जहां फ़सल के साथ महिला किसानों की लाशें उगीं...

Last Updated: बुधवार, 29 अगस्त 2018 (13:07 IST)
- प्रियंका दुबे

की उन महिला किसानों की कहानियां, जिन्होंने खेती बचाने की कोशिश करते-करते जान दे दी।
के तीन गाँवों की एक तस्वीर :
अमरावती का शेंदुरजना गांव:
'वो लड़की नहीं, लड़का थी मेरा! खेती में कंधे से कंधा मिलाकर मेरा साथ देती। लेकिन जब उसकी शादी करनी थी, तभी सारी फ़सल ख़राब हो गई। कुछ नहीं तो मेहमानों को सादा भोजन करवाकर बेटी को एक जोड़ी कपड़ों में तो विदा करना ही था। इतने भी पैसे नहीं बनते थे। कहां से करते शादी? मेरी बच्चियाँ सब सुनती थीं पर कभी हमें एहसास नहीं होने दिया कि वो परेशान हैं। बस एक दिन अचानक चली गयीं।'

यवतमाल का पिपरी बुट्टी गांव:
'सब जगह ढूंढा पर मां नहीं मिलीं...फिर गांव के बाहर के कुएं पर गया। वहां देखा कि मां की चप्पल कुएं के बाहर पड़ी थी। खेती करने से क्या होगा? आपके यहां आने और मेरे बारे में लिखने से क्या होगा? किसी भी चीज़ से क्या होगा? अरे, मेरे घर मुख्यमंत्री आकर चले गए...फिर भी मेरी किसान माँ ने आत्महत्या कर ली। मुख्यमंत्री के आने से जब कुछ नहीं हुआ। फिर किसी भी बात से क्या हो जाएगा?'

यवतमाल का ही वागधा गांव:
'कागज़ों पर हमारा कर्ज़ा माफ़ हो चुका था जबकि असलियत में हम पर अब भी 45 हज़ार कर्ज़ था। जिन माइक्रो फाइनेंस कम्पनियों से हमने कर्ज़ लिया था उनके लोग घर आकर पैसे के लिए मां को सताते थे। मां को दुःख होता पर दुःख से ज़्यादा शर्म आती। अगर शिवाजी स्कीम के मुताबिक़, हमारा पूरा पैसा माफ़ हो जाता तो शायद माँ बच जाती।'

राजधानी दिल्ली से लगभग 1200 किलोमीटर दूर स्थित महाराष्ट्र का अमरावती जिला बीच मानसून की हल्की फुहारों में भीगा हुआ है। चौड़ी सड़कें, चौतरफ़ा हरियाली और राज्य के विदर्भ इलाक़े में पड़ने वाले इस जिले का इंद्रधनुषीय आकाश आपके आसपास ख़ुशहाली का भ्रम रचता है। लेकिन टीक के पेड़ों और काली मिट्टी के खेतों से सजे यह ख़ूबसूरत रास्ते विदर्भ के जिन गांवों तक जाते हैं, वहां अवसाद और दुख के सिवा कुछ नहीं है। पर विदर्भ के इस दुख के कारणों और इससे जुड़े आंकड़ों में जाने से पहले आइए आपको ले चलते हैं जिले की तिवसा तहसील में बसे शेंदुरजना गांव।

इस गांव में रहने वाले भास्कर और देवकू राव असोडे का घर ढूँढने के लिए हमें ज़्यादा भटकना नहीं पड़ता। गांव का हर बाशिंदा उस किसान के बारे में जानता था, जिसकी 2 जवान बेटियों ने हाल ही में बढ़ते क़र्ज़ के चलते आत्महत्या कर ली थी। ज़्यादातर पुरुष किसानों की आत्महत्याओं के दस्तावेज़ों से अटी विदर्भ के कृषि विभाग की फ़ाइलों में दर्ज 24 वर्षीय माधुरी और 21 वर्षीय स्वाति की यह कहानी राज्य की 'किसान बेटियों' के हिस्से आने वाले संघर्षों की दास्तान है।

