जाना ही क्यों? दलिया और भवानी को तो अपनी पहचान छिपा कर रखना चाहिए थी। 
 
फिल्म में दिखाया गया है कि जिस ट्रक में सोना ले जाया जा रहा है वो बहुत मजबूत है। बताया गया है कि ट्रक में एक लाल बटन है। इमरजेंसी होने पर यदि वो दबा दिया जाए तो ट्रक चारों ओर से ऐसा सील हो जाएगा कि उसे तोड़ने में घंटों लगेंगे। समझ नहीं आता कि परेशानी होने पर ही इस बटन को क्यों दबाया जाए। पहले से ही सील कर इसे ले जाया जाना चाहिए। केवल दर्शकों को बरगलाने के लिए इस तरह की बातें की गई हैं। 
 
इन मोटी बातों के अलावा और भी ऐसी कई बातें हैं जो तर्क से परे है। जैसे, पुलिस थाने से इन चारों का बहुत आसानी से भाग निकलना। थाने के सारे सिपाही सो रहे हैं और ये ताला तोड़ लेते हैं। इसी तरह से बहुत आसानी से ये चारों ट्रक पर कब्जा कर लेते हैं। कोई अड़चन या परेशानी नहीं। इसमें बिलकुल भी रोमांच नहीं है जबकि यह फिल्म का सबसे थ्रिलिंग हिस्सा होना था। 
 
ट्रक पर कब्जा करने के बाद भवानी और दलिया क्यों सेहर को जिंदा छोड़ देते हैं, ये जानते हुए भी कि वह बहुत खतरनाक है। इसके बाद चोर-पुलिस का खेल शुरू होता है जो बिलकुल भी प्रभावित नहीं करता। सार यह है कि रजत अरोरा के लिखे स्क्रीनप्ले में बिलकुल भी लॉजिक नहीं है। रजत के लिखे संवाद तालियां बटोरने वाले होते हैं, लेकिन बादशाहो में शायद ही ऐसा कोई संवाद सुनने को मिला हो। 
 
फिल्म में भवानी-गीतांजलि तथा दलिया-संजना के रोमांस को जोर-जबरदस्ती के साथ फिट करने की कोशिश की गई है। कॉमेडी के नाम पर संजय मिश्रा जरूर कुछ जगह हंसाते हैं। एक्शन दृश्यों में थ्रिल नदारद है। फिल्म का अंत खुला रखा है, शायद दूसरे भाग की गुंजाइश रखी गई है। लेकिन जिस दर्शक वर्ग के लिए यह फिल्म बनाई गई है उसे अंत दमदार चाहिए और यहां पर भी फिल्म कमजोर पड़ती है। 
 
निर्देशक मिलन लथुरिया की सबसे बड़ी गलती तो यह है कि उन्होंने अधपकी स्क्रिप्ट पर फिल्म बना दी। फिल्म में वे थ्रिल पैदा नहीं कर पाए। बजाय एक्शन के उन्होंने रोमांस, ड्रामा और कॉमेडी पर ज्यादा ध्यान देने की कोशिश की है। इंटरवल पाइंट पर उन्होंने दर्शकों को चौंकाया है, लेकिन सिर्फ यही काफी नहीं है। गीतांजलि के किरदार को लेकर जो ट्विस्ट पेश किया है वो भी प्रभावित नहीं करता। मिलन का प्रस्तुतिकरण औसत दर्जे का है। कुछ जगह उन्होंने कहानी को आगे-पीछे घुमाया है जो सिर्फ कन्फ्यूजन पैदा करता है। अच्छी बात यह है कि उन्होंने फिल्म की गति को तेज रखा है, इस कारण दर्शक फिल्म से जुड़े रहते हैं। 
 
फिल्म का संगीत ठीक है। 'मेरे रश्के क़मर' हिट हो चुका है। एक-दो गीत और सुनने लायक है। फिल्म की सिनेमाटोग्राफी ऐसी नहीं है कि मुंह से 'वाह' निकले। एडिटिंग भी ठीक-ठाक है।  
 
और इमरान हाशमी ने अपने अभिनय के बूते पर फिल्म को उठाए रखा है और इन दोनों की एक्टिंग के कारण ही फिल्म देखने में थोड़ा मन लगा रहता है। अजय को उनकी छवि के अनुरूप रोल दिया गया है। हालांकि अजय को हीरोगिरी दिखाने का और मौका दिया जाना था। दिलफेंक दलिया के रूप में इमरान ने अजय का अच्छा साथ निभाया है। रानी का किरदार इलियाना ने ऐसे निभाया मानो उन पर भारी-भरकम वजन रख दिया हो। ईशा गुप्ता के चेहरे पर कोई भाव नजर नहीं आते। हर दृश्य में वे ऐसे लगी मानो उन्हें कुछ समझ ही नहीं आ रहा है कि करना क्या है। संजय मिश्रा मंझे हुए खिलाड़ी हैं और उन्होंने थोड़ी राहत दी है। विद्युत जामवाल की खासियत उनके स्टंट्स हैं, लेकिन उनके इस गुण का ज्यादा उपयोग नहीं किया गया है। 
 
कुल मिलाकर 'बादशाहो' में वो बात नजर नहीं आती जिसका ट्रेलर में वादा किया गया था। 
 
बैनर : टी सीरिज़ कैसेट्स इंडस्ट्री लि., मंगलमूर्ति फिल्म्स, वर्टेक्स मोशन पिक्चर्स प्रा.लि.
निर्माता : भूषण कुमार, मिलन लथुरिया, कृष्ण कुमार 
निर्देशक : मिलन लथुरिया
संगीत : अंकित तिवारी, तनिष्क बागची, कबीर कैफे, नुसरत फतेह अली खान 
कलाकार : अजय देवगन, इमरान हाशमी, इलियाना डीक्रूज, ईशा गुप्ता, विद्युत जामवाल, संजय मिश्रा, शरद केलकर, सनी लियोन (आइटम नंबर) 
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 16 मिनट 38 सेकंड 
रेटिंग : 2/5 
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