अमरीश पुरी : नहीं हुआ कोई दूसरा मोगांबो

समय ताम्रकर|
हिन्दी सिनेमा में हर खलनायक की अपनी स्टाइल रही है और वह उसी स्टाइल की बदौलत दर्शकों के दिलो-दिमाग पर तब तक राज करता रहा, जब तक कि नए विलेन ने आकर अपनी लम्बी लकीर नहीं खींच दी। 
 
के.एन.सिंह, प्रेमनाथ, प्राण, अमजद खान से शुरू होकर यह सिलसिला अमरीश पुरी पर आकर ठहर गया। इन हस्तियों ने खलनायक के स्तरीय एवं बहुआयामी चेहरे प्रस्तुत किए, जो आज हिन्दी सिनेमा में मानक बन गए हैं। 
 
अमरीश पुरी अपनी ऊंची-पूरी कद-काठी और बुलंद आवाज के बल पर सबसे आगे निकल गए। उनकी गोल-गोल घूमती हुई आंखें सामने खड़े व्यक्ति के भीतर दहशत पैदा कर देती थी। उनका कसरती बदन फौलाद की तरह मजबूत दिखाई देता था। उनकी फिल्में आकर चली जाती थीं, मगर उनका किरदार दर्शकों को बरसों तक याद रहता था। अमरीश पुरी अक्सर कहा करते थे कि वह 'लवेबल-विलेन' हैं।
 
 
22 जून 1932 को जन्मे अमरीश पुरी चरित्र अभिनेता मदन पुरी के छोटे भाई थे। बीस साल तक वह सरकारी नौकरी में रहे। अपनी क्रिएटिविटी के संतोष के लिए रंगमंच से जुड़ गए। पंडित सत्यदेव दुबे जैसे निर्देशकों के मार्गदर्शन में उन्होंने पचास से अधिक नाटकों में काम कर रंगकर्म के क्षेत्र में अपने को स्थापित किया। 
 
1954 में उन्होंने फिल्मों में किस्मत आजमाने की कोशिश की थी, लेकिन फिल्म निर्माताओं ने 'क्रूड एंड हार्श फेस' कहकर उन्हें ठुकरा दिया। अमरीश ने थिएटर कर तथा विज्ञापनों में अपनी आवाज देकर संघर्ष जारी रखा।
 
चालीस पार का कमाल
जब अमरीश की उम्र चालीस की हो गई, तब उन्हें फिल्मों के ऑफर मिले। इस उम्र तक आते-आते कई कलाकार यह कहते पाए जाते हैं कि उनके खाते में दो दशक का अनुभव और फिल्में हैं। मगर किसे पता था कि कुछ बरस बीत जाने के बाद यही अभिनेता अपने मनपसंद रोल करेगा और खलनायकी की सबसे अधिक कीमत वसूलेगा। 
 
फिल्मकार सुखदेव ने अमरीश को फिल्म रेशमा और शेरा का ऑफर दिया था। कुछ दिनों बाद फिल्म का निर्देशन सुनील दत्त के हाथों में आया, तो अमरीश ने राजस्थान के रेगिस्तान में ऊंटों के बीच चलने वाली इस प्रेमकथा को पसंद कर अपनी मंजूरी दी।
 
बेनेगल की फ्रेम
इस रोल के बाद फिर आधा दशक गुजर गया। जब हिन्दी फिल्मों में कला सिनेमा या समांतर सिनेमा की मशाल श्याम बेनेगल जैसे फिल्मकार ने जलाई, तो रंगमंच और पुणे फिल्म संस्थान से प्रशिक्षित कलाकारों को अनेक ऑफर मिले। अमरीश भी उस भीड़ में शामिल कर लिए गए। 
 
बेनेगल के साथ उन्होंने फिल्म निशांत, मंथन तथा भूमिका जैसी फिल्में की और अपनी अभिनय प्रतिभा का लोहा मनवाया। गोविंद निहलानी की फिल्म अर्द्धसत्य में उन्होंने जानदार रोल किया। 
 
कमर्शियल फिल्मों में अमरीश पुरी की पहचान फिल्म 'हम पांच' (1981) से बनी। इसके बाद फिल्म विधाता और हीरो ने उन्हें हीरो-विलेन बना दिया और उनकी बॉलीवुड में डिमांड बढ़ती चली गई। यहां तक आते हुए यह बता देना जरूरी है कि प्राण साहब की इमेज चरित्र-कलाकार में बदल गई थी। अमजद खान यानी गब्बरसिंह का जादू उतार पर था। 
 
अनेक चिल्लर-विलेन मैदान में जरूर आ गए थे, मगर वे अमरीश के सामने बौने साबित हुए। अमरीश के करियर में धमाका फिल्म 'मिस्टर इण्डिया' के मोगाम्बो से हुआ। उनकी पंच लाइन 'मोगाम्बो खुश हुआ' दर्शक दोहराने लगे। 
 