कीचड़ भरी एक अंधेरी गली पार करके हम हरी दीवारों वाले एक ऐसे घर के सामने पहुंचते हैं, जिसके मुख्य दरवाज़े पर बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर का एक विशाल पोस्टर चिपका हुआ है। भीतर दाख़िल होते ही हमारी मुलाक़ात 45 वर्षीय देवकू असोडे से होती है। नारंगी रंग की मटमैली साड़ी पहने अपनी रसोई में बैठी देवकू सब्ज़ी काट रही थीं। हमें देखते ही उन्होंने रोना शुरू कर दिया। एक ग्लास पानी पीने और 5 मिनट की ख़ामोशी के बाद देवकू ने हल्की आवाज़ में बोलना शुरू किया।

'दोनों ही बार मुझे अंदाज़ा नहीं हुआ कि मेरी बेटियां ऐसा कुछ करने वाली हैं। खेती के लिए हमें कर्ज़ा लेना पड़ा था। कर्ज़ा चुकाने को लेकर तनाव भी रहता है। लेकिन हमने कभी नहीं सोचा था कि वह इतना बड़ा कदम उठा लेंगी।' बेटियों की फ़्रेम करवाई हुई तस्वीरें गोद में लिए बैठी देवकू के गमगीन चेहरे पर रसोई की खिड़की से गिरती धूप पड़ रही थी।

'बड़ी वाली उस दिन बिल्कुल सामान्य थी। उसने सुबह उठकर घर की सफ़ाई की। खाना बनाया। फिर बाल धोकर नहाई और खाना खाया। इसके बाद अचानक शाम के 4 बजे उसने ज़हर (कीटनाशक) खा लिया। तीन महीने के अंदर ही छोटी वाली ने भी ज़हर (कीटनाशक) पी लिया। वह भी पूरे दिन ठीक थी। शाम को टहलने छत पर गयी थी। वहीं उसने ज़हर पी लिया।'
कहते कहते देवकू रुआंसी होकर दीवार को देखने लगती हैं। 50 वर्षीय भास्कर राव असोडे बताते हैं कि उनकी बेटियों की मौत के बाद से उनकी पत्नी देवकू डिप्रेशन और मानसिक अस्थिरता का शिकार हो गईं हैं। भास्कर को अपनी 'किसान बेटियों' पर आज भी नाज़ है। लेकिन बेटियों की तस्वीरों पर दर्ज उनकी मौत की तारीखें देखकर बीच-बीच में उनका साहस टूटता भी रहा।

माधुरी
एक दो साल तो सब ठीक रहा लेकिन बीते साल जब बड़ी बेटी की शादी करनी थी, तभी सारी फ़सल ख़राब हो गयी। बड़ी बेटी माधुरी को याद करते हुए वह कहते हैं, 'वो लड़की नहीं, लड़का थी मेरा! खेती में कंधे से कंधा मिलाकर मेरा साथ देती। बीज लगाने से लेकर रोपाई हो, दवा का छिड़काव या कपास चुनना हो। सारा काम करती थी। उसने मुझे कभी महसूस नहीं होने दिया कि वो मेरी परेशानियों से परेशान है। हमेशा मेरी हिम्मत बँधाती। कहती थी कि पापा सब ठीक हो जाएगा। पर घर के हालात तो सब उसके सामने ही थे।'

इतने कहते-कहते भास्कर फफक फफककर रोने लगते हैं। इस परिवार के पास अपनी एक एकड़ ज़मीन है। पर उससे गुज़ारा न हो पाने के कारण भास्कर हर साल ज़मीन किराए पर लेकर खेती किया करते थे। 'मैं बरसात और सर्दियों में 4-5 एकड़ ज़मीन मगते (किराए) पर लेकर खेती करता हूं। इस तरह साल में 10 से 12 एकड़ ज़मीन का किराया भरना पड़ता है। एक दो साल तो सब ठीक रहा लेकिन बीते साल जब बड़ी बेटी की शादी करनी थी, तभी सारी फ़सल ख़राब हो गयी'।

