शशि कपूर : सिनेमा का उत्सव मनाता फकीरा

खानदार में राज कपूर, शम्मी कपूर और तीन दिशाओं में यात्रा करने वाले मुसाफिरों की तरह हैं। अपने दोनों बड़े भाइयों में शशि कपूर का व्यक्तित्व अधिक आकर्षक तथा सुन्दर रहा है। उन्होंने अंग्रेजी बाला जेनिफर केण्डल से बीस साल की उम्र में शादी कर विद्रोह का बिगुल बजाया था।

इसके अलावा जेम्स आइवरी-इस्माइल मर्चेंट की अंग्रेजी-हिन्दी फिल्मों में काम कर अपने लिए का टाइटिल रिजर्व कराया। शशि कपूर स्वयं तो मेनस्ट्रीम सिनेमा के हिस्से रहे, मगर उन्होंने कला फिल्मों का प्रोत्साहन देने के लिए अपने होम प्रोडक्शन के बैनर शेक्सपीयरवाला के अंतर्गत कला फिल्मों का निर्माण किया और 'उधर' की कमाई 'इधर' खर्च कर दी।

हंसता-मुस्कुराता चेहरा
शशि कपूर का जन्म 18 मार्च 1938 को बलबीर राज कपूर के रूप में हुआ। वह पृथ्वीराज कपूर के तीसरे बेटे थे। उनकी ओर जब कभी देखो वह हंसते-मुस्कुराते मिलते थे। अपने हावभाव से उन्हें रोमांटिक -हीरो के रूप में पुकारा जाता था।

1944 में शशि ने अपना करियर पिताजी के पृथ्वी थिएटर के नाटक शकुंतला से आरम्भ किया था। राज कपूर की पहली फिल्म 'आग' (1948) तथा तीसरी फिल्म आवारा (1951) में उन्होंने राज कपूर के बचपन की भूमिकाएं निभाई थीं।

1957 में जॉफरी केण्डल की टूरिंग नाटक कम्पनी को ज्वाइन किया और शेक्सपीयर के नाटकों में विभिन्ना रोल अदा करने लगे। इसी दौरान जॉफरी केण्डल की युवा बिटिया जेनिफर को उन्होंने नजदीक से देखा और वे प्यार की आंच में तपकर शादी के मण्डप तक जा पहुंचे। कपूर खानदान में इस तरह की यह पहली शादी थी।

पृथ्वीपुत्र बने ‘धर्मपुत्र’
हिन्दी सिनेमा के आंगन में शशि की एंट्री यश चोपड़ा द्वारा निर्देशित फिल्म धर्मपुत्र से हुई। यह फिल्म आजादी के पहले की दशा पर आचार्य चतुरसेन शास्त्री के उपन्यास पर आधारित थी। इसमें मुस्लिम दम्पत्ति के अवैध संतान की कहानी थी। उस बच्चे का पालन-पोषण एक उदारवादी हिन्दू परिवार करता है।

1960 में शशि कपूर ने अनेक रोमांटिक फिल्मों में काम किया। इसका एक कारण यह भी था कि चॉकलेटी हीरो का वह दौर था। चार दीवारी, मेहंदी लगी मेरे हाथ, प्रेमपत्र, मोहब्बत इसको कहते हैं, नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे, जुआरी,कन्यादान, हसीना मान जाएगी जैसी फिल्मों में आए।

ज्यादातर फिल्में फ्लॉप रहीं और शशि कपूर उस दौर के नायक-दिलीप कुमार, देव आनंद, राज कपूर, राजेंद्र कुमार, मनोज कुमार में अपना महत्वपूर्ण स्थान नहीं बना सके। साथ ही उनकी प्रतिभा का परिचय भी बाहर तक नहीं आ पाया।

जब-जब फूल खिले
अभिनेत्री नंदा ने शशि कपूर के साथ कई फिल्मों में काम किया है। फिल्मों में लगातार फ्लॉप होने के बावजूद नंदा का विश्वास शशि कपूर में बना रहा। आखिर में सूरज प्रकाश निर्देशित फिल्म जब-जब फूल खिले (1965) प्रदर्शित हुई और 'एक था गुल' गीत के द्वारा कही गई रोमांटिक टेल ने सिल्वर गोल्डन जुबिली मनाई। शशि-नंदा की सफल जोड़ी बाद में दोहराई गई।

सत्तर के दशक में शशि कपूर के पास 150 फिल्मों के अनुबंध थे। वह एक दिन में तीन या चार फिल्मों की शूटिंग में पहुंच जाते थे। यह देख उनके बड़े भैया राज कपूर ने उन्हें टेक्सी तक कहा था कि जब बुलाओ तब आ जाती है और मीटर डाउन रहता है। ऐसी तल्ख टिप्पणी का एक कारण यह भी था कि शशि फिल्म 'सत्यम शिवम सुन्दरम' फिल्म तक के लिए समय नहीं निकाल पा रहे थे।

शशि की व्यस्तता पर फिल्मकार मृणाल सेन भी एक टिप्पणी की थी कि शशि एक फिल्म में तौलिया लपेटकर बाथरूम में प्रवेश करते हैं और दूसरी फिल्म में पेंट के बटन लगाते बाहर निकलते हैं। आखिर यह आर्टिस्ट का कैसा रूप है?

