फिर बिखरे भगोरिया के रंग

Praveen BarnaleND
लो फागुन आयो रे...रंग-गुलाल लायो रे। टेसू के अंगारों से दहकते फूलों और रंग-गुलाल के बीच मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है भगोरिया।

भगोरिया के समय धार, झाबुआ, खरगोन आदि क्षेत्रों के हाट-बाजार मेले का रूप ले लेते हैं और हर तरफ बिखरा नजर आता है फागुन और प्यार का रंग।

लाल-गुलाबी, हरे-पीले रंग के फेटे, कानों में चाँदी की लड़ें, कलाइयों और कमर में कंदोरे, आँखों पर काला चश्मा और पैरों में चाँदी पहने लड़के, जामुनी, कत्थई, काले, नीले, नारंगी आदि चटख-शोख रंग में भिलोंडी लहँगे और ओढ़नी पहने, सिर से पाँव तक चाँदी के गहनों से सजी शोख महिलाएँ... मांदल की थाप और ठेठ आदिवासी गीतों पर थिरकते कदम, गुड़ की जलेबी और बिजली से चलने वाले झूलों से लेकर लकड़ी के हिंडोले तक दूर-दूर तक बिखरी शोखी पहचान है भगोरिया की।

भगोरिया के हाट-बाजार में आदिवासी नवयुवक-युवतियाँ अपने लिए जिंदगी का एक नया रंग ढूँढते नजर आते हैं। जी हाँ, भगोरिया का शाब्दिक अर्थ ही होता है भाग कर शादी करना। इसलिए इस हाट में लड़के-लड़कियाँ मांदल की थाप पर थिरकते हुए अपने लिए जीवनसाथी चुन लेते हैं।
  लो फागुन आयो रे...रंग-गुलाल लायो रे। टेसू के अंगारों से दहकते फूलों और रंग-गुलाल के बीच मध्यप्रदेश के मालवा के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है भगोरिया। भगोरिया के समय धार, झाबुआ, खरगोन आदि क्षेत्रों के हाट-बाजार मेले का रूप ले लेते है      


भगोरिया का इतिहास- भगोरिया कब औऱ क्यों शुरू हुआ। इस बारे में लोगों में एकमत नहीं है। भगोरिया पर लिखी कुछ किताबों के अनुसार भगोरिया राजा भोज के समय लगने वाले हाटों को कहा जाता था। इस समय दो भील राजाओं कासूमार औऱ बालून ने अपनी राजधानी भागोर में विशाल मेले औऱ हाट का आयोजन करना शुरू किया। धीरे-धीरे आस-पास के भील राजाओं ने भी इन्हीं का अनुसरण करना शुरू किया जिससे हाट और मेलों को भगोरिया कहना शुरू हुआ। वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों का मानना है क्योंकि इन मेलों में युवक-युवतियाँ अपनी मर्जी से भागकर शादी करते हैं इसलिए इसे भगोरिया कहा जाता है।

नेह स्नेह और जीवन का बंधन- भगोरिया प्राचीन समय में होने वाले स्वयंवर का भीली स्वरूप है। भगोरिया हाट-बाजारों में युवक-युवती बेहद सजधज कर अपने भावी जीवनसाथी को ढूँढने आते हैं। इनमें आपसी रजामंदी जाहिर करने का तरीका भी बेहद निराला होता है। सबसे पहले लड़का लड़की को पान खाने के लिए देता है। यदि लड़की पान खा ले तो हाँ समझी जाती है...फिर क्या लड़का लड़की को लेकर भगोरिया हाट से भाग जाता है और दोनों शादी कर लेते हैं। पहले इस रस्म को निभाने में काफी खून-खराबा होता था लेकिन अब प्रशासन की चुस्त व्यवस्था से पिछले कुछ सालों में कोई भी अप्रिय घटना नहीं हुई।

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इसी तरह यदि लड़का लड़की के गाल पर गुलाबी रंग लगा दे और जवाब में लड़की भी लड़के के गाल पर गुलाबी रंग मल दे तो भी रिश्ता तय माना जाता है। इसी तरह कुछ जनजातियों में चोली और तीर बदलने का रिवाज है। वर पक्ष लड़की को चोली भेजता है। यदि लड़की चोली स्वीकार कर बदले में तीर भेज दे तब भी रिश्ता तय माना जाता है। इस तरह भगोरिया भीलों के लिए विवाह बंधन में बँधने का अनूठा त्योहार भी है

इसके साथ ही भगोरिया हाट भीलों की जीवन रेखा भी है। कहते हैं भील सालभर मजदूरी करते हैं और भगोरिया में अपना जमा धन लुटाते हैं। यहाँ से ही वे अनाज और अन्य सौदा लेते हैं और यहीं गीत-संगीत और नृत्य में शामिल हो मनोरंजन करते हैं

भगोरिया और आधुनिकता- भगोरिया हाटों में अब परंपरा की जगह आधुनिकता हावी होती दिखाई देने लगी है। चाँदी के गहनों के साथ-साथ अब मोबाइल चमकाते भील जगह-जगह दिखने लगे हैं। ताड़ी और महुए की शराब की जगह अंग्रेजी शराब का सुरूर भीलों के सिर चढ़कर बोलने लगा है। वहीं छाछ-नींबू पानी की जगह कोला पसंद किया जा रहा है। आदिवासी युवक नृत्य करते समय काले चश्मे लगाना पसंद कर रहे हैं वहीं युवतियाँ भी आधुनिकता के रंग में रंगती जा रही हैं

पढ़े-लिखे युवक-युवतियाँ अब भगोरिया उत्सव में शामिल नहीं होना चाहते। वहीं अब वे केवल एक उत्सव के समय अपने जीवनसाथी को चुनने से परहेज भी कर रहे हैं। भगोरिया के दौरान होने वाली शादियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।

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इसे देख भील बड़े-बुजुर्ग काफी चिंतित हैं। उन सभी को चिंता है कि कहीं आधुनिकता के बढ़ते रंग में उनकी अनूठी परंपरा खत्म न हो जाए।


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