भास्कर ने खेती के लिए साहूकारों से लेकर माइक्रो फ़ाइनेंस कंपनियों तक से कर्ज़ा लिया। ज़मीन किराए पर ली। फिर मज़दूरों, कीटनाशक और खाद पानी का ख़र्च मिलकर उनके 1.5 लाख रुपये निवेश में लग गए। 'दाम ठीक नहीं मिला। फ़सल निकली तो सिर्फ़ 90 हज़ार मिले 6 एकड़ में उपजी मूँगफली की फ़सल के। मुझे 90 हज़ार का नुक़सान हो गया। फिर भी हमने अगले मौसम में हिम्मत करके कपास उगाया। फ़सल अच्छी हुई लेकिन ठीक काटने से पहले उसमें बोंदड़ी (पिंक पेस्ट नामक कपास में लगने वाला कीड़ा) लग गयी। हमारी खड़ी फ़सल ख़राब हो गयी।'

दो-दो फ़सलें ख़राब होने के बाद भास्कर के घर में उदासी छा गयी। लगातार रोने से उनकी लाल हो चुकी आँखों में अब भी आंसू भरे थे। 'हम मेहनत करने वाले किसान हैं मैडम। शरीर तोड़ मेहनत करते हैं, फिर भी कर्ज़ लेना पड़ा। एक तो कर्ज़ा देने वाले घर आने लगे और दूसरी तरफ़ फ़सलें ख़राब हो गईं। दाम नहीं मिले। घाटा लग गया और एक के बाद एक मेरे दो बच्चों ने आत्महत्या कर ली। जब मेरे बच्चे मरे, तब हम पर ढाई लाख का कर्ज़ा था। इसलिए इस साल दुखी होकर मैंने कोई फ़सल ही नहीं उगाई।'

भास्कर का परिवार खेती में होने वाले नुकसान का किसान परिवार पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों का सटीक उदाहरण हैं। खेती में नुक़सान के बेटियों की शादी पर पड़े प्रभाव के बारे में बताते हुए वह कहते हैं, 'बड़ी बेटी को देखने रिश्ते वाले मेहमान आते रहते थे। कई बार बात तय भी हो जाती लेकिन हम हमेशा क़र्ज़ में डूबे रहते। कुछ नहीं तो मेहमानों को सदा भोजन करवाकर बेटी को एक जोड़ी कपड़ों में तो विदा करना ही था। इतने भी पैसे नहीं बनते थे। कहां से करते शादी?

रिश्तेदार सब कहने लगे थे कि दो-दो जवान बेटियां घर में हैं। मेरी बच्चियाँ सब सुनती थीं पर कभी हमें एहसास नहीं होने दिया कि वो परेशान हैं। बस एक दिन अचानक चली गयीं।' देवकू और भास्कर के दो बेटे हैं लेकिन खेती और घर से जुड़ा सारा आर्थिक व्यवहार स्वाति ही संभालती थी। परिवार बेटों को पढ़ा लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहता था इसलिए वह खेती में कभी शामिल नहीं हुए।

स्वाति
स्वाति स्कूल ख़त्म कर आगे डिप्लोमा की पढ़ाई करने वाली थी। फ़िलहाल घर में सबसे पढ़ी लिखी वही थी। परिवार के लोग बताते हैं कि माधुरी और स्वाति में बहुत प्यार था। बड़ी बहन के जाने के बाद स्वाति सदमे में रहने लगी।
'स्वाति स्कूल ख़त्म कर आगे डिप्लोमा की पढ़ाई करने वाली थी। फ़िलहाल घर में सबसे पढ़ी लिखी वही थी। इसलिए सारा व्यवहार वही रखती। किसका कितना कर्ज़ा है, किसको कितना उधार चुकाना है- सब उसे मालूम था। मैं जो भी कमाता, सारे पैसे उसी के हाथ में देता। उसकी भी शादी की बात चल रही थी लेकिन पैसों की वजह से शादी तय नहीं हो पा रही थी।

माधुरी के बाद उस पर काम का बोझ भी बढ़ गया। खेतों में काम भी करती, घर का काम भी और हिसाब किताब भी। वो परेशान तो थी पर इतना टूट जाएगी की ख़ुद अपनी जान ले लेगी, ऐसा हमने सपने में भी नहीं सोचा था।' माधुरी और स्वाति की मौत के बाद तिवसा के तहसीलदार भास्कर के घर आए थे। वह मौत की तारीखें और दूसरी ज़रूरी जानकारियां भी नोट करके ले गए लेकिन उन्हें अब तक कोई मुआवज़ा नहीं मिला है।

