पाकिस्तान में निशाने पर क्यों हैं ईसाई, ईसाई से पहले क्या थे ये

Last Updated: गुरुवार, 1 नवंबर 2018 (11:54 IST)
सांकेतिक चित्र
हाल के सालों में अन्य अल्पसंख्यकों की तरह ही में ईसाइयों पर भी हमले बढ़े हैं। ईसाइयों के रिहायशी इलाक़ों और धर्मस्थलों पर हुए अधिकतर हमलों की वजह देश का विवादस्पद ईशनिंदा क़ानून ही है। लेकिन इन हमलों की अन्य राजनीतिक वजहें भी रही हैं। बीबीसी संवाददाता इलियास ख़ान बता रहे हैं पाकिस्तान के और उसके मुद्दों के बारे में।

पाकिस्तान में कितने ईसाई हैं?
पाकिस्तान एक मुस्लिम बहुल देश है, जहां हिंदू सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी हैं। यहां की कुल जनसंख्या में क़रीब 1.6 प्रतिशत हिंदू हैं। लेकिन दक्षिणी तटीय शहर कराची, लाहौर और फ़ैसलाबाद शहरों में ईसाइयों की भी अच्छी-ख़ासी आबादी है।


पंजाब प्रांत में भी ईसाइयों के गांव ठीक-ठाक तादाद में हैं। यही नहीं रूढ़ीवादी माने जाने वाले देश के उत्तर-पश्चिमी प्रांत ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के पेशावर शहर में भी ईसाई समुदाय के लोग रहते हैं।

भारत के बंटवारे से पहले आज का पाकिस्तान विविध संस्कृतियों और धर्मों वाला इलाक़ा था। लेकिन हाल के दशकों में पाकिस्तान का इस्लामीकरण हुआ है और समाज भी अधिक इस्लामिक हुआ है। इससे देश में असहिष्णुता भी बढ़ी है। कभी पाकिस्तान के शहरों में अल्पसंख्यकों की तादाद 15 फ़ीसदी तक थी। अब ये घटकर चार फ़ीसदी ही रह गई है।


क्या पाकिस्तान में ईसाइयों का कोई प्रभाव है?
पाकिस्तान के अधिकतर ईसाई दलित हिंदू थे, जिन्होंने ब्रितानी शासनकाल के दौरान अपनाया। इसकी एक वजह जाति-व्यवस्था भी थी। इनमें से बहुत से सेना के कैंट वाले शहरों में मज़दूरी किया करते थे। आज भी पाकिस्तान के हर कैंट शहर में एक लाल कुर्ती नाम का इलाक़ा होता है। इसी में ईसाई रहते हैं।

लेकिन आज भी ईसाई पाकिस्तान का सबसे ग़रीब समुदाय है और ये आज भी छोटे-मोटे काम ही करते हैं। पंजाब में बहुत से ऐसे गांव हैं जिनकी पूरी आबादी ईसाई है। ये लोग मज़दूरी करते हैं या ज़मीदारों के खेतों में काम करते हैं। हालांकि ईसाई समुदाय में भी एक प्रभावशाली तबका है। ये अच्छे पढ़े-लिखे लोग अधिकतर कराची में रहते हैं। ये ब्रितानी राज के दौरान गोवा से आकर यहां बसे थे।


हालांकि अमीर ईसाई हों या ग़रीब ईसाई, लेकिन सबके बीच एक बेचारगी का माहौल तो है ही। इसी वजह से पाकिस्तान के अमीर ईसाई देश छोड़कर जा रहे हैं। ये कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बस रहे हैं। देश में ईसाइयों के प्रति असहिष्णुता का माहौल उनकी बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा है।

क्यों हो रहे हैं ईसाइयों पर हमले?
पाकिस्तान में यूं तो आमतौर पर मुसलमान और ईसाई मिल जुलकर रहते हैं, लेकिन ईशनिंदा के आरोपों की वजह से अक्सर ईसाइयों पर उन्मादी मुसलमानों की भीड़ के हमले होते रहे हैं। यही नहीं इस्लामी चरमपंथ के निशाने पर भी ईसाई समुदाय रहा है।


