बिछड़े सभी बारी-बारी : स्मृति शेष 2017

स्मृति आदित्य|

साल बीतते-बीतते सबसे ज्यादा कष्टप्रद होता है गुजरे साल को पलट कर देखना। देखना कुछ इस तरह कि कितने प्रखर हस्ताक्षर, साहित्य, कला और संस्कृति के विलक्षण नाम 'नहीं रहें' की सूची में शामिल हो गए। नहीं रहें, निधन, देहावसान जैसे शब्द दुख की एक गहरी काली छाया मन पर छोड़ जाते हैं और हम बेबस सोचते रह जाते हैं कि काश अपनी प्रतिभा का कुछ और अंश वे हमें दे जाते...काश, हम उनसे मिल पाते...काश, कि वे लौट कर आ जाते .... इन्हीं काश के बीच हम याद कर रहे हैं उन प्रमुख दिग्गजों को जिनके जीवन का सफर 2017 में आकर थम गया.... और 2018 में हमें उनके बिना ही प्रवेश करना है...

पेश है साहित्य, संगीत, कला, संस्कृति व अन्य क्षेत्रों के प्रमुख हस्ताक्षर... जो 2017 में हमसे बिछड़ गए....

2017 :


रेणुका नैयर : 25
दिसंबर

2017

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखिका रेणुका नैयर ने जीवन यात्रा पूरी की। कैंसर से पीड़ित होने के कारण वह बीमार चल रही थी। अब तक साहित्य जगत को 8 किताबें और विभिन्न विषयों पर हजारों लेख लिख चुकी इस लेखिका को अनेक पुरस्कार मिले।
इनकी पुस्तक न्यूज रूम काफी चर्चित रही। इसी पुस्तक के लिए केंद्रीय निदेशालय से एक लाख का पुरस्कार घोषित हुआ था। लेकिन पुरस्कार पाने से पहले ही उनका चले जाना दुखदाई रहा। कर्मठ और जुझारू लेखिका को सभी कलमकार याद रखेंगे।

सुनीता जैन : 11 दिसंबर 2017
11 दिसंबर 2017 को शिक्षा और साहित्य का पद्मश्री अलंकरण प्राप्त करने वाली सुनीता जैन नहीं रहीं। वे अंग्रेजी और हिन्दी में बेहतरीन कविताएं लिखतीं रहीं। उनके उपन्यास, लघुकथाएं, रचनात्मक अनुवाद और आलोचनात्मक विश्लेषण पाठकों की भरपूर सराहना अर्जित कर चुके हैं। कई पुस्तकों का सफल संपादन कर चुकीं सुनीता जैन आईआईटी दिल्ली में अंग्रेजी की प्रोफेसर थीं। कई पुरस्कार और फैलोशिप उनके खाते में दर्ज हैं।
रोमेश जोशी : 20 नवंबर 2017
वरिष्ठ पत्रकार, संपादक और व्यंग्यकार रोमेश जोशी का 20 नवंबर 2017 को पुणे में निधन हो गया। रोमेश ख्यात व्यंग्यकार स्व. शरद जोशी के छोटे भाई थे। जनसंपर्क कार्यालय, देवास में रहने के बाद उन्होंने शासकीय सेवा छोड़ पत्रकारिता शुरू कर दी थी। 1983 में दैनिक भास्कर इंदौर की शुरुआत से वे जुड़े थे और कई सालों तक सेवाएं दी। बाद में चेतना समाचार पत्र के संपादक भी बने।

कुंवर नारायण : 15 नवंबर 2017
ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिन्दी के प्रख्यात कवि कुंवर नारायण का 15 नवंबर 2017 को लंबी बीमारी के कारण निधन हो गया। वे 90 वर्ष के थे। नारायण करीब एक महीने से एक निजी अस्पताल में भर्ती थे और अचेतावस्था में थे।

9 सितंबर 1927 को उत्तरप्रदेश के फैजाबाद में जन्मे नारायण को पद्मभूषण सम्मान से विभूषित किया गया था। उन्हें 'कोई दूसरा नहीं' काव्यसंग्रह पर साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा व्यास सम्मान भी मिला था। कुंवर नारायण ने अपनी इंटर तक की शिक्षा विज्ञान विषय से पूर्ण की, किंतु साहित्य में रुचि होने के कारण वे साहित्य के विद्यार्थी बन गये थे। उन्होंने 'लखनऊ विश्वविद्यालय' से 1951 में अंग्रेज़ी साहित्य में एमए किया। 1973 से 1979 तक वे नाटक अकादमी के उप-पीठाध्यक्ष भी रहे। 1975 से 1978 तक अज्ञेय द्वारा सम्पादित मासिक पत्रिका में संपादक मंडल के सदस्य के रूप में भी कार्य किया।

