बिहार चुनाव का यह होगा दूरगामी असर

पुनः संशोधित सोमवार, 9 नवंबर 2015 (19:53 IST)
विधानसभा चुनावों के परिणाम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा के राजनीतिक इतिहास, इसके गठबंधन और विपक्ष‍ी दलों को कम से कम तीन तरीके से प्रभावित करेंगे। इन परिणामों का सबसे बड़ा असर दिखाई नहीं देगा लेकिन इसका दूरगामी असर राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनावों पर पड़ेगा।
भाजपा को उम्मीद रही होगी कि उसे बिहार चुनावों में जीत मिलेगी तो वह राज्यसभा में भी निर्णायक स्थिति में आ जाएगी, लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकेगा और इसका सीधा सा असर यह होगा कि अगस्त, 2017 में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव होंगे। सरकार अपनी पसंद के प्रत्याशियों को चुनवाने में नाकाम हो सकती है। राज्यसभा में सरकार का असर यह तय करेगा कि केन्द्र सरकार किस स्तर तक संवैधानिक संशोधनों को करने में समर्थ होगी। 
 
इन चुनाव परिणामों के साथ ही लालूप्रसाद यादव और नीतीश कुमार देश की राजनीति के केन्द्र में आ गए हैं। राज्यसभा के एक तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष बाद राज्य विधानसभा द्वारा चुने जाते हैं। राज्यसभा सांसदों को चुनने वाला बिहार एक बड़ा राज्य है और इस राज्य से राज्यसभा सांसदों की बड़ी संख्या सदन में सरकार की विधायी क्षमता को गंभीरता से प्रभावित करेगी। संविधान संशोधन के लिए सरकार के पास दोनों  सदनों में दो तिहाई बहुमत होना आवश्यक है। इसके चलते एनडीए की संभावित ताकत पाने की कोशिश कर पानी फिर गया है।      
 
इसी तरह उपराष्ट्रपति का चुनाव दोनों सदनों के सदस्यों के द्वारा किया जाता है और दोनों सदनों में सत्तारूढ़ गठबंधन की यह कमजोरी उपराष्ट्रपति ही नहीं वरन देश के राष्ट्रपति के चुनाव में भी निर्णायक साबित हो सकती है। राष्ट्रपति के चुनावों में संसद के दोनों सदनों और देश की सभी विधानसभाओं के सदस्य वोट देते हैं। 
 
सांसदों के मतों का वजन विधानसभा के सदस्यों के सामूहिक वजन के बराबर होता है। बिहार के सांसदों और विधायकों की संख्या काफी अधिक है, इस स्थिति के चलते प्रधानमंत्री अपनी पसंद का राष्ट्रपति चुनवाने में सफल नहीं हो पाएंगे। यह सभी जानते हैं कि सभी कानूनों और संशोधनों के लिए राष्ट्रपति के हस्ताक्षर महत्वपूर्ण होते हैं, इसलिए अपने पसंद का राष्ट्रपति न होने से मोदी सरकार सभी कानूनों और संशोधनों को प्रभावी बनाने से वंचित रह जाएगी।   
 
बिहार ने नतीजों का दूसरा और सीधा असर यह होगा कि राष्ट्रीय राजनीति और पार्टी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की स्थिति कमजोर होगी। शिवसेना जैसे सहयोगी दल तो अभी से कहने लगे हैं कि पैसे और प्रचार के बल पर लोगों को केवल एक बार ही मूर्ख बनाया जा सकता है। इतना ही नहीं, जब बिहार में मतगणना चल रही थी तभी गुजरात के सत्तारुढ़ दल के एक विधायक ने सार्वजनिक रूप से पार्टी नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े कर दिए। ऐसी स्थिति में गृहमंत्री राजनाथसिंह का आरएसएस प्रमुख से भेंट करना और भी मनोरंजक बात है। विदित हो कि राजनाथसिंह ऐसे पूर्व पार्टी प्रमुख रहे हैं जिन्होंने खुले तौर पर प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की दावेदारी की वकालत की थी। 
 
इसके बाद ही मोदी और शाह की जोड़ी ड्राइविंग सीट पर आई, जबकि नई सरकार के सत्ता में आते ही कई मीडिया रिपोर्ट्स के चलते राजनाथसिंह को अपमान का घूंट पीना पड़ा और उनके ही एक वरिष्ठ सहयोगी ने इस तरह की खबरें मीडिया में दी थीं कि राजनाथ के बेटे को मोदी ने अपने घर पर बुलाकर डांटा। यह बात निश्चित है कि राजनाथ अपना यह अपमान भूले नहीं होंगे। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं में जो  थोड़ी बहुत बेचैनी होगी भी तो वह फिलहाल ढंकी-मुंदी रहने की संभावना है।   
 
