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सेक्स के प्रति बढ़ती अरुचि- आख़िर क्यों?

पुनः संशोधित शुक्रवार, 12 मई 2017 (11:18 IST)
- सिमोन कॉपलैंड (बीबीसी फ़्यूचर)
के लिहाज से मौजूदा समय मानव इतिहास का सबसे उन्मुक्त दौर कहा जा सकता है। बीते चार दशकों की तकनीक ने यौन संबंधों को उन्मुक्ता दी है, चाहे वो गर्भनिरोधक गोलियां हों या फिर ग्रिंडर और टिंडर जैसे डेटिंग ऐप। ये सब मिलकर यौन संबंधों को नया आसमान देते हैं।

इतना ही नहीं सामाजिक मान्यताओं के लिहाज से भी समलैंगिकता, तलाक़, शादी से पहले सेक्स संबंध, और एक साथ कई से जैसे चलन अब कहीं ज़्यादा स्वीकार किए जा रहे हैं।
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बावजूद इन सबके, शोध अध्ययन ये बताते हैं कि पिछले दशक की तुलना में दुनिया में लोग कम सेक्स कर रहे हैं। मार्च में, अमरीकी शोधकर्ता जीन त्वेंगे, रायन शेरमान और ब्रुक वेल्स का एक शोध अध्ययन आर्काइव्स ऑफ़ सेक्शुअल बिहेवियर में प्रकाशित हुआ था, जिसके मुताबिक़ 1990 के दशक की तुलना में 2010 के दशक में लोग हर साल नौ बार कम सेक्स कर रहे हैं, आंकड़ों के हिसाब से इसमें 15 फ़ीसदी की कमी देखी गई।
1990 के दशक में हर साल लोग 62 बार सेक्स कर रहे थे, जो 2010 के दशक में घटकर सालाना 53 बार रह गया था। ये गिरावट सभी धर्म, सभी नस्ल, सभी क्षेत्र, शिक्षित और अशिक्षित सभी तरह के लोगों में देखने को मिला था।

दुनिया भर में चलन : इस तरह का चलन दुनिया भर में देखने को मिला है। 2013 में, नेशनल सर्वे ऑफ़ सेक्शुअल एंड लाइफ़स्टाइल (नैटसाल) के मुताबिक 16 से 44 साल के लोग हर महीने पांच बार से कम बार सेक्स करने लगे थे।
2000 की तुलना ये कम था, तब हर महीने पुरुष 6.2 बार सेक्स किया करते थे, और महिलाएं 6.3 बार। 2014 में ऑस्ट्रेलियाई नेशनल सर्वे ऑफ़ सेक्शुअल एक्टिविटी के मुताबिक प्रति सप्ताह लोग 1.4 बार सेक्स संबंध बनाने लगे थे, जबकि 10 साल ये औसत 1.8 बार था। ये स्थिति जापान में और भी भयावह दिख रही है, जिसके मुताबिक 16 से 25 साल की उम्र की 46 फ़ीसदी महिलाएं और 25 फ़ीसदी पुरुष सेक्स संबंधों से घृणा करते हैं।

ऐसा क्यों हो रहा है?
इसकी कई वजहें मौजूद हैं, लेकिन बीबीसी फ़्यूचर ने इस स्थिति की वजहों को गंभीरता से टटोलने की कोशिश की है। सबसे आसान निष्कर्ष तो तकनीक का बढ़ता इस्तेमाल है। ख़ासकर दो तकनीक को घटते हुए सेक्स संबंधों की वजह बताया गया है- एक तो ऑन लाइन पोर्नोग्राफ़ी और दूसरा सोशल मीडिया।
होपलेस होने की स्थिति
ऑनलाइन पोर्नोग्राफ़ी के बढ़ते चलन से कई लोगों में इंटरनेट सेक्स एडिक्शन जैसी बीमारी भी देखने को मिल रही है। जब आप इस एडिक्शन की चपेट में आ जाते हैं तो माना जाता है कि पोर्न रियल लाइफ़ सेक्स की जगह ले लेता है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक पोर्न देखने वाले लोगों की सेक्स संबंध बनाने के प्रति अरुचि हो जाती है। 2011 में इटली में पोर्न देखने वाले 28 हज़ार लोगों पर एक सर्वे किया गया, जिसमें ज़्यादातर लोग अत्यधिक पोर्न देखने के आदी थे। शोधकर्ता कार्लो फ़ोरेस्टा के मुताबिक रोजाना पोर्न देखने वाले वीभत्स तरीके से सेक्स करना पसंद करने लगते हैं।
सर्वे के मुताबिक, पोर्न में दिखने वाले काल्पनिक तस्वीरों का ऐसा असर होता है कि वास्तविक तौर पर पुरुष बेडरूम में सेक्स संबंध के लिए तैयार ही नहीं हो पाता है, उनकी स्थिति होपलेस जैसी हो जाती है।