हाल ही में ये बड़े हमले ईसाइयों पर हुए हैं-
*दिसंबर 2017 में क्वेटा के एक चर्च पर हुए हमले में नौ लोग मारे गए और 57 घायल हुए।
*मार्च 2016 में लाहौर के एक पार्क में ईस्टर मना रहे ईसाइयों पर हुए हमले में 70 लोग मारे गए और 340 से ज़्यादा घायल हुए।
*मार्च 2015 में लाहौर के चर्चों में हुए दो बम धमाकों में 14 लोग मारे गए और 70 से अधिक घायल हुए।
*2013 में पेशावर के चर्च में हुए दो बम धमाकों में कम से कम 80 लोग मारे गए थे।
*2009 में पंजाब के गोजरा क़स्बे में भीड़ ने ईसाइयों के घरों पर हमला किया। 40 से घर जला दिए गए और नौ लोग मारे गए।

2005 में उन्मादी भीड़ ने फ़ैसलाबाद में चर्चों, स्कूलों और ईसाइयों के घरों को निशाना बनाया। एक ईसाई पर क़ुरान के पन्ने फ़ाडने के आरोपों के बाद ये हिंसा हुई थी। 1990 के दशक के बाद से कई ईसाइयों पर ईशनिंदा क़ानून के तहत मुक़दमा चला है और उन्हें क़ुरान का अपमान करने या पैग़ंबर मोहम्मद की शान में ग़ुस्ताख़ी करने का दोषी पाया गया है।



हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से अधिकतर मामले निजी दुश्मनी की वजह से दायर कराए गए थे। स्थानीय अदालतों ने अधिकतर मामलों में दोषी क़रार दिए गए लोगों को मौत की सज़ा सुनाई थी। लेकिन सबूतों के अभाव में उच्च अदालतों में ये सज़ाएं रद्द कर दी गईं। कई शिकायतों में ये पाया गया कि आर्थिक फ़ायदा उठाने के लिए ईसाई समुदाय को निशाना बनाया गया था।

साल 2012 में रिमशा मसीह नाम की एक लड़की ईशनिंदा मामले में बरी हुई पहली ईसाई अभियुक्त बनी थी। अदालत में ये साबित हुआ कि उसे एक स्थानीय मुस्लिम धर्मगुरु ने झूठा फँसाया था।


सबसे चर्चित मामला आसिया बीबी का है। पंजाब के एक छोटे से गांव की रहने वाली इस लड़की की साल 2010 में अपनी पड़ोसी महिलाओं से नोकझोंक हुई थी। बाद में उस पर ईशनिंदा के आरोप लगा दिए गए थे। पंजाब के तत्कालीन गवर्नर सलमान तासीर ने इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि पाकिस्तान के बेहद सख़्त ईशनिंदा क़ानून का ग़लत इस्तेमाल किया जा रहा है।

बाद में मुमताज़ क़ादरी नाम के उनके इस्लामवादी सुरक्षा गार्ड ने ही उनकी हत्या कर दी थी। क़ादरी को तासीर की हत्या का दोषी पाया गया और फ़रवरी 2016 में मौत की सज़ा दे दी गई। इस सज़ा के ख़िलाफ़ पाकिस्तान में व्यापक प्रदर्शन हुए थे।


ईशनिंदा क़ानून का विरोध करने पर पाकिस्तान के तत्कालीन अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री और ईसाई समुदाय से जुड़े शाहबाज़ भट्टी की साल 2011 में तालिबान ने हत्या कर दी थी। ईसाइयों के ख़िलाफ़ हुई कुछ हिंसक वारदातों का सीधा संबंध अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के नेतृत्व में चल रहे युद्ध से है। इन घटनाओं की वजह राजनीतिक ही थीं।

क्या कोई और कारण भी हैं?
2001 में अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन के अफ़ग़ानिस्तान पर हमला करने के बाद तक्षशिला शहर में एक गिरजाघर को निशाना बनाकर किए गए बम धमाके में चार लोग मारे गए थे।


इसके कुछ ही महीने बाद एक ग़ैर सरकारी संगठन के कराची स्थित दफ़्तर पर किए गए हमले में छह ईसाई कर्मचारियों को मार दिया गया था। अगले सालों में भी इस तरह की घटनाएं रह-रहकर होती रहीं।

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं और ईसाइयों पर योजनाबद्ध हमलों का एक कारण पश्चिमी देशों की सरकारों को राजनीतिक संदेश देना भी हो सकता है। इसकी वजह देश की चुनी हुई सरकार को शर्मिंदा करना भी हो सकता है। इन हमलों के पीछे देश की बेहद ताक़तवर सेना भी हो सकती है, जिस पर देश के कट्टरपंथी धर्मगुरुओं और लड़ाकों को बचाने के आरोप लगते रहे हैं।


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