फिल्मों में कृष्ण : श्याम तेरी बंशी पुकारे राधा नाम

यदि भारतीय फिल्म के नायकों की भूमिका को गौर से देखा जाए तो वह काफी कुछ श्रीसे मिलती-जुलती है। कृष्ण की तरह की फिल्मों का नायक गोपियों से रास लीला रचाता है। अन्याय के विरूद्ध लड़ता है। लाचारों का साथ देता है और दुश्मनों को उनके किए की सजा देता है। 
 
भारत में जब से फिल्म बनना शुरू हुई तब से कुछ वर्ष पूर्व तक बॉलीवुड की फिल्मों में ऐसे ही नायक हुआ करते थे। कई फिल्मों के नायक या नायिकाओं में हमें श्रीकृष्ण, राधा या मीरा की झलक मिलती थी। 
 
आज परिस्थिति बदल गई है। अब नायक खलनायक बन गया है। वह तमाम ऐसी हरकतें करता हैं जो एक नायक नहीं करता। उसमें कृष्ण के बजाय कंस के गुण पाए जाते हैं। 
 
इसी तरह नायिका में राधा या मीरा की झलक दिखाई देना बंद हो गई। अब कृष्ण नाम का उपयोग दूसरे अर्थ में किया जाने लगा है। घर में राम गली में जैसे मुहावरे गढ़ लिए गए हैं। की छबि फिल्मों से ओझल होती जा रही है। 
 
श्रीकृष्ण पर आधारित फिल्मों की शुरूआत फालके के जमाने से हुई थी। दादा साहेब फालके ने अपनी शुरूआती फिल्मों में पौराणिक विषय चुने थे ताकि दर्शकों की फिल्म में रूचि जागे। भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में काफी उथल-पुथल रही। इसलिए फालके की शुरूआती फिल्म ‘बर्थ ऑफ श्रीकृष्णा’ (1918) और ‘कालिया मर्दन’ (1919) श्रीकृष्ण के जीवन पर आधारित रही। इन फिल्मों में उन्होंने श्रीकृष्ण के जीवन की झलकियों को प्रस्तुत किया।
 
कई मूक फिल्मों के विषय श्रीकृष्ण के जीवन के इर्दगिर्द रहें। बाद में फिल्म वालों ने श्रीकृष्ण के जीवन को आधार बनाकर कई फिल्मों का निर्माण किया। कृष्ण अर्जुन युद्ध (1934), कृष्ण-सुदामा (1947), कृष्ण रूक्मणि (1949), से जो सिलसिला चला तो वह ‘कृष्णा’ (2006) तक जारी है। ‘किस्ना’ और कृष’ जैसी फिल्में भी कृष्ण के नाम पर ही बनाई गई। कुछ एनिमेशमन मूवी भी आईं। 
 
इसी तरह फिल्मी गानों में भी श्रीकृष्ण की गूँज वर्षों तक छाई रहीं। कई ऐतिहासिक फिल्मों में श्रीकृष्ण पर आधारित गीतों और भजनों की रचना हुई। तब नायक आदर्श हुआ करते थे। फिल्में पारिवारिक हुआ करती थी। दर्शकों में श्रद्धा और आस्था जैसे गुण विद्यमान थे। इसलिए फिल्मकारों को ऐसी सिचुएशन मिल जाया करती थी कि वे श्रीकृष्ण पर आधारित गीतों को रचे। 
 
‘मोहे पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो रे’ (मुगले आजम), ‘जागो मोहन प्यारे’ (जागते रहो), ‘श्याम तेरी बंशी पुकारे राधा नाम’ (गीत गाता चल), ‘मधुबन में राधिका नाचे रे’ (कोहिनूर), ‘एक राधा एक मीरा’ (राम तेरी गंगा मैली), ‘यशोमति मैया से बोले नंदलाला’ (सत्यम शिवम सुंदरम), ‘मैया यशोदा ये तेरा कन्हैया’ (हम साथ साथ हैं) ‘राधा कैसे न जले’ (लगान) जैसे गीत आज भी बड़े चाव से चुने जाते हैं। 
 
आजकल न इस तरह की फिल्म बनती है और न ही इस तरह के गीत रखने की सिचुएशन। आज इस तरह का गीत रख दिया जाए तो दर्शक पॉपकार्न खाने बाहर चला जाता है। कृष्णा के कभी-कभार दर्शन होते हैं, लेकिन की तरह हाईटेक रूप में।
 
हाल ही में इम्तियाज अली ने राधा-कृष्ण की अमर प्रेम कहानी पर एक फिल्म बनाने की घोषणा की है। यह देखना दिलचस्प होगा कि वे इस विषय पर कैसी फिल्म बनाते हैं। 

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