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मिलिए अमित शाह के 'पीके' से

Last Updated: बुधवार, 15 मार्च 2017 (13:17 IST)
- नितिन श्रीवास्तव 
 
रात साढ़े आठ बजे टीवी पर 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' मिस हो जाए तो ये उसे रात 11 बजे हर हाल में देखते हैं। मतदान हो रहा हो या दौरे पर आए हों, ये लखनऊ के मशहूर शर्मा स्टॉल से समोसा और इलाइची वाली चाय का 'जुगाड़' करवाना नहीं भूलते हैं।
काम होता है तो सुबह टी-शर्ट और ट्रैक पैंट में ही भाजपा कार्यालय पहुँच जाना और फ़ुर्सत में फ़्राइडे को रिलीज़ हुई फिल्म को मल्टीप्लेक्स में ही देखना। 2017 के विधानसभा चुनाव में जब भाजपा की 312 सीटें आईं तब भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री लखनऊ में अपनी टीम को बधाई दे रहे थे। कुछ दिन पहले तक यही सुनील बंसल भाजपा के कुछ उम्मीदवारों को फ़ोन लगवा कह रहे थे, "पिछड़ रहे हो, तुम्हारी कैंपेन में और ताकत चाहिए। सब झोंक दो।"
 
'बैकरूम रणनीति'
इस फ़ीडबैक और बाद में बधाई की तैयारी कई साल पहले लखनऊ में एक अव्यवस्थित, सीलन वाले और खाली पड़े भाजपा मुख्यालय से शुरू हुई थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश में भाजपा की जीत में भारतीय जनता पार्टी की 'बैकरूम रणनीति' में सुनील बंसल की छाप हर जगह दिखी। राजस्थान के रहने वाले सुनील बंसल अपने छात्र दिनों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में सक्रिय रहे।
 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव के चलते ही शायद पिछले आम चुनाव के पहले राजस्थान के ही वरिष्ठ नेता ओम माथुर के साथ-साथ सुनील बंसल को यूपी का ज़िम्मा दिया गया था।
'विभाजित' भाजपा
उन दिनों अमित शाह राज्य प्रभारी बने थे और जिन लोगों को उन्होंने प्रदेश में बूथ-मैनेजमेंट का ज़िम्मा सौंपा उनमें सुनील बंसल प्रमुख थे। अमित शाह कुछ महीने लखनऊ में राणा प्रताप मार्ग की एक मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में रहे थे और सुनील बंसल भी बगल में रहते थे। आलू की चाट और नमकीन के शौक़ीन सुनील बंसल ने एक तरफ़ प्रदेश की 'विभाजित' भाजपा को जोड़ने की मुश्किल मुहिम शुरू की और दूसरी तरफ़ ग्रामीण क्षत्रों में भाजपा के बूथ प्रभारियों का चयन भी।
 
उनकी टीम के एक सदस्य बताते हैं कि '2017 की तैयारी में उन्होंने वही किया जो 2014 के पहले अमित शाह के कहने पर किया था। मतलब प्रत्याशियों के बारे में सर्वे से लेकर किस क्षेत्र में जातीय समीकरण कैसे बैठाने पड़ सकते हैं।" अमित शाह के समर्थन से बंसल ने बूथ स्तर से लेकर प्रदेश संगठन में ओबीसी, एमबीसी और दलित समुदायों में से कम से कम 1,000 नए कार्यकर्ताओं को नियुक्त किया।
 
इस पूरी प्रक्रिया में सुनील बंसल ने भाजपा कार्यालय में 'वॉर-रूम' का चलन भी कायम रखा जिसे उन लोगों ने 2014 के आम चुनावों में सफलतापूर्वक चलाया था। हर बूथ, हर विधान सभा क्षेत्र से रोज़ाना फ़ीडबैक लिया जाता रहा इस आईटी सेल में जहाँ 2017 में एक कॉल-सेंटर तक की स्थापना कर दी गई।
बंसल का रसूख : इस अभियान के पहले सुनील बंसल ने अमित शाह और केंद्रीय नेतृत्व की रज़ामंदी से प्रदेश में भाजपा सदस्यता बढ़ाने का ज़िम्मा संभाला था और चुनाव के पहले तक ये आंकड़ा दो करोड़ तक पहुँचता बताया गया।
 
अब तक प्रदेश भाजपा के बड़े नेताओं में भी सुनील बंसल का रसूख बढ़ता जा रहा था। साथ ही बढ़ते जा रहे थे इनकी टीम पर टिकट बंटवारे में 'भेद-भाव' के आरोप। लखनऊ भाजपा कार्यालय के एक पदाधिकारी ने कहा, "सुनील बंसल इस दौरान हम लोगों से यही दोहराते रहे कि जिताऊ कैंडिडेट ढूंढने हैं। नेतृत्व का भरोसा भी उन पर बना रहा।"
 
'कड़क' छवि
पार्टी इनके पीछे खड़ी रही और सुनील बंसल अपने नियुक्त किए गए लोगों के पीछे। अमित शाह भी सुनील बंसल की बात को गंभीरता से ही लेते हैं। यूपी चुनाव के कुछ महीने पहले एक सार्वजनिक 'टाउनहॉल' कार्यक्रम शुरू होने के कुछ देर पहले ही सुनील बंसल ने 'कड़क' छवि वाले अमित शाह को छात्राओं के सवालों के जवाब देने के लिए भी मना लिया था।
जानकर बताते हैं सुनील बंसल अपने संपर्क में रहने वाले हर कार्यकर्ता की सुध लेते हैं और मुसीबत के समय में साथ खड़े रहते हैं। ज़ाहिर है, तुलनाएं होनी स्वाभाविक हैं। अगर रणनीति के स्तर पर बात हो तो यूपी विधानसभा चुनाव के पहले प्रदेश में प्रशांत किशोर यानी 'पीके' का नाम सुर्ख़ियों में रहा।
 
एक ज़माने में नरेंद्र मोदी के कैम्पेन एडवाइज़र रहे 'पीके' ने पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की रणनीति बनाई थी। इसके तुरंत बाद कांग्रेस ने उन्हें यूपी के चुनाव का ज़िम्मा दे दिया था। हाल के चुनावों में सपा-कांग्रेस गठबंधन को मिली करारी शिकस्त से 'पीके' की साख पर भी बड़ा धक्का लगा है। दरअसल यूपी में बाज़ी 'पीके' नहीं 'एसबी' ने मारी है और वो भी दूसरी बार।
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