अमिताभ का बचपन

पंतजी न आते तो अमिताभ का नाम इंकलाब होता

उत्तरप्रदेश के बस्ती जिले का पुराना नाम श्रावस्ती था। श्रावस्ती इसलिए, क्योंकि श्राव नामक राजा ने इसे बसाया था। श्रावस्ती छोड़ कर जो कायस्थ देश में अन्यत्र जा बसे, वे श्रीवास्तव कहलाए, जैसे मथुरावाले माथुर। कवि हरिवंशराय बच्चन ने अगर अपना उपनाम 'बच्चन' नहीं चुना होता, तो वे हरिवंशराय श्रीवास्तव कहलाते। वे पिछली सात पीढ़ियों से इलाहाबाद के वासी थे, जहाँ हिन्दी सिनेमा के सबसे ज्यादा चमकीले सितारे का 11 अक्टूबर 1942 की शाम को जन्म हुआ। हिन्दी काव्य में हालावाद के प्रवर्तक हरिवंशराय और उनका परिवार अत्यंत धार्मिकप्रवृत्ति का है और उनके घर में रामचरित मानस तथा श्रीमद् भगवत् गीता का नियमित पाठ होता है। संस्कारवश स्वयं अमिताभ भी गीता-रामायण का नियमित पारायण करते हैं। अमिताभ की माता श्रीमती तेजी बच्चन जन्मना सिख थीं, लेकिन वे भी हनुमानजी की अनन्य भक्त थीं। कवि बच्चन से तेजी सूरी का विवाह जनवरी 1942 में ही हुआ था और उसी साल उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हो गई।   
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तेजी से कवि बच्चन का दूसरा विवाह हुआ था। इससे पहले उनकी पत्नी श्यामा पूरे दस साल तक बीमार रहने के बाद परलोक सिधार गई थीं। तेजी से बच्चनजी की मुलाकात बरेली में एक मित्र ज्ञानप्रकाश जौहरी के घर हुई, जिनकी पत्नी लाहौर के फतेहचंद कॉलेज में प्राचार्य थीं और तेजी उसी कॉलेज में मनोविज्ञान पढ़ाती थीं। तेजी बच्चन की कविताओं की प्रशंसक थीं, इसलिए दोनों के बीच प्रेम और विवाह होने में देर नहीं लगी। 24 जनवरी 1942 को इलाहाबाद के जिला मजिस्ट्रेट की अदालत में उन्होंने अपना विवाह रजिस्टर कराया। इस विवाह में वर-वधूदोनों ने 4-4 सौ रुपए खर्च किए थे। उस समय के रूढ़िवादी समाज में यह एक विवादास्पद विवाह था। तेजी के पिता खजानसिंह लंदन से बैरिस्टरी करके आए थे और उन्होंने लायलपुर में प्रैक्टिस की थी, जहाँ तेजी का जन्म हुआ। सरदार खजानसिंह बाद में पटियाला राज्य के रेवेन्यू मिनिस्टर बने और अंततः लाहौर जा बसे। तेजी एक मातृविहीन बालिका थीं। शुरू में कवि बच्चन से तेजी का विवाह खजानसिंह को पसंद नहीं आया था, लेकिन बाद में संबंध सामान्य हो गए। 
 
सन्‌ 1942 की जिन सर्दियों में अमिताभ बच्चन का जन्म हुआ, बच्चन दंपति इलाहाबाद में बैंक रोड पर मकान नंबर 9 में रहता था। कविवर सुमित्रानंदन पंत भी सर्दियों में अलमोड़ा छोड़कर इलाहाबाद आ जाते थे। वे बच्चनजी के घर के निकट रहते थे। नर्सिंग होम में पंतजी ने नवजात शिशु की तरफ इशारा करते हुए कवि बच्चन से कहा था, 'देखो तो कितना शांत दिखाई दे रहा है, मानो ध्यानस्थ अमिताभ।' तभी बच्चन दंपति ने अपने पुत्र का नाम अमिताभ रख दिया था। तब बच्चनजी के एक प्राध्यापक मित्र अमरनाथ झा ने सुझाव दिया था कि भारत छोड़ो आंदोलन कीपृष्ठभूमि में जन्मे बालक का नाम 'इंकलाब राय' रखना बेहतर होगा, इससे परिवार के नामकरण शैली की परंपरा भी कायम रहेगी। झा ने इसी तरह बच्चनजी के दूसरे पुत्र अजिताभ का नाम देश की आजादी के वर्ष 1947 को देखते हुए आजाद राय रखने का सुझाव दिया था। लेकिन पंतजी ने कहा था, 'अमिताभ के भाई का नाम तो अजिताभ ही हो सकता है।' कालांतर में माता-पिता के लिए अमिताभ सिर्फ 'अमित' रह गया और उनकी माता उन्हें मुन्ना कहकर पुकारती थीं। तेजीजी की बहन गोविंद ने अजिताभ का घरेलू नाम 'बंटी' रखा। 
 
ढाई साल की उम्र में अमिताभ लाहौर रेलवे स्टेशन पर अपने माता-पिता से बिछड़कर ओवरब्रिज पर पहुँच गए थे, जब वे अपने नाना के घर मीरपुर जा रहे थे। बच्चन दंपति ने पहली बार अपने बेटे को सीख दी थी कि माता-पिता को बताए बगैर बच्चों को कहीं नहीं जाना चाहिए। इस बिछोह के समय तेजी टिकट लेने गई थीं और अमित पिता का हाथ छूट जाने से भीड़ में खो गए थे। मीरपुर में अपने नाना खजानसिंह के लंबे केश देखकर अमित को पहली बार आश्चर्य हुआ था कि ये औरतों जैसे लंबे बाल क्यों रखते हैं। लेकिन तेजी ने अपने बच्चों को सिख बनाए रखने की कोई चेष्टा नहीं की। श्रीवास्तव परंपरा के अनुसार अमित का चौल-कर्म (मुंडन संस्कार) विंध्य पर्वत पर देवी की प्रतिमा के आगे बकरे की बलि के साथ होना चाहिए था, मगर बच्चनजी ने ऐसा कुछ नहीं किया। 
 
दुर्योग देखिए कि बालक अमित के मुंडन के दिन ही एक सांड उनके द्वार पर आया और अमित को पटकनी देकर चला गया। अमित रोया नहीं, जबकि उसके सिर में गहरा जख्म हुआ था और कुछ टाँके भी लगे थे। वे इतना जरूर कहते हैं कि यह भिड़ंत उनकी उस सहन शक्ति का 'ट्रायल रन' थी, जिसे उन्होंने अपनी आगे की जिंदगी में विकसित किया।

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