भास्कर के बेटे सागर का मानना है कि भारत के किसानों को अब खेती छोड़ देनी चाहिए। चेहरे पर किसी उजड़े शहर जैसे उदासी लिए वह कहते हैं, 'हमारी बहनें हमें माँ से भी ज़्यादा प्यार करती थीं। लेकिन खेती में हुए नुक़सान और कर्ज़ की वजह से उन्होंने सुसाइड कर लिया। इस देश में किसानों की कोई इज़्ज़त ही नहीं है। 70 हज़ार ज़मीन में डालो तब 45 हज़ार वापस मिलता है। हर फ़सल पर इतना नुकसान किसान कैसे सहेगा? ऐसे आत्महत्या करके मरने से तो अच्छा है कि किसान खेती करना ही छोड़ दें।'

आंकड़े
आंकड़े बताते हैं कि महाराष्ट्र में वक़्त के साथ किसानों के हालात बद से बदतर ही हुए हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, बीते दो दशकों में इस राज्य के 60 हज़ार से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इस साल के शुरुआती 3 महीनों में ही महाराष्ट्र में तक़रीबन 700 किसान बढ़ते क़र्ज़ और खेती में नुकसान के चलते अपनी जान दे चुके हैं। राज्य के विदर्भ और मराठवाड़ा इलाके 1995 से ही किसानों की आत्महत्या का भौगोलिक केंद्र रहे हैं।

शेंदुरजना गांव से 10 किलोमीटर दूर स्थित तहसीलदार के दफ़्तर में मुख्य अधिकारी राम ए. लंके, स्वाति और माधुरी के बारे में पूछे जाने पर व्यंग्य भरे लहजे में मुस्कुराते हुए कहते हैं, 'यहां लोग अपने निजी या पारिवारिक कारणों से आत्महत्या करते हैं। यह सब मीडिया की फैलाई हुई बातें हैं। वरना असल में कर्ज़ और किसानों की आत्महत्या में कोई संबंध नहीं।'

दोबारा कुरेद कर शेंदुरजना की दो बहनों के बारे में पूछने पर वह फ़ाइलें मंगवाकर देखते हैं। वो कहते हैं, 'माधुरी को किसान साबित करने के लिए ज़रूरी साक्ष्य मौजूद नहीं थे इसलिए उसके मामले में हम कोई मुआवज़ा नहीं दे सके। लेकिन स्वाति को किसान माना गया है। उनके परिवार को जल्दी ही स्वाति के नाम पर जारी 1 लाख का सरकारी मुआवज़ा दिया जाएगा।'

स्थानीय पत्रकारों से बात करने पर यह भी मालूम चला कि माधुरी की आत्महत्या को एक काल्पनिक प्रेम प्रसंग से जोड़ कर गांव में उड़ाई गई झूठी बेबुनियाद अफ़वाहों ने भी 'माधुरी को किसान न मानने' के सरकारी महकमे के निर्णय को प्रभावित करने में अपनी भूमिका निभाई। तहसीलदार के दफ़्तर से निकलते हुए मुझे अचानक भास्कर की बिलखती ज़बान से पूछा गया वह सवाल याद आ गया जिसने मुझे भी भीतर तक झकझोर दिया था।

'जब मेरी बड़ी बेटी सारी ज़िंदगी दिन-रात मेरे साथ खेतों में काम करती रही, तब भी सरकार ने उसकी आत्महत्या को किसान की आत्महत्या क्यों नहीं माना? अगर उसके मरने के बाद हमें समय पर मुआवज़ा मिल गया होता तो शायद मेरी छोटी बेटी की जान बच सकती थी।'