उनकी काव्ययात्रा 'चक्रव्यूह' से शुरू हुई थी। इसके साथ ही उन्होंने हिन्दी के काव्य पाठकों में एक नई तरह की समझ पैदा की। यद्यपि कुंवर नारायण की मूल विधा कविता ही रही है, किंतु इसके अलावा उन्होंने कहानी, लेख व समीक्षाओं के साथ-साथ सिनेमा, रंगमंच एवं अन्य कलाओं पर भी बखूबी अपनी लेखनी चलाई।

कुंवर नारायण हमारे दौर के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार थे। उनकी काव्ययात्रा 'चक्रव्यूह' से शुरू हुई। इसके साथ ही उन्होंने हिन्दी के काव्य पाठकों में एक नई तरह की समझ पैदा की। उनके संग्रह 'परिवेश हम तुम' के माध्यम से मानवीय संबंधों की एक विरल व्याख्या हम सबके सामने आई। उन्होंने अपने प्रबंध 'आत्मजयी' में मृत्यु संबंधी शाश्वत समस्या को कठोपनिषद का माध्यम बनाकर अद्भुत व्याख्या के साथ हमारे सामने रखा। इसमें नचिकेता अपने पिता की आज्ञा, 'मृत्य वे त्वा ददामीति' अर्थात मैं तुम्हें मृत्यु को देता हूं, को शिरोधार्य करके यम के द्वार पर चला जाता है, जहां वह तीन दिन तक भूखा-प्यासा रहकर यमराज के घर लौटने की प्रतीक्षा करता है। उसकी इस साधना से प्रसन्न होकर यमराज उसे तीन वरदान माँगने की अनुमति देते हैं। नचिकेता इनमें से पहला वरदान यह माँगता है कि उसके पिता वाजश्रवा का क्रोध समाप्त हो जाए।

नचिकेता के इसी कथन को आधार बनाकर कुंवर नारायणजी की जो कृति 2008 में आई, 'वाजश्रवा के बहाने', उसमें उन्होंने पिता वाजश्रवा के मन में जो उद्वेलन चलता रहा उसे अत्यधिक सात्विक शब्दावली में काव्यबद्ध किया है। इस कृति की विरल विशेषता यह है कि 'अमूर्त'को एक अत्यधिक सूक्ष्म संवेदनात्मक शब्दावली देकर नई उत्साह परख जिजीविषा को वाणी दी है। जहां एक ओर आत्मजयी में कुंवर नारायण जी ने मृत्यु जैसे विषय का निर्वचन किया है, वहीं इसके ठीक विपरीत 'वाजश्रवा के बहाने'कृति में अपनी विधायक संवेदना के साथ जीवन के आलोक को रेखांकित किया है।

यह कृति आज के इस बर्बर समय में भटकती हुई मानसिकता को न केवल राहत देती है, बल्कि यह प्रेरणा भी देती है कि दो पीढ़ियों के बीच समन्वय बनाए रखने का समझदार ढंग क्या हो सकता है। उन्हें पढ़ते हुए, लगता है कि कुंवर नारायणजी हिन्दी कविता के पिछले 55 वर्ष के इतिहास के संभवतः श्रेष्ठतम कवि थे।
मनु शर्मा : 8 नवंबर 2017
वरिष्ठ साहित्यकार और हिन्दी में सबसे बड़ा उपन्यास लिखने वाले मनु शर्मा का 8 नवंबर 2017 को वाराणसी में निधन हो गया। वे 89 वर्ष के थे। शर्मा का उपन्यास 'कृष्ण की आत्मकथा' 8 खंडों में आया और इसे हिन्दी का सबसे बड़ा उपन्यास माना जाता है। इसके अलावा उन्होंने हिन्दी में तमाम उपन्यासों की रचनाएं कीं।

