जुवार : मिट्टी के रोग मिटाने वाली फसल

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उगाए जाने वाले क्षेत्रों के खेतों की मिट्टी में अब की अपेक्षा भूमिजनित रोग बहुत कम होते थे। जुवार को अकेली (एकल फसल) या कपास, तुवर, मूँग, उड़द, मूँगफली के साथ विभिन्न कतार अनुपात में मुख्य या सहायक अंतरवर्ती फसल के रूप में शामिल करके बोया जाता रहा था।

जुवार की देशी किस्मों के पौधे लंबे, अधिक ऊँचाई वाले, गोल या अंडाकार गूज नेक (बगुले या हंस की गर्दन के समान झुके हुए) भुट्टों वाले होते थे। इनमें दाने बिलकुल सटे हुए लगते थे। जुवार की उज्जैन 3, उज्जैन 6, पीला आँवला, लवकुश, विदिशा 60-1 मुख्य प्रचलित किस्में थीं। इनकी उपज 12 से 16 क्विंटल दाना और 30 से 40 क्विंटल कड़वी (पशु चारा) प्रति एकड़ तक मिल जाती थी। इनका दाना मीठा, स्वादिष्ट होता था।

चूँकि ये किस्में कम पानी व अपेक्षाकृत हल्की जमीनों में हो जाने के कारण आदिवासी क्षेत्रों की प्रमुख फसल थी। ये उनके जीवन निर्वाह का प्रमुख साधन था। साथ ही इससे उनके पशुओं को चारा भी मिल जाता था। इनके झुके हुए ठोस भुटटों पर पक्षियों के बैठने की जगह न होने के कारण नुकसान कम होता था।

इसके बाद आई जुवार की खुले भुट्टे वाली अधिक उपज देने वाली संकर किस्में।
  जुवार के नगण्य क्षेत्रफल और अच्छे भावों को दृष्टिगत रखते हुए अगर कुछ किसान मिलकर अपने पास-पास लगे हुए खेतों में इस फसल को उगाकर अधिक लाभ उठा सकते हैं। क्योंकि इसके दाने और कड़वी दोनों ही उचित मूल्य पर बिक सकते हैं      
इनके आने से जुवार की विपुल पैदावार मिलने, बाजार में माँग से अधिक पूर्ति के कारण भाव गिरकर 70 रु. प्रति क्विंटल तक आ गए। सरकार द्वारा दिए गए समर्थित मूल्य भी पूरी तरह खरीदी न होने के कारण सहारा न दे सके। इसी समय आई सोयाबीन। इसकी अधिक उपज, नई फसल होने के कारण कीड़ों व रोगों का कम प्रकोप, विदेशी मुद्रा कमाने वाली फसल होने के कारण सरकार का पूर्ण समर्थन, पर्याप्त अनुसंधान इन सब कारणों से जुवार की जमीन छिन गई।


इन 50-60 वर्षों में सोयाबीन ने सरकार व कृषक को पैसा तो दिलवाया परंतु सुनियोजित खेती के तरीकों व सिद्धांतों के अभाव में अब मिट्टी की उर्वरता व स्वास्थ्य पर इसके दुःष्प्रभाव परिलक्षित होने लगे हैं। अनेक खेतों में राइजोक्टोनिया, फ्यूजेरियम, स्क्लेरोशियम प्रजाति के पौध रोग व पौध अवशेषों में सोयाबीन की गर्डल बीटल आर्मी वर्म जैसे कीड़ों ने अपना स्थाई निवास बना लिया है। ये रोग व कीड़े बहुआश्रयी होने के कारण अनेक वर्ग की फसलों और सब्जियों को नुकसान पहुँचाते हैं। आपने खेत में फसल या सब्जियाँ लगाई नहीं कि इनकी पहले से तैयार फौज टूट पड़ती है उन पर।