वसंतराव नाइक
अमरावती से आगे बढ़ते ही हम यवतमाल पहुंचे। यह समय का व्यंग्य ही है कि महाराष्ट्र का जो यवतमाल ज़िला बीते 2 दशकों से किसान आत्महत्याओं से जूझ रहा है, उसी जिले में जन्मे वसंतराव नाइक न सिर्फ़ 12 वर्षों तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे बल्कि देश में हरित क्रांति के जनक के तौर पर भी पहचाने गए।
अमरावती से यवतमाल के रास्ते में मुझे अक्सर छोटे छोटे गांवों में आज भी शिवाजी के साथ टंगे वसंतराव नाइक की तस्वीरें दिखाई दे जाती। तब एक ख़याल मन में अक्सर उठता, किसने सोचा था कि यवतमाल की जिस हरी-भरी धरती को नाइक किसानों का स्वर्ग बनाना चाहते थे, वही यवतमाल एक दिन किसानों की क़ब्रगाह के नाम से पहचाना जाएगा।

यवतमाल के पिपरी बुट्टी गांव में अब तक 42 किसान कर्ज़ और खेती में हुए माली नुकसान की वजह से आत्महत्या कर चुके हैं। यहीं रहने वाले 30 वर्षीय मोहन प्रहलाद तज़ाणे का घर पहली बार में आपकी नज़र से छूट सकता है। दो बदरंग से कच्चे-पक्के मकानों के बीच मौजूद प्रह्लाद के एक कमरे के छोटे से घर की कच्ची दीवारें इतनी टूटी और जर्जर हैं कि पहली नज़र में आप उसे किसी बड़े मकान का ढह चुका हिस्सा समझ कर आगे बढ़ जाएँगे।

लेकिन घर के भीतर कदम रखते ही गोबर से रंगी गयी कमरे की कच्ची दीवारें, धूल में लिपटे चंद बर्तन और कमरे के बीच में पड़ा एक टूटा बिस्तर- यहां मरने और जीने वालों की तकलीफ़ों भरी ज़िंदगी की गवाही पेश करते हैं।

शांताबाई
मोहन की मां शांताबाई तज़ाणे किसान थीं। सितम्बर 2015 में उन्होंने खेती के लिए लिया गया कर्ज़ा न चुका पाने की वजह से ख़ुदकुशी कर ली। आज मोहन मज़दूरी करके अपने दो बच्चे और पत्नी का पेट पालते हैं। उनकी पत्नी तीसरे बच्चे से गर्भवती है। लेकिन मोहन अपने तीसरे बच्चे को किसी रिश्तेदार को गोद देने का मन बना चुके हैं। उदास आंखों से अपने छोटे बेटे को गोद में लेते हुए वह कहते हैं कि उनके पास तीसरे बच्चे को पालने के संसाधन नहीं हैं।

लेकिन मोहन के इस तीसरे बच्चे की क़िस्मत तो 2011 में उस वक़्त ही तय हो गयी थी, जब मोहन के किसान पिता बाबूराम प्रहलाद तज़ाणे ने बढ़ते कर्ज़ के कारण आत्महत्या की थी। इसके बाद मोहन की माँ ने घर की बागडोर अपने हाथ में ली। वह किसान की भूमिका में आईं और अपनी पांच एकड़ ज़मीन पर खेती करने लगीं। पर फ़सल के ठीक दाम नहीं मिले और कर्ज़ ने उनका पीछा नहीं छोड़ा।

मुख्यमंत्री का दौरा
इस बीच उनके गांव में किसानों का आत्महत्या करना जारी रहा। तभी मार्च 2015 में मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस मोहन के गांव आए। गाड़ियों का इतना लम्बा काफ़िला मोहन को आज भी याद है।

'पूरे गांव में अफ़रा तफ़री मच गयी। बताया गया कि मुख्यमंत्री गांव का दौरा करेंगे और रात को भी यहां रुकेंगे। हमें लगा अब हमारी मुश्किलें कम हो जाएँगी। देवेंद्र फडनवीस मेरे घर भी आए थे। उन्होंने घर की हालत देखकर कहा कि 'अरे, इसकी परिवार की हालत तो बहुत ख़राब है।' फिर उन्होंने कहा कि वह मुझे मदद में कुंआ देंगे। मैंने कहा मुझे धड़क योजना में कुंआ दे दो। उन्होंने कहा- धड़क नहीं, रोज़गार योजना में देंगे। फिर रोज़गार योजना में मुझे कुंआ जारी हुआ। मैंने अपनी तरफ़ से भी कर्ज़ा ले लेकर पैसे लगाए लेकिन कुएँ में आज तक पानी नहीं है।'