उनका जन्म 1928 को शरद पूर्णिमा को फैजाबाद के अकबरपुर में हुआ था। उन्होंने हिन्दी में कई उपन्यास लिखे जिनमें 'कर्ण की आत्मकथा', 'द्रोण की आत्मकथा', 'द्रौपदी की आत्मकथा', 'के बोले मां तुमि अबले', 'छत्रपति', 'एकलिंग का दीवाना', 'गांधी लौटे' काफी विख्यात हुए। उनके कई कहानी संग्रह और कविता संग्रह भी आए। शुरुआत में वे हनुमान प्रसाद शर्मा के नाम से लेखन करते थे।

शर्मा को उत्तरप्रदेश सरकार के सर्वोच्च सम्मान 'यश भारती' से सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें गोरखपुर विश्वविद्यालय से मानद डीलिट की उपाधि से भी सम्मानित किया गया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 'स्वच्छ भारत अभियान' के तहत जिन प्रारंभिक 9 लोगों को नामित किया था उनमें से एक मनु शर्मा भी थे।

वरिष्ठ पत्रकार आर मोहन : 5 नवंबर 2017
तमिलनाडु के मद्रास पत्रकार संघ के सचिव और वरिष्ठ पत्रकार आर मोहन का निधन हो गया। वह 53 वर्ष के थे। मोहन अपने निवास पर दोनों पुत्र के साथ थे।वह पिछले दो दशकों से तमिल दैनिक 'दिनाकरन' में कार्यरत थे।

एच एम मराठे : 2 अक्टूबर 2017
मशहूर मराठी लेखक और पत्रकार एच एम मराठे का 2 अक्टूबर 2017 को निधन हो गया। वह 77 साल के थे। महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में दो मार्च, 1940 को जन्मे मराठे साहित्य जगत में ‘हा मो’के नाम से चर्चित थे। अपने उल्लेखनीय करियर के दौरान उन्होंने निशपरना वृक्षवर भर दुपानी, कालेश्वर पानी, अन्नाची टोपी (लघुकथा संग्रह) बालकंद, पोहरा, न्यूज स्टोरी और कलियुग समेत कई किताबें लिखीं। उन्होंने संपादक समेत विभिन्न पदों पर विभिन्न अखबारों एवं पत्रिकाओं में अपनी सेवाएं दी।

अरुण साधु : 25 सितंबर 2017
जानेमाने पत्रकार एवं लेखक अरुण साधु का 25 सितंबर 2017 को निधन हो गया। वे 76 वर्ष के थे।
साधु की अंतिम इच्छा के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया। वे चाहते थे कि उनके शरीर को दान कर दिया जाए। उन्हें उनके पहले उपन्यास मुंबई दिनांक एवं उनकी पुस्तक सिंहासन के लिए जाना जाता है। सिंहासन पर बाद में एक मराठी फिल्म बनाई गई थी। टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, द स्टेट्समैन और मराठी अखबार केसरी समेत कई समाचार पत्रों के साथ काम करने वाले साधु ने हिन्दी, अंग्रेजी और मराठी में विभिन्न उपन्यास लिखे जिनके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उन्हें भारतीय भाषा परिषद, एन सी केल्कर और आचार्य अत्रे पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। साधु ने कई लघु कहानियों के अलावा शिवसेना के उदय, वियतनाम युद्ध और चीनी क्रांति के बारे में भी लिखा।

चंद्रकांत देवताले : 15 अगस्त 2017
ख्यातनाम यशस्वी कवि चंद्रकांत देवताले देवताले 15 अगस्त 2017 को संसार से बिदा हो गए। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हिन्दी के कवि चंद्रकांत देवताले का 15 अगस्त 2017 को निधन हो गया। वे 81 वर्ष के थे।

मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के जौलखेड़ा में 7 नवंबर 1936 में जन्मे देवताले 1960 के दशक में अकविता आंदोलन के साथ उभरे थे और 'लकड़बग्घा हंस रहा है' संग्रह से चर्चित हुए थे। हिन्दी में एमए करने के बाद उन्होंने मुक्तिबोध पर पीएचडी की थी। वह इंदौर में एक कॉलेज से शिक्षक के रूप में सेवानिवृत्त होकर स्वतंत्र लेखन कर रहे थे।

उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान के अलावा मध्यप्रदेश शिखर सम्मान तथा मैथिली शरण गुप्त सम्मान मिला था। उनकी चर्चित कृतियों में 'रौशनी के मैदान के उस तरफ', 'पत्थर फेंक रहा हूं, हड्डियों में छिपे ज्वार' शामिल हैं। उन्होंने संत तुकाराम और दिलीप चित्रे की रचनाओं का अनुवाद भी किया था।