जुवार के नगण्य क्षेत्रफल और अच्छे भावों को दृष्टिगत रखते हुए अगर कुछ किसान मिलकर अपने पास-पास लगे हुए खेतों में इस फसल को उगाकर अधिक लाभ उठा सकते हैं। क्योंकि इसके दाने और कड़वी दोनों ही उचित मूल्य पर बिक सकते हैं। इसके अलावा यदि आपके खेत की मिट्टी में उपरोक्त रोग लगते हैं तो जुवार को फसल क्रम में शामिल करके उन्हें नियंत्रित किया जा सकता है।

मध्यप्रदेश के लिए जुवार की समर्थित संकर किस्में सीएसएच5, सीएसएच9, सीएसएच-14, सीएसएच-18 है। इनके अलावा विपुल उत्पादन देने वाली उन्नत किस्में (जिनका बीज हर साल नया नहीं बदलना पड़ता है) हैं- जवाहर जुवार 741, जवाहर जुवार 938, जवाहर जुवार 1041 एसपीवी 1022 और एएसआर-1 (यह अगिया प्रभावित क्षेत्रों के लिए समर्थित हैं)। इनके बीजों के लिए जुवार अनुसंधान परियोजना, कृषि महाविद्यालय इंदौर से संपर्क कर सकते हैं। एक हैक्टेयर (ढाई एकड़) में बोने के लिए 10-12 किलोग्राम बीज लगता है।

बोने के पहले इसे 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा विरिडि (प्रोटेक्ट) नामक जैविक फफूँदनाशक से प्रति एक किलोग्राम बीज के साथ मिलाकर उपचारित कर लें। इसे 45 सेमी दूरी पर कतारों में बोएँ। बोते समय ही 40 किग्रा नत्रजन, 40 किग्रा स्फुर व 40 किग्रा पोटाश मिलाकर दुफन-तिफन या बीज-उर्वरक बोवाई यंत्र से बीज की कतारों के नीचे बोएँ। बीज अंकुरित होने व पौधे जम जाने पर कतारों के अंदर दो पौधों के बीच 10-12 सेमी की दूरी रखकर बीच के कमजोर पौधे निकाल दें। 40 किग्रा नत्रजन की दूसरी मात्रा बोने के 25-30 दिन बाद खड़ी फसल की कतारों के बीच यूरिया के रूप में डालकर गुड़ाई द्वारा मिला दें।

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- मणिशंकर उपाध्याजुवार किसी समय मालवा व निमाड़ क्षेत्र की प्रमुख फसल थी। आदिवासी क्षेत्रों में इसे जुवार माता के नाम से जाना जाता था। मालवा व निमाड़ को जुवार-कपास क्षेत्र (कॉटन-ज्वार झोन) के नाम से संबोधित किया जाता था। परंतु इसका क्षेत्रफल नगण्य हो गया है। अब यह फसल गरीबों के निर्वाह का साधन न रहकर अमीरों के शौक में शामिल हो गई है। जुवार खासकर मोटे दाने वाली जुवार का भाव आजकल खेरची में 1200 से 1500 रुपए क्विं. के बीच चल रहा है।
5-6 दशक पहले के कृषि वैज्ञानिक और अनुभवी कृषक जानते हैं कि जुवार
खरपतवार नियंत्रण के लिए डोरा चलाएँ : इसे सोयाबीन तुवर, कपास आदि की मुख्य फसल के साथ सहायक अंतरवर्ती फसल के रूप में भी लिया जा सकता है। दलहन फसलों में कतार अनुपात 4:2 या 6:2 उपयुक्त पाया गया है। यानी प्रत्येक 4 या 6 कतार तुवर के बाद दो कतारें जुवार की बोएँ। जुवार की संकर किस्मों से 25-30 क्विंटल दाना और 80-90 क्विंटल चारा तथा उन्नत किस्मों से 22-25 क्विंटल दाना व 100-120 क्विंटल चारा मिल जाता है।

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