'धड़क योजना' महाराष्ट्र सरकार की एक जन-कल्याण स्कीम है। इसके तहत किसानों को सरकारी ख़र्च पर कुंआ बनवाकर दिया जाता है। इस योजना के तहत गांव में कुंआ बनवाने के लिए 'किसान आत्महत्या' की घटनाओं वाले परिवारों को प्राथमिकता दी जाती है। मोहन के परिवार को 'धड़क योजना' की बजाय मनरेगा योजना के तहत कुंआ दिया गया। इसके तहत ज़मीन देने से लेकर मज़दूर जुटाने तक का सारा काम ग्राम पंचायत और क्षेत्र में मनरेगा के नोडल अधिकारी के पास आ गया। मोहन के अनुसार प्रशासनिक लचरता, कभी मज़दूरों की कमी तो कभी मशीनों की गैर-मौजूदगी की वजह से उनके कुंए का काम पूरा नहीं हो पाया। क़र्ज़ जस का तस बना रहा।

'वहां देखा कि मां की चप्पल कुंए के बाहर पड़ी थी'
'धड़क योजना हमको आसान पड़ती पर उसमें कुंआ मिला नहीं। मनरेगा में तो काम ठीक से होता नहीं। इसलिए कुंआ तो पूरा बना नहीं। क़र्ज़ बढ़ता ही गया। मेरी माँ खेती करती तो मुनाफा नहीं होता। 70 हज़ार निवेश करते तो 45 हज़ार मिलता। नुकसान ही नुकसान। मां परेशान रहती थी। फिर सितम्बर 2015 में उस दिन मैंने मां से पूछा कि कर्ज़ा कैसे चुकाएंगे। मां ने कहा कि वो नया कर्ज़ा लेने की कोशिश करेगी। कुछ नहीं हुआ तो हम अपनी ज़मीन किराए से खेती के लिए दे देंगे। इसी सोच में मैं खाना खाकर गांव में टहलने निकला। लौट के आया तो देखा मां घर में नहीं थी। सब जगह ढूँढा पर मां नहीं मिली। फिर गांव के बाहर के कुंए पर गया। वहां देखा कि मां की चप्पल कुंए के बाहर पड़ी थी'।
शांताबाई की मौत के बाद प्रहलाद को मुआवज़ा में एक लाख रुपए मिले, जिससे उन्होंने अपना कर्ज़ा चुकाया। आज खेती के बारे में पूछने पर उनके चेहरे पर व्यंग्य में डूबी एक हंसी रहती है। वह मुस्कुराते हुए मुझसे कहते हैं, 'मैं अपनी पांच एकड़ ज़मीन अब किराए पर दे देता हूँ। ख़ुद खेती नहीं करता क्योंकि उसमें सिर्फ़ नुकसान है। मुझे रोज़ का 100 रुपया मज़दूरी मिल जाती है, उसी से अपना घर चलाता हूँ।'

अलविदा कहते हुए वह दुख में डूबी आवाज़ में जोड़ते हैं, 'ज़मीन के किराए से कर्ज़ा चुका रहा हूँ। खेती करने से क्या होगा? आपके यहां आने और मेरे बारे में लिखने से क्या होगा? किसी भी चीज़ से क्या होगा? अरे मेरे घर मुख्यमंत्री आकर चले गए...फिर भी मेरी किसान माँ ने आत्महत्या कर ली। मुख्यमंत्री के आने से जब कुछ नहीं हुआ फिर किसी भी बात से क्या हो जाएगा?'