प्रो.यशपाल: 24 जुलाई 2017
मशहूर वैज्ञानिक एवं शिक्षाविद् प्रो.यशपाल का 24 जुलाई 2017 को नोएडा में निधन हो गया। वह 90 वर्ष के थे। पद्म विभूषण और पद्म भूषण समेत कई सम्मानों से नवाजे गए प्रो.यशपाल अनेक महत्वपूर्ण पदों पर आसीन रहे हैं। इनमें योजना आयोग में मुख्य सलाहकार, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग में सचिव और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में अध्यक्ष शामिल हैं।

प्रो. यशपाल का जन्म 26 नवंबर 1926 में हरियाणा हुआ था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च से की थी। भारत सरकार ने 1973 उन्हें स्पेस ऐप्लीकेशन सेंटर का पहला निदेशक नियुक्त किया था।

1983-84 में वह योजना आयोग के मुख्य सलाहकार भी रहे थे। प्रो. यशपाल को 1976 में पद्म भूषण तथा 2013 में पद्म विभूषण सम्मान से नवाजा गया था।
वह वर्ष 1986 से 1991 तक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के चेयरमैन रहे थे।

प्रो. यशपाल को विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से फिजिक्स में पीएचडी डिग्री हासिल की थी।

अजित कुमार : 18 जुलाई 2017
86 बरस के अजित कुमार का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि अजित कुमार का जन्म उन्नाव के जमींदार परिवार में हुआ था। उनकी मां सुमित्रा कुमारी सिन्हा, बहन कीर्ति चौधरी और पत्नी स्नेहमयी चौधरी भी बहुत प्रसिद्ध कवयित्री थीं।

साहित्य और काव्य से प्रेम अजितजी को विरासत में मिला था और उस परंपरा का निर्वाह करते हुए उन्होंने हिन्दी के साहित्य जगत में अपना ऊंचा मुकाम हासिल किया। अजितजी ने कुछ समय कानपुर के किसी कॉलेज में पढ़ाया और फिर लंबे समय तक दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज में अध्यापन कार्य करके वहीं से सेवानिवृत्त हुए। उनके कई कविता संग्रह प्रकाशित हुए, जैसे अकेले कंठ की पुकार, अंकित होने दो, ये फूल नहीं, घरौंदा इत्यादि।

स्वभाव से मधुर और लोकप्रिय व्यक्तित्व के स्वामी अजितजी का हरिवंशराय बच्चन से निकट संबंध रहा। बच्चनजी के विदेश मंत्रालय में नियुक्त रहने के दौरान दोनों ने साथ में कई परियोजनाओं पर काम किया। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित ‘बच्चन रचनावली’ के संपादक रहे अजितजी ने अभी हाल ही में रचनावली का अद्यतन रूप संपादित करते हुए उसमें 10वें और 11वें खंडों का विस्तार किया। जिस तत्परता और मनोयोग से इस कार्य को उन्होंने संपन्न किया, वह अपने आप में एक मिसाल है। जीवन के आखिरी समय में साहित्य के क्षेत्र में उनके द्वारा किया गया यह एक बड़ा योगदान था।

सी नारायण रेड्डी : 12 जून 2017
प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात तेलुगू कवि और लेखक सी नारायण रेड्डी का 12 जून 2017 को निधन हो गया। उनकी रचनाओं को एक नई परंपरा की शुरुआत करने वाली रचनाओं के रूप में देखा जाता है। तेलुगू भाषा के वरिष्ठ साहित्यकार 85 वर्षीय रेड्डी की 80 से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है जिनमें कविता, गीत, गीतात्मक नाटक, नृत्य, निबंध, यात्रा वृतांत, पारंपरिक और गजल, और साहित्यिक आलोचना शामिल है।

29 जुलाई 1931 को करीमनगर जिले में जन्में प्रख्यात लेखक और गीतकार अपनी पीढ़ी के सबसे प्रतिष्ठित तेलुगू कवि थे। वे तेलंगाना सारस्वत परिषद के अध्यक्ष भी थे। उन्हें 1988 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था। उन्हें 1977 में पद्मश्री और 1992 में पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया था।