लेकिन, मोदी-शाह की जोड़ी ने अपने गठबंधन के सहयोगी दल, शिवसेना के साथ जिस तरह से उद्दंडता का परिचय दिया, वह अब उल्टा पड़ने लगा है। शिवसेना के एक नेता ने चुनाव में पराजय के लिए सीधे-सीधे और सार्वजनिक तौर पर मोदी को जिम्मेदार ठहराया है। अब भाजपा को पछताना होगा कि कुछ माह पहले उसने महाराष्ट्र के कद्दावर नेता शरद पवार के ‍कथित तौर दाऊद इब्राहिम से रिश्तों को लेकर नरम रुख अपनाने की बजाय तीखा विरोध क्यों नहीं किया।      
 
बिहार के परिणामों का एक तीसरा बड़ा असर यह होगा कि इस जीत के बाद राष्ट्रीय स्तर के विपक्ष में नई जान आ जाएगी। लालू प्रसाद ने चुनौती देना शुरू कर दिया है कि वे हस्तिनापुर की सरकार को गिराकर ही दम लेंगे। उनका कहना है कि विपक्ष को ऐसे 'फासीवादी शासन' को एक दिन के लिए भी स्वीकार नहीं करना चाहिए।
 
आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अगर लालू 2019 में होने आम चुनावों के लिए खुद को प्रधानमंत्री पद के एक दावेदार के तौर देखने लगें। उनकी पार्टी ने बिहार में सबसे ज्यादा सीटें जीती हैं, लेकिन राज्य सरकार को चलाने की जिम्मेदारी उन्होंने नए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को  सौंप दी।    
 
इसके जवाब में नीतीश ने 2019 को लेकर मीडिया के सवालों के उत्तर देने का भार लालू  यादव पर छोड़ दिया। हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि  प्रधानमंत्री पद पर सभी की निगाहें बनी हुई हैं। लेकिन फिलहाल बिहार के नतीजों ने  सबसे बड़ा सवाल यह पैदा कर दिया है कि क्या गैर-एनडीए दल वर्ष 2019 के चुनावों के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन करेंगे या फिर दोनों ही भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ  जाकर किसी तीसरे मोर्चे का गठन करेंगे। 
 
हालांकि बिहार में पहले जद (यू) और राजद का गठबंधन सफल साबित हुआ है लेकिन  कुछ दल, जैसे उड़ीसा में बीजू जनता दल, सीमांध्र में तेलगू देशम और केवल केरल में  सिमटे वामपंथी, कांग्रेस के साथ गठबंधन में सहयोगी नहीं बन सकते क्योंकि इनके  अपने गृह राज्यों में कांग्रेस उनकी मुख्‍य प्रतिद्वंद्वी है। लेकिन वर्ष 2019 के लोकसभा  चुनावों से पहले एक बड़ा उत्तर प्रदेश के चुनावों के लिए गठबंधनों का होगा। वर्ष 2017  में होने वाले ये चुनाव इस लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह देश का सबसे बड़ा  राज्य है और पिछले वर्ष भाजपा ने राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 90 फीसदी सीटों पर जीत हासिल की थी।    
 
इसके साथ ही, अमित शाह ने पार्टी पर अपनी पकड़ पूरी तौर पर बना ली थी और  इसके साथ ही भाजपा को लोकसभा में बहुमत भी हासिल हुआ था। लेकिन इससे पहले  मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी ने राज्य विधानसभा चुनावों शानदार जीत  हासिल की थी। और तब से मुलायम सिंह यादव भी खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार  मानने लगे हैं। यूपी की एक दूसरी बड़ी नेता, बसपा प्रमुख मायावती अगर सत्तारुढ़  विरोधी मतों के चलते और एक समुचित गठबंधन के चलते यूपी की सत्ता में वापसी  करती हैं, तो यह भी एक बड़ा बदलाव हो सकता है।   
 
इनमें से कोई भी प्रमुख दल यूपी में कांग्रेस के साथ गठबंधन बना सकता है। या संभव  है कि सपा और बसपा जैसे दल भी गठजोड़ बना लें। लेकिन बिहार चुनावों से थोड़ा  पहले समाजवादी पार्टी के 'महागठबंधन' से अलग होने ने इस आशंका को बल दिया है  कि इसने भाजपा के साथ गोपनीय समझौता कर रखा है। बहुत कुछ अभी भी हवा में ही है लेकिन इतना तय यह है कि बिहार के नतीजों ने देश की राजनीति में नई जान फूंक  दी है।   

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