आयुर्वेद हमेशा आगे रहेगा

धन्वंतरि जयंती पर विशेष रिपोर्ट

आयुर्वेद
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भारत में की प्राचीन यशस्वी परंपरा रही हैं। भारत की कई बड़ी कंपनियाँ इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहीं हैं। इस श्रृंखला में और दो प्रमुख नाम हैं। धन्वंतरि जयंती पर आयुर्वेद की महत्ता प्रतिपादित करते हुए प्रस्तुत है इन कंपनियों की जानकारी देती यह विशेष रिपोर्ट:

वैद्यनाथ आयुर्वेद देशी दवा की वह कंपनी है जो अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई की अग्नि से तपते हुए निकली है। उस लड़ाई में वैद्यनाथ ने 'अंग्रेजी दवाई भारत छोड़ो' की आहुति दी थी। वैद्यनाथ आयुर्वेद के अध्यक्ष व प्रबंधन विशेषज्ञ अजय शर्मा कहते हैं, 'हमारी वह लड़ाई अभी तक जारी है। यही वजह है कि आज अगर आयुर्वेद की कोई कंपनी इस पद्धति का पर्याय बनी हुई है तो वह वैद्यनाथ है।'

1942 में भारत छो़ड़ो आंदोलन के समय वैद्यनाथ ने एक नारा दिया था - 'देश की मिट्टी, देश की हवा, देश का पानी, देश की दवा।' अंग्रेजी हुकूमत व दवा के खिलाफ जो लड़ाई तब शुरू हुई वह अभी खत्म नहीं हुई है। अंततः दुनिया मानेगी कि आयुर्वेद ही मानव का कल्याण करने में सक्षम है।

वैद्यनाथ आज भी सिद्धांतों पर अटल है। हमने कभी अपनी दवा को ब्रांड नहीं बनाया। कई पड़ाव आए लेकिन वैद्यनाथ आयुर्वेद की मूल विशेषता में कोई घालमेल नहीं होने दिया गया।' वैद्यनाथ अभी पूरी दुनिया में फैला है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका में इस कंपनी के 33 डीलर हैं। वहाँ डलास में वैद्यनाथ का मुख्यालय है।

यह कंपनी यूरोपीय देश इटली, जर्मनी व बेल्जियम आदि में भी निर्यात कर रही है। लंदन से केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर लौटे अपने पिता रामावतार शर्मा से जब उनके बेटे अजय शर्मा ने कमान संभाली तो इसके प्रचार-प्रसार को पंख लग गए। वे कहते हैं- 'इस कंपनी के च्यवनप्राश, दशमूलारिष्ट, महानारायण तेल, चंद्र प्रभावटी, महायोगराज गूगल आदि दवाओं की एक खास विश्वसनीयता है। वैद्यनाथ की खास दवाएँ, कासामृत, बीटा एक्स, कब्जहर तो लोगों की जुबान पर है।'

वर्ष 1918 मे स्थापित यह कंपनी अभी 700 आयुर्वेदिक उत्पादों का निर्माता बन गई है। इसके पास अत्याधुनिक फैक्टरियाँ हैं और वहाँ पूरी तरह वैज्ञानिक पद्धतियों से काम होता है। दवा की गुणवत्ता ही इस कंपनी की पहचान है। कंपनी के पास भारत सरकार द्वारा स्वीकृत शोध केंद्र है जहाँ योग्य वैज्ञानिकों की टीम है। आयुर्वेद में वैद्यनाथ की विश्वसनीयता का यह पैमाना है कि यहाँ से आयुर्वेद पर छपने वाली पुस्तक आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों के पाठ्यक्रम में शामिल की जाती हैं।

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इसके 'आयुर्वेदिक सार संग्रह' में आयुर्वेदिक उत्पादों की सारी विधियाँ संकलित हैं। यह भारत सरकार द्वारा स्वीकृत फर्माकोपिया (दवा फॉरमुलेशन का संकलन) का हिस्सा है। पूरे देश में वैद्यनाथ आयुर्वेद के कॉलेज, अस्पताल व डिस्पेंसरियाँ हैं। अजय शर्मा कहते हैं- 'वैद्यनाथ की पुर्णाहुति तब होगी जब आम लोगों की अंग्रेजी दवाओं पर निर्भरता से मुक्ति मिल जाएगी। भारतीय चिकित्साशास्त्र की यह पद्धति सभी चुनौतियों का हल करने में सच में सक्षम है।

नहीं थमेगी डाबर की उड़ा
आयुर्वेद की बात करें और डाबर इंडिया का नाम न लें तो ऐसा ही लगेगा जैसे हम अभी क्रिकेट की बात धोनी के बगैर कर रहे हैं। धोनी अगर अभी नंबर वन ब्रांड बन गए हैं तो आयुर्वेद के क्षेत्र में डाबर इंडिया का भी यही स्थान है। धोनी आज डाबर च्यवनप्राश का प्रचार जरूर कर रहे हैं लेकिन डाबर को अपने क्षेत्र में अव्वल होने का खिताब उनसे बहुत पहले मिल चुका है।

धोनी ही क्यों, बिग बी तक डाबर के प्रचार की कमान संभाल चुके हैं पर डाबर की विश्वसनीयता इन सितारों के बिना भी उतनी ही है। जाहिर है, सीरीफोर्ट में 7 अक्टूबर को ऑल इंडिया आयुर्वेद कांग्रेस के दौरान लगी प्रदर्शनी में इसी कंपनी ने ब्रांड के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज की। कंपनी को इस मुकाम तक पहुँचाने में कंपनी के उपाध्यक्ष अमित बर्मन की बड़ी भूमिका रही है।

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से एमबीए की डिग्री हासिल कर डाबर इंडिया लिमिटेड की कमान संभालने वाले कंपनी के उपाध्यक्ष अमित बर्मन एक पायलट भी हैं। उन्हें हवा में उड़ना बहुत अच्छा लगता है। अगर यह कहें कि अमित बर्मन की उड़ने की इसी ललक ने डाबर इंडिया लिमिटेड को आयुर्वेद की बुलंदियों पर पहुँचा दिया है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कहते हैं अमित बर्मन कंपनी के 'पायलट' हैं तो इसकी उड़ने की सीमा आकाश ही है। कोलकाता के बर्मन परिवार की कंपनी डाबर इंडिया लिमिटेड ने अब पूरी दुनिया में अपना परचम लहरा दिया है। आयुर्वेदिक व प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में 125 साल की हो गई इस कंपनी का अब कोई सानी नहीं है।

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डाबर इंडिया के 250 से अधिक उत्पादों की बाजार में तूती बोल रही है। दवाई से लेकर फूड तक में हर जगह डाबर मौजूद दिखता है। डाबर के उत्पाद पूरी दुनिया के 60 से अधिक देशों में उपलब्ध हैं। सिर्फ विदेश में ही इसका कारोबार 500 करोड़ रुपए का है।

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धनंज
1884 में बर्मन परिवार ने जब एक छोटी आयुर्वेदिक दवा कंपनी के रूप में शुरुआत की थी तो 125 साल बाद यह नंबर वन कंपनी बन जाएगी किसी ने सोचा नहीं होगा। आज वह देश का हर्बल और नेचुरल प्रॉडक्ट की सबसे बड़ी पेशेवर कंपनी बन गई है।

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