आधुनिक तेलुगू कविता पर परंपरा और प्रभाव का आकलन करने के लिए उन्होंने शोध किया था। उन्होंने करीब 3,500 फिल्मी गीत भी लिखे।
तारक मेहता : 1 मार्च 2017
अहमदाबाद। प्रख्यात गुजराती हास्य लेखक, नाट्यकार और स्तम्भ लेखक पद्मश्री तारक मेहता का निधन हो गया। वह 88 वर्ष के थे। मेहता के प्रमुख संकलित उपन्यास 'दुनिया ने उंधा चश्मा' के आधार पर सफलता के कई कीर्तिमान बनाने वाले लोकप्रिय हास्य टीवी धारावाहिक 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' का निर्माण किया गया है।

26 दिसंबर 1929 में अहमदाबाद में जन्मे मेहता ने गुजराती साहित्य विषय से बीए और एमए की पढाई मुंबई से की थी। सामयिक विषयों को अलग नजरिये से छूने वाले उनके साप्ताहिक धारावाहिक लेख दुनिया ने उंधा चश्मा का वर्ष 1971 से लगभग 40 साल तक निरंतर जानी मानी गुजराती पत्रिका चित्रलेखा में होता रहा था।

उन्हें कई तरह के पुरस्कार मिले थे और वर्ष 2015 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया था। टेलीविजन पर उनके संकलित उपन्यास पर आधारित धारावाहिक का प्रसारण सब टीवी ने वर्ष 2008 में शुरू किया था जिसने कुछ ही समय में सफलता के कीर्तिमान बना डाले। इसका प्रसारण अब भी जारी है।

कला :

नीरज वोरा : 14 दिसंबर 2017
लंबे समय से कोमा में रहे एक्टर-डायरेक्टर नीरज वोरा का निधन हो गया। 54 साल के नीरज वोरा ने अंधेरी में अंतिम सांसे ली। पहले हार्टअटैक और ब्रेन स्ट्रोक आने के बाद वे पिछले करीब 13 महीने से कोमा में थे।

नीरज वोरा ने रंगीला, सत्या, बादशाह, पुकार, बोल बच्चन, वेलकम बैक जैसी कई फिल्मों में काम किया था। 'खिलाड़ी 420' और 'फिर हेरा फेरी' जैसी कई फिल्मों को निर्देशित भी किया।

शशि कपूर : 4 दिसंबर 2017
पद्‍मभूषण से सम्मानित अभिनेता शशि कपूर का 79 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। वर्ष 2014 में फिल्मी दुनिया के सबसे बड़े 'दादा साहब फालके पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था। 18 मार्च 1938 में कोलकाता में जन्मे शशि ने अभिनय के साथ ही कई फिल्मों का निर्देशन भी किया।

शशि कपूर का असली नाम बलबीर राज कपूर था। उन्हें प्यार से शशि भी कहा जाता है इसलिए वे शशि कपूर नाम से फिल्मों में आए।

1961 में धर्मपुत्र से शशि ने अपना करियर शुरू किया। यश चोपड़ा द्वारा निर्देशित यह फिल्म 'आचार्य चतुरसेन' नामक उपन्यास पर आधारित थी। इस फिल्म को 1961 में प्रेसिडेंट सिल्वर मेडल मिला। शशि ने जब बतौर हीरो अपना करियर शुरू किया तब उनके भाई राज कपूर और शम्मी कपूर अपने करियर के शीर्ष पर थे।

कहा जाता है कि लड़कियां और महिलाएं शशि की दीवानी थी। शशि कपूर को बड़ी सफलता मिली फिल्म 'जब जब फूल खिले' (1965) से। मधुर संगीत, रोमांटिक कहानी और शशि कपूर-नंदा की जोड़ी ने सभी का मन मोह लिया।

पृथ्वी थिएटर : 1972 में पृथ्वीराज कपूर के निधन के बाद उनके पुत्र शशि कपूर ने पत्नी जेनिफ़र के साथ मिलकर पृथ्वी थियेटर ट्रस्ट की स्थापना की। उन्होंने समुद्र तट पर जूहू में ज़मीन खरीदकर एक थिएटर भवन का निर्माण किया। इसमे 200 सीटें हैं। इसमें 1978 से हर साल लगभग 400 शो दिखाए जाते हैं और 50 से भी अधिक थिएटर ग्रुप इसमें सक्रिय हैं। पृथ्वीराज कपूर की पोती और शशि कपूर और जेनिफ़र की बेटी संजना कपूर पृथ्वी थिएटर की निदेशक हैं।