गांव छोड़ने से पहले मेरी मुलाक़ात गांव के युवा सरपंच मंगेश शंकर ज़हरीले से होती है। गांव में बढ़ती किसान आत्महत्याओं के बारे में पूछने पर वह ग़ुस्से में कहते हैं, 'मुख्यमंत्री गांव में आए और सिर्फ़ पेपरबाज़ी और नाश्ता करके चले गए। मुख्यमंत्री के गांव को गोद लेने के बाद भी काम क्या हुआ- एक सड़क और एक बस स्टैंड। किसानों को जिस मदद की ज़रूरत थी, वह तो मिली ही नहीं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तो मैं इतना दुखी हूं कि अब शिकायत भी नहीं करना चाहता। चुनाव से पहले उन्होंने वादा किया था कि सब किसानों का कर्ज़ा माफ़ करेंगे। अभी तक नहीं हुआ। इस गांव में 42 किसानों ने जान दी पर अब तक सिर्फ़ 12 परिवारों को 'किसान आत्महत्या' परिवारों को मिलने वाले लाभ मिले। बाक़ी को कागज पर सरकार ने माना ही नहीं। सिर्फ़ चाय पर चर्चा करने से किसान की समस्या ख़त्म नहीं हो जाती'।

देवेंद्र राव पवार
यवतमाल गांव में मेरी मुलाक़ात क्षेत्र में किसानों के मुद्दों पर बीते एक दशक से काम कर रहे देवेंद्र राव पवार से होती है। विदर्भ में कभी न ख़त्म होने वाली किसान आत्महत्याओं के सिलसिले के बारे में वह कहते हैं, 'शर्म की बात है कि हरित क्रांति के जनक वसंत राव नाइक का ज़िला आज किसानों की क़ब्रगाह में तब्दील हो गया है।

20 मार्च 2014 को नरेंद्र मोदी यहां आए थे। उन्होंने यहां से किसानों से वादा किया कि अगर उनकी सरकार आएगी तो वह स्वामीनाथन कमीशन की सिफ़ारिशें लागू करेंगे और किसानों को 50 फीसदी मुनाफ़े पर न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलवाएंगे। उन्होंने कहा था कि उनके शासन में एक भी किसान आत्महत्या नहीं करेगा। लोगों ने भरोसा करके उनको चुना पर नतीजा क्या हुआ? साल में जितने दिन होते हैं, उससे भी ज़्यादा किसान यवतमाल में हर साल आत्महत्या कर रहे हैं'।

देवेंद्र ने क़र्ज़माफ़ी के लिए हाल ही में शुरू की गई महाराष्ट्र सरकार की 'छत्रपति शिवाजी महाराज शेतकर (किसान) सम्मान योजना' का ज़िक्र भी किया। इस योजना के तहत जिन भी किसानों ने 1.5 लाख या उससे कम क़र्ज़ लिया है, उसे माफ़ किए जाने का प्रावधान है। लेकिन कागज़ों पर जन-कल्याण का मोती लगने वाली इस योजना का ज़मीन पर पालन नहीं हो रहा है।

रेणुका चौहाण
ताज़ा उदाहरण यवतमाल के पंडरकवड़ा तहसील के वागधा गांव में रहने वाला रेणुका चौहाण का परिवार है। अपनी पांच एकड़ ज़मीन पर खेती कर अपने परिवार का भरण पोषण करने वाली रेणुका चौहाण ने मई 2018 में ज़हर खाकर ख़ुदकुशी कर ली। उनके परिवार में उनके 3 बेटे, पति और विकलांग सास-ससुर हैं। रेणुका की मृत्यु के बाद से उनके पति भी अपनी मानसिक स्थिरता खो बैठे हैं।

रेणुका के परिवार ने खेती के लिए 60 हज़ार रुपए का क़र्ज़ लिया था लेकिन फ़सल में कीड़े लग जाने की वजह से वो कर्ज़ चुका नहीं पाए। 'छत्रपति शिवाजी महाराज शेतकर सम्मान योजना' के तहत जब वह अपने कर्ज़ माफ़ी की गुहार लेकर कलेक्ट्रेट गयीं तब उसका सिर्फ़ 15 हज़ार क़र्ज़ माफ़ किया गया।

रेणुका के सबसे बड़े बेटे अंकुश बताते हैं, 'कागज़ों पर हमारा क़र्ज़ा माफ़ हो चुका था जबकि असलियत में हम पर अब भी 45 हज़ार क़र्ज़ था। जिन माइक्रो फ़ाइनेंस कम्पनियों से हमने क़र्ज़ लिया था उनके लोग घर आकर पैसे के लिए मां को सताते थे। मां को दुःख होता पर दुःख से ज़्यादा शर्म आती। अगर शिवाजी स्कीम के मुताबिक़ हमारा पूरा पैसा माफ़ हो जाता तो शायद मां बच जाती'।

