क्यों नहीं मिलता है दाम्पत्य-सुख, जानिए 10 ज्योतिषीय कारण

Author पं. हेमन्त रिछारिया|
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हमारे षोडष संस्कारों में एक अति-महत्त्वपूर्ण संस्कार है वहीं सुखद व ईश्वरीय वरदान के सदृश है। लेकिन प्रारब्ध कर्मानुसार व्यक्ति की जन्मपत्रिका में कुछ ऐसी ग्रहस्थितियां निर्मित हो जाती हैं जिसके फलस्वरूप वह दाम्पत्य सुख से वंचित हो जाता है। अत्यन्त कष्टप्रद व नारकीय जीवन के समान होता है। आइए जानते हैं कि किन योगों के कारण व्यक्ति दाम्पत्य सुख से वंचित होता है।
 
जन्मपत्रिका में का विचार व सप्तमेश से किया जाता है। इसके अतिरिक्त शुक्र भी दाम्पत्य-सुख का प्रबल कारक होता है क्योंकि शुक्र भोग-विलास व शैय्या सुख का प्रतिनिधि है। 
 
पुरुष की जन्मपत्रिका में शुक्र पत्नी का एवं स्त्री की जन्मपत्रिका में गुरु पति का कारक माना गया है। जन्मपत्रिका का द्वादश भाव शैय्या सुख का भाव होता है। अत: इन दाम्पत्य सुख प्रदाता कारकों पर यदि पाप ग्रहों, क्रूर ग्रहों व अलगाववादी ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति आजीवन दाम्पत्य सुख को तरसता रहता है। सूर्य,शनि,राहु अलगाववादी स्वभाव वाले ग्रह हैं वहीं मंगल व केतु मारणात्मक स्वभाव वाले ग्रह। ये सभी दाम्पत्य-सुख के लिए हानिकारक होते हैं।
1 . यदि सप्तम भाव पर राहु,शनि व सूर्य की दृष्टि हो एवं सप्तमेश अशुभ स्थानों में हो एवं शुक्र पीड़ित व निर्बल हो तो व्यक्ति को दाम्पत्य-सुख नहीं मिलता।
 
2. यदि सूर्य-शुक्र की युति हो व सप्तमेश निर्बल व पीड़ित हो एवं सप्तम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति को दाम्पत्य सुख प्राप्त नहीं होता।
 
3. यदि सप्तम भाव में मकर या कुंभ राशि स्थित हो, सप्तमेश सूर्य,शनि व राहु के साथ हो एवं शुक्र पीड़ित व निर्बल हो तो व्यक्ति को दाम्पत्य सुख नहीं मिलता।
 
4. यदि सप्तमेश निर्बल व पीड़ित हो एवं सप्तम भाव पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो व्यक्ति को दाम्पत्य सुख प्राप्त नहीं होता।
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