रोमांटिक फिल्मों के अलावा शशि ने कुछ अपराध कथा वाली फिल्मों में भी काम किया था। फिल्म आमने-सामने (1967) तथा चोरी मेरा काम (1975) इसके उदाहरण हैं। 1970 के दशक में ही जरूरत से ज्यादा फिल्मों में काम करने के कारण शशि ने अभिनय की गुणवत्ता खो दी। ऐसी कई महत्वहीन फिल्में उन्होंने की जो उनकी फिल्मोग्राफी को कमजोर करती है।

अमिताभ का साथ : गोल्डन टच
शशि कपूर के करियर तथा अभिनय की उम्दा फिल्म है न्यू देहली टाइम्स (1986)। इसे रोमेश शर्मा ने निर्देशित किया था। यह राजनीतिक दुश्चक्र की फिल्म है कि कैसे अखबार का मालिक अपने स्वार्थ के लिए सम्पादक को बलि का बकरा बनाता है। इसके बाद शशि कपूर अपनी बढ़ती उम्र को ध्यान में रखकर अस्सी के दशक में सेकण्ड लीड के रोल करने लगे।

अमिताभ बच्चन के साथ उनकी जोड़ी खूब जमी और दर्शकों द्वारा पसंद की गई। दीवार (1975), कभी-कभी (1976), त्रिशूल (1978), काला पत्थर (1979), ईमान धरम (1977), सुहाग (1979), दो और दो पांच (1980), शान (1980), नमक हलाल और सिलसिला जैसी यादगार फिल्में उन्होंने दी।

शशि कपूर
ऐसे अभिनेता थे, जिन्हें अंग्रेजी फिल्मों में लगातार काम करने का मौका मिला था। जेम्स आइवरी-इस्माइल मर्चेण्ट की जोड़ी की तीसरा कोण शशि कपूर थे। द हाउस होल्डर (1963), शेक्सपीयरवाला (1965), बॉम्बे टॉकी (1970) तथा हीट एंड डस्ट (1983) विदेश तथा भारत में सराही गई फिल्में हैं। कोनरॉट रुक्स की फिल्म 'सिद्धार्थ' (1972) उनकी विवादास्पद फिल्म रही। इस फिल्म में न्यूड सिमी ग्रेवाल के सामने शशि कपूर खड़े हैं। यह स्टील फोटोग्राफ अंग्रेजी की दो पत्रिकाओं के कवर पर छपा था और मामला अदालत में गया था।

इधर की कमाई उधर गंवाई
अपने होम प्रोडक्शन शेक्सपीयरवाला के बैनर तले शशि कपूर ने अलग तरह का परचम फहराने की कोशिश की। देश के दिग्गज फिल्मकारों के सहयोग से उन्होंने श्याम बेनेगल के माध्यम से जूनून (1979) तथा कलयुग (1981), अपर्णा सेन के निर्देशन में 36 चौरंगी लेन (1981), गोविंद निहलानी से विजेता (1983) तथा गिरीश कर्नाड से उत्सव (1985) निर्देशित कराकर अलग प्रकार का सिनेमा रचने की कोशिश में करोड़ों रुपये गंवाए, लेकिन ये फिल्में आज भी मील का पत्थर मानी जाती हैं।

भारत-सोवियत सहयोग तथा अपने निर्देशन में उनकी फिल्म अजूबा शशि के जीवन की ऐसी बड़ी गलती है कि इसने उन्हें परदे के पीछे पहुंचाकर करोड़ों के घाटे में उतार दिया। इसके बाद वह इस्माइल मर्चेंट की भोपाल में बनी फिल्म इन कस्टडी मुहाफिज(1994) में काम किया और अपने मोटे-थुलथुल देह के गुलाम होकर घर में कैद हो गए। इसके बाद कई तरह की बीमारियों ने उन्हें जकड़ लिया
था और वे लंबे समय तक अस्वस्थ रहे। 4 दिसम्बर 2017 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

अपने पिताजी की स्मृति को स्थाई बनाने के लिए उन्होंने मुम्बई में पृथ्वी थिएटर की स्थापना की है, जो आज देश में नाटक-आंदोलन को जीवंत बनाए हुए है।


प्रमुख फिल्में
आ गले लग जा, अभिनेत्री, बसेरा, बिरादरी, चार दीवारी, चोर मचाए शोर, दीवार, धर्मपुत्र, दो और दो पांच, एक श्रीमान एक श्रीमती, फकीरा, जब जब फूल खिले, जानवर और इंसान, जुनून, कभी-कभी, काला पत्थर, कलयुग, क्रांति, नमक हलाल, न्यू देहली टाइम्स, प्रेम पत्र, प्यार का मौसम, प्यार किये जा, रोटी कपड़ा और मकान, सत्यम शिवम सुन्दरम, शान, शर्मीली, सुहाग, सिलसिला, त्रिशूल, उत्सव, विजेता

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