प्लेबैक सिंगर्स : थोड़े काम से मिला बड़ा नाम

रिचा शर्मा
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हिन्दी फिल्मों में जब से प्लेबैक सिंगिंग का दौर शुरू हुआ, तब से कुछ नाम तो हर दौर में ऐसे रहे जो चमकते ही रहे। मतलब प्लेबैक सिंगिंग की दुनिया के चमकते सितारे। लता, आशा, रफी, मुकेश, किशोर, से लेकर उदित, सोनू, अलका, कविता, अनुराधा, श्रेया, सुनिधि, शान, मोहित आदि-आदि लेकिन इसके साथ ही कुछ प्लबैक सिंगर ऐसे भी आए, जो या तो क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों से आए थे, या फिर लोकगीतों, गज़ल, भजन या और कोई गैर-फिल्मी विधा से।

इन्होंने कुछेक गाने गाए, नाम कमाया और फिर अपनी दुनिया में लौट गए। ऐसे प्लेबैक सिंगरों की एक लंबी लिस्ट है, जिन्होंने हिन्दी फिल्मों में बहुत थोड़ा-सा काम किया, लेकिन उनके गाए गाने इस सुरीले इतिहास का हिस्सा बन गए हैं। और इस तरह के प्लेबैक सिंगर एकाध नहीं है, एक लंबी लिस्ट है। इनमें कुछ तो ऐसे हैं जिनके खुद के गाए गानों की एक लंबी-चौड़ी लिस्ट है, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जिन्होंने एक-दो या फिर एकाध दर्जन गाने ही गाए और मशहूर हुए हैं।
सत्तर के दशक में 'जूली' में अंग्रेजी गाना 'माय हार्ट इज बीटिंग...' गाकर इस इंडस्ट्री में एक नई तरह की आवाज लेकर आई थीं। आधा दर्जन से भी कम फिल्मी गीत गाने के बाद प्रीति ने गज़ल और लोकगीत सब कुछ गाए।

'निशांत' में 'पिया बाजे', 'भूमिका' में 'तुम्हारे बिन जी ना लगे' और 'मंडी' में 'शमशीर बरेहना माँग गजब' गाया तो इन सबके ठीक उलट 'मारो गाम काठाबाड़ी' जैसा ठेठ लोकगीत 'मंथन' में गाया। इसी तरह नाम की एक गायिका ने कई हिट गीत गाए जैसे 'रफू चक्कर' का 'ऐ जमाने तू कर ले सितम पे सितम' और इसी फिल्म में शैलेंद्रसिंह के साथ 'तुमको मेरे दिल ने पुकारा है' तो मुकेश के साथ 'धर्मात्मा' में 'क्या खूब लगती हो' और 'तुमने किसी से कभी प्यार किया है' जैसे कुछेक गाने ही गाए हैं, लेकिन फिल्म संगीत में अपना नाम दर्ज करवा लिया है। उनका सबसे हिट गीत 'कुर्बानी' का 'लैला मैं लैला' था।
इसी समय चंद्राणी मुकर्जी ने 'भाभी की ऊँगली में हीरे का छल्ला' और 'इस इश्क मुहब्बत की कुछ है अजीब रस्में' तथा ऐसे ही कुछ और गाने गाए। उनका एक गीत 'मेरे मेहबूब शायद आज कुछ नाराज हैं मुझसे' (कितने पास कितने दूर) जबरदस्त हिट हुआ था।

'बॉबी' में राज कपूर ने 'बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो' गाने से की आवाज से हिन्दी फिल्म संगीत प्रेमियों को परिचित कराया। चंचल ने हिन्दी में 'रोटी कपड़ा और मकान', 'आशा' और 'बेनाम' जैसी फिल्मों में एक-एक गाना गाया और फिर भक्ति संगीत और जागरण में ही गाने लगे।
कौन भूल सकता है कब्बन मिर्जा की स्थिर और भारी आवाज में गाए 'रजिया सुल्तान' के गानेः 'आई जंजीर की झंकार खुदा खैर करे' और 'तेरा हिज्र मेरा नसीब है' या फिर रेशमा का 'लंबी जुदाई' (हीरो)! इन गायकों ने बस कुछेक गानों के दम पर इस दुनिया में वो मुकाम बनाया है कि याद किए जाते हैं।

