पहचान बना पचराही

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छत्तीसगढ़ में को लेकर अब तक जितना काम हुआ है, उसमें पचराही अव्वल है। यहां का शिल्प सैलानियों के आकर्षण का केंद्र है।

फरवरी, 2008 में पुरातत्व विभाग के उपसचिव एस.एस. यादव के निर्देशन में यहां उत्खनन शुरू हुआ। तब से लेकर अब तक यहां 50 से अधिक स्वर्ण, ताम्र और रजत की मुद्राएँ मिल चुकी हैं, जो उस काल के राजाओं की सोच, उनकी व्यापारिक गतिविधियों को बयाँ करती हैं।

खुदाई के दौरान निकले अवशेषों का हवाला देते हुए एस.एस. यादव बताते हैं, 'अब तक मिले अवशेषों के आधार पर सोमवंशी राजाओं ने पचराही में सबसे पहले शासन किया। उनका कार्यकाल 7-8 वीं शताब्दी था। इसके बाद कल्चुरी राजाओं ने 10-11 वीं शताब्दी और फणिनागवंशियों ने 12-13 वीं शताब्दी तक यहां राज किया।' यहां से निकले अवशेष के मुताबिक कुछ मुस्लिम शासकों का प्रभाव भी इस इलाके में था।

अवशेषों के अध्ययन से पता चलता है कि फणिनागवंशी राजा सुरक्षा को लेकर बेहद सचेत थे। उनका दरबार चार मोटी सुरक्षा दीवारों के बीच लगता था। इसमें बाहरी दीवार पत्थर की तथा अंदर की तीन दीवारें ईंटों से निर्मित थीं। पचराही पुरातत्वविदों के मुताबिक इस वंश के राजाओं को उत्तर में परमार वंश और पूर्व में गंग वंश से ज्यादा खतरा था। यहाँ जो दीवारें मिली हैं, उनकी ऊँचाई 12 तथा चौड़ाई 8 फुट है। चारों दीवारों के बीच करीब दो फुट का फासला है जहां चौबीसों घंटे चौकीदारों का पहरा होता था। चारों दीवारों को पार करने के बाद बीच में राजा का दरबार लगता था।

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- से भुनेश्वर कश्यप

छत्तीसग़ढ़ राज्य बनने के पहले शायद ही किसी ने सोचा होगा कि जिले का एक छोटा-सा इलाका पचराही पुरातात्विक विशेषताओं को लेकर राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभर आएगा। कल्चुरी राजाओं के इतिहास का गवाह यह इलाका देश के खास उत्खनन केंद्रों में गिना जाने लगा है।

इस वंश के राजा चामुंडा देवी की पूजा करते थे। खुदाई में चार सेंटीमीटर की निकली इस देवी की मूर्ति इस बात का प्रमाण है। बताते हैं कि फणिनागवंशी राजा यात्रा के दौरान देवी की मूर्ति अपने साथ ले जाया करते थे, ताकि किसी प्रकार की विपदा न आए। मूर्ति में गजब की कलाकारी दर्शाई गई है। इसमें देवी के १० हाथ हैं। सभी हाथों में अस्त्र-शस्त्र हैं। कलाकार ने बड़ी ही सूक्ष्मता से इस मूर्ति‍ पर काम कि‍या है।


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