जब हमने अंकुश के घर से विदा ली तब तेज़ बरसात हो रही थी। अपने छोटे से घर की छत में बने सुरागों से गिरते पानी को देखते हुए अंकुश का चेहरा अपने अनिश्चित भविष्य की तरह ही अनिश्चित लग रहा था। पंडरकवड़ा से निकलकर यवतमाल ज़िला मुख्यालय के कलेक्ट्रेट दफ़्तर में हम अब तक इकट्ठा हुए सवालों के जवाब ढूंढने पहुंचे। यहां पदस्त रेसीडेंट डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर नरेंद्र फुलझले शिवाजी महाराज के नाम पर शुरू की गयी कर्ज़ माफ़ी योजना के ठीक से लागू न किए जाने के बारे में पूछने पर 'बलिराजा चेतना अभियान' और 'प्रेरणा प्रकल्प' नामक दो नई सरकारी योजनाओं का ज़िक्र करते हैं।

यह दो नई योजनाएं महाराष्ट्र सरकार ने किसान कल्याण को बढ़ाने और आत्महत्याओं को रोकने के लिए शुरू की है। 'यहां किसानों में डिस्ट्रेस तो है। यह तनाव कभी आर्थिक होता है, कभी सामाजिक तो कभी भावनात्मक। यहां के लोग बहुत भावुक भी हैं। मैं यहीं का रहने वाला हूँ इसलिए मैं जानता हूँ कि यहां लोग ज़रा ज़रा सी बातों को दिल पर ले लेते हैं। बाक़ी अगर परिवार बढ़ता रहे और ज़मीन उतनी ही रहे तो मुश्किल तो होगी ही।'

आगे न्यूनतम समर्थन मूल्य के किसानों तक न पहुँच पाने के सवाल पर उन्होंने कहा, 'किसी भी व्यापार की तरह खेती में भी अगर एक हज़ार का निवेश हो तो आदमी कम से कम 1100 रुपये कमाने की कोशिश करेगा। यह छोटा सा मुनाफ़ा भी आज किसानों को नहीं हो रहा। यह आत्महत्याओं के पीछे बड़ी वजह है। बाक़ी सरकार अपनी तरफ़ से सारे प्रयास कर रही है। कर्ज़ा माफ़ी और पानी के संचयन से लेकर किसानों की मानसिक स्थिति को सुधारने पर भी ध्यान दिया जा रहा है'।

ज़िला अधिकारी के दफ़्तर से कुछ ही दूरी पर हमारी मुलाक़ात 'प्रेरणा प्रकल्प' योजना के तहत किसानों की मानसिक स्थिति पर काम करने वाले मनोचिकित्सक सरफ़राज सौदागर से होती है। सरफ़राज बताते हैं कि इस योजना का मक़सद महराष्ट्र में बढ़ रही किसान आत्महत्याओं को रोकने के लिए मनोचिकित्सकीय हस्तक्षेप करने का है।

'बीते 2 सालों में हमने यवतमाल और ओसमनीयबाद- जो कि किसान आत्महत्या के मामले में हाई रिस्क जिले माने जाते हैं- यहां 3350 किसानों का इलाज किया है। इलाज ख़त्म होने के बाद किसी ने भी सुसाइड करने की कोशिश नहीं की। वरना आम तौर पर ऐसे मामलों में 'रीपीट अटेम्प्ट' का ख़तरा बहुत रहता है। हमारा काम डिप्रेशन का शिकार किसानों को ढूँढना और इलाज के ज़रिए उन्हें ज़िंदगी के प्रति फिर आशान्वित करना है'।

सरफ़राज अपना यह काम आशा और ट्रेन किए गए अपनी टीम के सदस्यों के साथ मिलकर करते हैं। लेकिन क़र्ज़ की परेशानी दूर करने का उनके पास भी कोई उपाय नहीं। 'हम उन्हें सुसाइड करने की बजाय संघर्ष करके क़र्ज़ माफ़ करवाने और वापस अपने पैरों पर खड़े होने के लिए तैयार करने की कोशिश करते हैं।'

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