श्यामा : 14 नवंबर 2017
14 नवंबर 2017 की सुबह फिल्म अभिनेत्री श्यामा का 82 वर्ष की आयु में निधन हो गया। 7 जून 1935 को लाहौर में जन्मी श्यामा ने आरपार (1954), बरसात की रात (1960) और तराना जैसी फिल्मों के जरिये लोकप्रियता हासिल की थी। इसके अलावा सावन भादो, दिल दिया दर्द लिया, मिलन, शारदा जैसी फिल्मों में भी अभिनय किया। 1950 और 60 के दशक में वे व्यस्त और सफल रही थीं। शारदा फिल्म के लिए उन्हें सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेअर अवॉर्ड भी मिला था।

श्यामा पर फिल्माए गए 'ऐ दिल मुझे बता दे', 'ओ चांद जहां वो जाए', 'ऐ लो मैं हारी पिया', 'देखो वो चांद छुप के करता है क्या इशारे', 'जा रे कारे बदला' बेहद प्रसिद्ध हुए थे। 1953 में श्यामा की शादी निर्देशक फली मिस्त्री से हुई थी। श्यामा के दो बेटे फारुख और रॉबिन तथा एक बेटी शिरीन हैं। श्यामा के पति का 1979 में निधन हो गया था। डेढ़ सौ से भी अधिक फिल्म करने वाली श्यामा का वास्तविक नाम खुर्शीद अख्तर था, जिसे बदल कर श्यामा निर्देशक विजय भट्ट ने कर दिया था।

गौतम अधिकारी : 27 अक्टूबर 2017
टेलीविजन के जाने-माने धारावाहिक निर्माता और मराठी टीवी उद्योग की अग्रणी हस्तियों में से एक गौतम अधिकारी का 27 अक्टूबर 2017 को निधन हो गया। वे 67 वर्ष के थे। गौतम और उनके भाई मार्कंड ने वर्ष 1985 में श्री अधिकारी ब्रदर्स (एसएबी) ग्रुप शुरू किया था। वर्ष 1995 में बीएसई में सूचीबद्ध होने के बाद यह भारत की पहली सार्वजनिक-सूचीबद्ध टेलीविजन प्रोडक्शन कंपनी बन गई थी। यह कंपनी शुरुआत में मराठी भाषा में धारावाहिकों का निर्माण करती थी लेकिन जल्द इसने फिल्म वितरण एंव निर्माण कारोबार में भी कदम रखा। गौतम अधिकारी ने व्यावसायिक कला में डिप्लोमा किया था और उन्होंने कई फिल्मों और धारावाहिकों का निर्देशन किया था।

गिरिजा देवी : 25 अक्टूबर 2017
पद्म विभूषण से सम्मानित प्रख्यात शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी का 25 अक्टूबर 2017 को 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्हें ठुमरी की मलिका कहा जाता था और प्रेम से अप्पाजी बुलाया जाता था। गिरिजा देवी का जन्म आठ मई 1929 को बनारस के निकट एक गांव में जमींदार परिवार में हुआ था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गिरिजा देवी के निधन पर शोक प्रकट किया। उन्होंने कहा कि गायिका की संगीतमय अपील पीढ़ियों के भेद से परे थी और भारतीय शास्त्रीय संगीत को लोकप्रिय बनाने के उनके प्रयासों को हमेशा याद रखा जाएगा। उनके जाने से भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत ने खूबसूरत आवाजों में से एक अहम आवाज को खो दिया। बनारस घराने की गायिका को वर्ष 1972 में पद्श्री सम्मान मिला था। वर्ष 1989 में उन्हें पद्म भूषण और 2016 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।

लेख टंडन : 15 अक्टूबर 2017
मशहूर डायरेक्टर-एक्टर लेख टंडन का 15 अक्टूबर 2017 को निधन हो गया। 88 वर्ष के लेख टंडन ने खुदा कसम, आम्रपाली, प्रोफेसर, दुल्हन वही जो पिया मन भाए जैसी फिल्में डायरेक्ट की हैं। इसके अलावा उन्होंने कई फिल्मी सितारों को कास्ट किया और उनके साथ काम भी किया। टीवी सीरियल 'दिल दरिया' शो में शाहरुख खान को लेख ने ही कास्ट किया था। इन डायरेक्टर ने कई बड़ी फिल्मों में एक्टिंग की। स्वेदश, रंग दे बसंती, हल्ला बोल, पहेली जैसी फिल्मों में वे अपनी एक्टिंग के लिए जाने जाते रहे।

