मन के उत्सवी रंग सजाती रंगोली

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भारतीय जीवनशैली में रंगों का विशेष महत्व है। रंगों के बिना हमारा जीवन सूना लगता है। मनुष्य में सौंदर्य के प्रति असीम एवं अद्भुत आकर्षण होता है। यूँ तो हमारे देश में पूरे वर्ष कोई न कोई उत्सव-त्योहार चलते रहते हैं। प्रत्येक त्योहार भी रंगों के आधार पर ही अवधारित है। होली, दशहरा, दीपावली या शक्ति की उपासना का पर्व नवरात्रि हो, सब में रंगों का महत्व है। यूँ तो सभी पर्वों का आधार पृथक है और उनको मनाने के कारण व ढंग भी अलग-अलग हैं।

लेकिन उन सब में एक बात तो सामान्य है, वह है इन त्योहारों पर रंगोली बनाने की प्रथा। अक्सर हम घर-आँगन में या चौबारे पर, तुलसी के क्यारे के आसपास महिलाओं, बच्चियों को रंगोली बनाते देख सकते हैं। सबसे पहले रंगोली वाली जगह (आँगन/ फर्श) को गोबर या मिट्टी से लीपकर इस पर बनाई जाने वाली रचना के लिए सर्वप्रथम बिंदियाँ सीधी व आड़ी लगाई जाती हैं, जिन्हें आपस में मिलाकर-जोड़कर एक सुंदर-सी आकृति का रूप दिया जाता है। बाद में इनमें आकर्षक रंगों का उपयोग कर सुंदर रंगोली का सृजन किया जाता है। रंगोली एक प्राचीन कला है, जिसे गुजरात, महाराष्ट्र में रंगोली, राजस्थान में मांडणा, उत्तरप्रदेश में चौक एवं अन्य प्रांतों में अलग-अलग नामों से पुकारा व पहचाना जाता है।

रंगोली पहले से ही धार्मिक, सांस्कृतिक आस्थाओं की प्रतीक रही है। त्योहारों के अतिरिक्त घर-परिवार में अन्य कोई मांगलिक अवसरों पर या यूँ कहें कि रंगोली सजाने की कला अब सिर्फ पूजागृह तक सीमित नहीं रह गई है। स्त्रियाँ बड़े शौक एवं उत्साह से घर के हर कमरे में तथा प्रवेश द्वार पर रंगोली बनाती हैं। यह शौक स्वयं उनकी कल्पना का आधार तो है ही, नित-नवीन सृजन करने की भावना का प्रतीक भी है। सुंदर रंगमय रंगोली से सजा घर जहाँ आपकी कला-सुरुचि का परिचय कराता है, वहीं घर आए मेहमानों का भी मन मोह लेता है। बेल-बूटे, फूल-पत्तियों के साथ ही विश्वास के द्योतक मांगलिक चिह्न विभिन्न रंगों से सजीव हो उठते हैं।

रंगोली में बनाए जाने वाले चिह्न जैसे स्वस्तिक, कमल का फूल, लक्ष्मीजी के पग (पगलिए) इत्यादि समृद्धि और मंगलकामना के सूचक समझे जाते हैं। आज कई घरों, देवालयों के आगे नित्य रंगोली बनाई जाती है। रीति-रिवाजों को सहेजती-सँवारती यह कला आधुनिक परिवारों का भी अंग बन गई है। शिल्प कौशल और विविधतायुक्त कलात्मक अभिरुचि के परिचय से गृह-सज्जा के लिए बनाए जाने वाले कुछ माँडणों को छोड़कर प्रायः सभी माँडणे किसी मानवीय भावना के प्रतीक होते हैं। और इस प्रकार ये हमारी सांस्कृतिक भावनाओं को साकार करने में महत्वपूर्ण साधन माने जाते हैं।

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- पंकज कुमार उपाध्याय
हर्ष और प्रसन्नता का प्रतीक रंगोली रंगमयी अभिव्यक्ति है जिसमें विभिन्न डिजाइनों में चटकीले, भड़कीले रंग भरकर सशक्त प्रभाव उत्पन्न किया जाता है। वैसे तो रंगोली के लिए कई इंद्रधनुषी रंग बाजार में सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं, साथ ही हल्दी, कुंकू, गुलाल इत्यादि सूखे रंगों का उपयोग किया जाता है। गीले रंगों में गेरू, खड़िया मिट्टी या फिर बाजार में मिलने वाले जल रंग ले सकते हैं। गाँवों में गेरू, हिरमची इत्यादि रंगों का उपयोग माँडणा, रंगोली बनाने में किया जाता है। गीले रंगों को छोटे ब्रश की सहायता से बनाइए और सूखे रंगों की रंगोली हाथ के अँगूठे व अँगुली की सहायता से बनाइए। आजकल तो घरों में रंगोली ऑइल पेंट से भी बनाई जाने लगी है।


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