2014 में अमेरिका में माइकल मैलकॉल्म और जॉर्ज नाउफैल ने 18 से 35 साल के 1500 युवाओं पर सर्वे किया, इनसे इंटरनेट के बढ़ते इस्तेमाल और उनका रोमांटिक जीवन पर पड़ने वाले असर के बारे में पूछा गया।
ईस्टर्न इकॉनामिक जर्नल, में प्रकाशित इस अध्ययन में देखा गया कि जो लोग ज़्यादा देर तक इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, उनमें शादी करने की दर कम होती है। ये दर और भी कम हो जाती है जब पुरुष ऑनलाइन पोर्नोग्राफ़ी रोज देखने लगता है।

पोर्नोग्राफ़ी के अलावा सोशल मीडिया से लोग अपने बेडरूम में एक साथ वक्त नहीं बिता पाते हैं। सेक्स से ज्यादा लोग मोबाइल की स्क्रीन में दिलचस्पी लेने लगे हैं। यह उसी निष्कर्ष का विस्तार है जिसमें पहले कहा जाता रहा था कि टीवी के चलते लोग कम सेक्स कर रहे हैं।
सप्ताह में कितना सेक्स?
लेकिन इन दोनों निष्कर्षों पर सवालिया निशान लगाने की वजहें भी मौजूद हैं। पोर्नोग्राफ़ी के यौन संबंधों पर पड़ने वाले असर को लेकर विशेषज्ञ बंटे हुए हैं। कुछ विशेषज्ञ ये भी मानते हैं कि इंटरनेट सेक्स एडिक्शन से लोगों की सेक्स के प्रति दिलचस्पी बढ़ती है। 2015 में जर्नल सेक्शुअल मेडिसिन में प्रकाशित एक आलेख के मुताबिक़ एक सप्ताह में कम से कम दो बार 40 मिनट तक पोर्न देखने से लोगों में सेक्स करने की इच्छा प्रबल होती है।
ये अध्ययन 280 पुरुषों पर हुए एक सर्वे पर आधारित था। कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक प्रति सप्ताह दो घंटे तक पोर्न देखने से सेक्स करने की चाहत सबसे अधिक होती है। इस परिणाम को त्वेंगे, शेरमन और वेल्स ने भी अपने अध्ययन में शामिल किया है। लेकिन इन लोगों के मुताबिक पोर्न देखने से कुल मिलाकर सेक्स के प्रति लोगों की दिलचस्पी कम होती है।

यही सोशल मीडिया के बारे में भी कहा जा सकता है। ग्रिंडर और टिंडर जैसे ऐप से लोगों के सेक्स जीवन को गति भी मिलती है, इससे युवा सेक्स संबंध बनाने के फ़ैसले तक जल्दी पहुंचते हैं। तकनीक का आम लोगों के सेक्शुअल जीवन पर असर ज़रूर पड़ता है, लेकिन केवल इसी वजह से लोगों का सेक्स जीवन प्रभावित होता हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता।
इसके अलावा काम के दबाव का भी लोगों के बेडरूम पर असर पड़ने वाला है। पश्चिमी दुनिया में, औसतन पूर्णकालिक कर्मचारी को अमेरिका में प्रति सप्ताह 47 घंटे काम करना पड़ता है। इसकी थकान और तनाव से भी लोगों को सेक्स जीवन प्रभावित हो रहा है। लेकिन ये इतना आसान भी नहीं है। 1998 में, जेनेट हायड, जॉन डिलामेटर और इरी हेविएट ने अपने रिसर्च में बताया था कि काम के दबाव से महिलाओं में सेक्स करने की इच्छा में कोई असर नहीं होता है।
काम का दबाव तो नहीं
ये अध्ययन जर्नल ऑफ़ फैमिली साइकोलॉजी में प्रकाशित हुआ था, इसके मुताबिक घरेलू महिला और कामकाजी महिलाओं में सेक्स करने की इच्छा में कोई बदलाव नहीं होता। हालांकि ये त्वेंगे, शेरमन और वेल्स के अध्ययन से ठीक उलट है, क्योंकि नए अध्ययन के मुताबिक व्यस्त कामकाजी जीवन से सेक्स लाइफ़ प्रभावित होता है।