लार्जर देन लाइफ मोगाम्बो
मोगाम्बो का किरदार विशेष रूप से डायरेक्टर शेखर कपूर ने तैयार किया था। यह कॉमिक के साथ मनोवैज्ञानिक फासिस्ट विलेन था। मोगाम्बो अपने द्वारा निर्मित और शासित द्वीप में रहता है। उसके महल मे कई खूबियां हैं। तेजाब से भरा धुआं उगलता तालाब है। गोल्डन कलर का घुंघराला विग वह पहनता है। सुनहरी और काली एम्ब्रायडरी का जैकेट धारण करता है। सोने के सिंहासन पर बैठता है। 
 
बच्चों की फैंटेसी किताब से निकले किरदार की तरह अमरीश पुरी को सजधज के साथ परदे पर पेश किया गया, तो बच्चे-बड़े सभी उसे चाहने लगे। जब मिस्टर इण्डिया बने अनिल कपूर उसे पटाने की कोशिश करते हैं, तो मजाक बनाकर चेहरे पर चमक लाकर हाथों का संचालन करते अट्टहास करती हंसी के साथ वह बोलता है- मोगाम्बो खुश हुआ। 
 
स्पीलबर्ग की पैनी नजर
जब अमरीश पुरी ने विलेन के अवतार में अपने को ब्रांड बना लिया तो हॉलीवुड के बेताज बादशाह स्टीवन स्पीलबर्ग ने अपनी अगली फिल्म 'इण्डियाना जोंस एंड द टेम्पल ऑफ डूम' (1984) में मुख्य विलेन बनाया। अमरीश ने स्पीलबर्ग की अपेक्षाओं के अनुरूप काम किया और उनकी पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो गई। इसके बाद हॉलीवुड फिल्मों के कई ऑफर उन्हें मिले, मगर भारत में रहकर जो और जैसा रोल मिला, उसे करना उन्होंने अधिक मुनासिब समझा। 
 
अमरीश पुरी अपने समकालीन खलनायकों को अक्सर 'चॉकलेट बॉयज' कहकर पुकारते थे। उनके जैसे बहुआयामी अभिनेता को दिग्गज फिल्मकार श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, शेखर कपूर, सुभाष घई, प्रियदर्शन, राकेश रोशन, राजकुमार संतोषी मिले, जिन्होंने उनकी प्रतिभा को परखा और उनकी संतुष्टि के रोल दिए। अमरीश पुरी की अभिनय प्रतिभा से उनके साथ काम करने वाले हीरो घबराते थे क्योंकि फिल्म के तमाम सीन तो यह चुरा कर ले जाएगा। 
 
नेगेटिव से पॉजिटिव
कुछ फिल्मों में अमरीश को पॉजिटिव रोल करने के मौके भी मिले। प्रियदर्शन की फिल्म मुस्कराहट में एक झक्की जज के रोल को उन्होंने कुछ इस अंदाज में जिया कि पूरी फिल्म में दर्शक मुस्कराते रहे। राजकुमार संतोषी की फिल्म 'घातक' में भी बीमार पिता का रोल उन्होंने बखूबी निभाया। 
 
फूल और कांटे, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, राम लखन, सौदागर, करण अर्जुन, घायल, गदर, दामिनी जैसी कई फिल्मों में उनकी मुख मुद्राएं, संवाद बोलने का अंदाज, बॉडी लैंग्वेज देखने लायक है। अमरीश का स्क्रीन प्रजेंस इतनी जबरदस्त होती थी कि दर्शक ठगे से रह जाते थे। 
 
जब रोल कम मिलने लगे या फिर फालतू रोल उन्होंने उस दौर के दूसरे विलेन के लिए छोड़ दिए, वे घर पर रह कर अपने पोते-पोतियों के टूटे खिलौने सुधारा करते थे या फिर कुंदनलाल सहगल के गाने सुनकर गुजरे जमाने के पलों को पक्रडने की कोशिशों में डूब जाते थे। 
 
कैंसर की बीमारी की वजह से उनका 12 जनवरी 2005 को निधन हुआ। उनके गुजरने के बाद बॉलीवुड को दूसरा दमदार खलनायक अभी तक नहीं मिल पाया है। अमरीश पुरी ने 416 से अधिक फिल्मों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
 
प्रमुख फिल्में
आक्रोश, अर्द्धसत्य, भूमिका, चाची 420, दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे, दामिनी, गर्दिश, गदर, घातक, घायल, हीरो, करण अर्जुन, कोयला, मंथन, मेरी जंग, मि. इण्डिया, मुस्कराहट, नगीना, फूल और कांटे, राम लखन, ताल, त्रिदेव, विधाता

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