यदि हमें 'मासूम' का बाल-गीत 'लकड़ी की काठी' याद आता है तो साथ ही याद आते हैं आरती मुखर्जी की आवाज का 'दो नैना और एक कहानी' और साथ ही अनूप घोषाल का 'तुझसे नाराज नहीं जिंदगी'। अस्सी के दशक में ही जब बप्पी लाहिड़ी मिथुन चक्रवर्ती के साथ डिस्को की लहर पर सवार थे, तभी उन्होंने विजय बैनेडिक्ट की आवाज को हिन्दी फिल्मों में पहचान दी थी। उन्होंने 'डिस्को डांसर', 'कसम पैदा करने वाले की', 'आँधी-तूफान', 'लव-लव-लव', 'डांस-डांस' आदि फिल्मों में गाया और फिर परिदृश्य से गायब हो गए। विजय डिस्को के दौर में धूमकेतु की तरह उभरे और फिर डूब गए।
इसी दौर में फिरोज खान ने 'कुर्बानी' में एक नई आवाज को इंट्रोड्‌यूस करवाया था। गाना था 'आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए' और गाया था नाज़िया हसन ने। इस गाने से नाजिया ने सनसनी पैदा कर दी थी। बाद में उनके पॉप गीतों से भी भारतीय संगीत बाजार गुलज़ार हुए थे, लेकिन उस वक्त भारत के घरों तक नाज़िया की आवाज को 'आप जैसा कोई' ने ही पहुँचाया था।
'मेरे प्यार की उमर हो इतनी सनम' गायक मनमोहनसिंह को चाहे हम न जानें, लेकिन गाना तो गुनगुनाते ही हैं न! लगभग इसी दौर में 'दादा' में दिलराज कौर ने पंजाबी गाना 'गड्डी जांदी ए छलांगा मार दी' गाकर धूम मचाई थी। बाद में उन्होंने 'सत्ते पे सत्ता' में 'मौसम मस्ताना' और 'डैडी' में 'कभी ख्वाब में या खयाल में' गाया था।

हालाँकि अनुपमा देशपांडे मराठी फिल्मों में गाती रही हैं और सन्नी देओल-पूनम ढिल्लो की 'सोहनी-महिवाल' में 'सोहनी चनाब दे किनारे पुकारे' गाना गाया था, लेकिन हिन्दी सिने संगीत प्रेमी उन्हें 'सैलाब' में माधुरी दीक्षित पर फिल्माए खूबसूरत नृत्य-गीत 'हमको आजकल है इंतजार' से पहचानते हैं। उन्होंने 'काश' और 'कब्जा' में भी गाया है, लेकिन याद सिर्फ उसी गीत से रखी जाती हैं।
'आवारा भँवरे जो हौले-हौले गाए' से लोकप्रिय हुई ने भी इससे पहले भी कई गीत गाए हैं और बाद में भी। बाद में 'चक दे इंडिया' का उनका गाना 'बादल पे पाँव है' को बहुत पसंद किया गया। सपना मुखर्जी ने भी कुछ गाने गाए हैं, लेकिन इनमें खासतौर पर 'त्रिदेव' का 'तिरछी टोपी वाले', 'जाँबाज' का 'तेरा साथ है कितना प्यारा', 'अंदाज' का 'रब्बा इश्क न होवे' और 'कॉर्पेरेट' का 'ओ सिकंदर' यादगार गीत रहे।
अपने पिता के संगीत निर्देशन की 'गदर' में प्रीति उत्तम ने भी दो-तीन लोकप्रिय गीत गाए हैं। वे अब भी गा रही हैं लेकिन 'गदर' और 'बैंडिट क्वीन' के साउंडट्रेक के अलावा उनके गीतों को बहुत ज्यादा लोकप्रियता नहीं मिल पाई है।

मशहूर गज़ल गायकों जैसे जगजीत सिंह, गुलाम अली, अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन, तलत अजीज, पंकज उदास आदि और भजन गायक अनूप जलोटा ने भी फिल्मों के लिए गाया है। इसके साथ ही जब कभी फिल्मों में लोकगीतों के लिए गुंजाइश निकलती है, तब म्यूजिक डायरेक्टर लोकगायकों को याद करते हैं।
हेमा सरदेसाई
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अलग-अलग दौर में इला अरुण, मालिनी अवस्थी, शारदा सिन्हा (कहे तोसे सजनी, फिल्म मैंने प्यार किया), ऋचा शर्मा, जसपिंदर नरूला, कैलाश खेर, रेमो फर्नांडिस, बाली ब्रह्मभट्ट जैसे गायक अपने गाए एक-दो गीतों से ही हिन्दी सिने संगीत प्रेमियों को मिट्टी की गंध से सराबोर करते रहे हैं।
मतलब फिल्मी गीतों में जिस वक्त जिस तरह की आवाज की जरूरत होती है, उस हिसाब से गायकों को काम मिलता है। अब ये तो गानों की केमिस्ट्री होती है कि किसी एक ही गाना किसी गुमनाम से गायक को अमर कर देता है।

- विशाखा बनर्जी



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