काम का असर सेक्स लाइफ़ पर होता है, लेकिन ये काम की गुणवत्ता पर निर्भर होता है। ख़राब नौकरी की वजह दिमाग पर असर पड़ता है और उसका असर सेक्स लाइफ़ पर भी होता है। सेक्स लाइफ़ कम होने की मूल वजह में तनाव का होना शामिल है।
यूनिवर्सिटी ऑफ़ ज्यूरिख़ के गाय बोडेमेन ने 2010 में एक सौ तीन छात्राओं पर तीन महीने तक अध्ययन किया। इस अध्ययन के मुताबिक तनाव की वजह से सेक्स के प्रति कम रुचि देखने को मिली। तनाव से हारमोन का स्तर गड़बड़ता है, ड्रग्स और शराब का इस्तेमाल बढ़ जाता है और इन सबका असर सेक्स संबंधों पर भी पड़ता है।

पिछले कुछ दशक में पश्चिमी दुनिया में लोगों में अवसाद भी देखने को मिला है। अवसाद के चलते भी लोगों की सेक्स में दिलचस्पी घटती है। इस तरह का अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडिलेड में इवान एटलांटिस और थॉमस सुलिवेन ने किया है, जो जर्नल ऑफ़ सेक्सुअल मेडिसीन में प्रकाशित हुआ है। हालांकि त्वांगे, शेरमन और वेल्स के मुताबिक भी प्रसन्नता कम होने से सेक्स संबंधों में कमी आ जाती है।
जेन त्वेंगे के मुताबिक आज की मौजूदा युवा पीढ़ी, नौकरी की असुरक्षा, अपना घर बनाने की मुश्किल, जलवायु परिवर्तन और सांप्रादायिकता के ख़तरों के बीच रह रही है और इन सबका असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।

बिगड़ती सेक्स लाइफ़ : सेक्स लाइफ़ में कमी की वजहों को तलाशा जा सकता है, लेकिन तमाम निष्कर्षों से यही संकेत मिलता है कि आधुनिक जीवन शैली के तनाव- काम का तनाव, असुरक्षा का बोध और तकनीक का असर ये सब मिलकर लोगों की सेक्स लाइफ़ को बिगाड़ रहे हैं।
कुछ लोग इस गिरावट पर ख़ुश हो सकते हैं लेकिन हमें इसका ख़्याल रखना चाहिए कि सेक्स बहुत महत्वपूर्ण है। इससे प्रसन्नता बढ़ती है, आपका स्वास्थ्य बेहतर होता है। आप अपने कामकाजी दुनिया में भी संतुष्ट होते हैं। कुछ मिलाकर सेक्स मजेदार फन है।

यही वजह है कि दुनिया भर में लोग इस मुद्दे से पार पाने का उपाय तलाश रहे हैं। स्वीडन में ओवरटोरनिया के काउंसिलमैन पेर-इरिक मुस्कोस ने इसी साल फरवरी में नगर निगम के 550 कर्मचारियों को प्रति सप्ताह एक घंटे कम काम करने को कहा और ये भी कहा कि घर जाकर इस समय का इस्तेमाल सेक्स संबंध के लिए कीजिए।
मुस्कोस ये भी कहते हैं कि उनका उद्देश्य यही है कि कपल्स एक दूसरे को समय दें। चूंकि ये समस्या मल्टी डायमेंशनल है लिहाजा इसके उपाय भी मल्टी डायमेंशनल ही होंगे। यही वजह है कि पश्चिमी दुनिया में नौकरी और घर की सुरक्षा बढ़ाने, जलवायु परिवर्तन के ख़तरे और सांप्रदायिकता को कम से कम किए जाने पर विचार विमर्श हो रहा है। इससे लोगों का सेक्स जीवन तो बेहतर होगा ही साथ ही उनका स्वास्थ्य भी बेहतर होगा।
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