टॉम ऑल्टर : 29 सितंबर 2017
दिग्गज थिएटर, फिल्म एवं टीवी अभिनेता टॉम ऑल्टर का 29 सितंबर 2017 को निधन हो गया। वह 67 के थे। वह त्वचा कैंसर से पीड़ित थे।

ऑल्टर अमेरिकी मिशनरी माता-पिता के पुत्र थे। उनका जन्म 1950 में मसूरी में हुआ था। उन्होंने मसूरी के वुडस्टॉक स्कूल में और बाद में पुणे की फिल्म और टेलीविजन संस्थान में पढ़ाई की। अभिनेता ने 300 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया, जिसमें सत्यजीत रे की शतरंज के खिलाड़ी और जूनून शामिल हैं।

उनकी पहली हिन्दी फिल्म रामानंद सागर की चरस 1976 में रिलीज हुई थी। उनकी कुछ बेहद पसंद की गई फिल्मों में आशिकी, परिंदा, सरदार पटेल और गांधी शामिल हैं। टेलीविजन की दुनिया में ऑल्टर ने ‘भारत एक खोज’ से ले कर ‘शक्तिमान’ तक में काम किया। उन्होंने बंगाली, असमिया और तेलुगू सिनेमा में भी काम किया। वह एक क्रिकेट प्रेमी भी थे। उन्होंने कई खेल पत्रिकाओं के लिए लेख भी लिखे थे। उनकी आखिरी फिल्म सरगोशियां थी, जिसमें उन्होंने आलोकनाथ और फरीदा जलाल के साथ काम किया था। ऑल्टर ने थिएटर में भी उल्लेखनीय काम किया। उनका नाटक दिल्ली में गालिब का मंचन पूरे देश में किया गया। इस नाटक में उन्होने मिर्जा गालिब का किरदार अदा किया। ऑल्टर एक खेल पत्रकार भी थे। टीवी के लिए सचिन तेंदुलकर का साक्षात्कार करने वाले पहले व्यक्ति थे। कला और सिनेमा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 2008 में ऑल्टर को पद्म श्री से सम्मानित किया गया। आल्टर के परिवार में पत्नी कैरोल, बेटे जेमी और बेटी अफसान हैं।

द्विजेन बंद्योपाध्याय : 27 सितंबर 2017
बांग्ला भाषा के दिग्गज अभिनेता द्विजेन बंद्योपाध्याय का 27 सितंबर 2017 को
निधन हो गया। वे 68 वर्ष के थे। बंद्योपाध्याय रंगमंच और सिनेमा के जाने-माने अभिनेता थे। उन्होंने कला एवं मुख्यधारा दोनों तरह की फिल्मों में काम किया। उनकी प्रमुख फिल्मों में 'चांदेर बाड़ी', 'जेखाने भूतेर भय', 'फोरिंग', 'प्रेम बाई चांस' शामिल हैं।
शकीला : 20 सितंबर 2017
आर पार और सीआईडी जैसी फिल्मों के लिए पहचाने जाने वाली फिल्म अभिनेत्री शकीला का 20 सितंबर को मुंबई में निधन हो गया। वे 82 वर्ष की थीं।

शकीला ने श्रीमान सत्यवादी, चाइना टाउन, पोस्ट बॉक्स 999, दास्तान, शहंशाह, अलीबाबा चालीस चोर जैसी कई फिल्में की। उन पर फिल्माया गया गीत 'बाबूजी धीरे चलना' बेहद हिट रहा था। 1963 में प्रदर्शित 'उस्तादों के उस्ताद' में वे आखिरी बार नजर आई थी।

एक जनवरी 1935 को जन्मी शकीला ने गुरुदत्त, देवानंद, सुनील दत्त, किशोर कुमार, शम्मी कपूर, राज कपूर जैसे कलाकारों के साथ काम किया। वे बेहद खूबसूरत एक्ट्रेस मानी जाती थीं। दिग्गज अभिनेताओं के साथ काम करने के बावजूद उन्हें वह सफलता नहीं मिली जिसकी वे हकदार थीं।

शकीला ने शादी के बाद फिल्म इंडस्ट्री को अलविदा कह दिया। उन्होंने एक एनआरआई से विवाह किया था। उनका एक बेटी और एक बेटा था। बेटी ने आत्महत्या कर ली थी जिसका शकीला को सदमा पहुंचा था।

बीवी राधा : 10 सितंबर 2017
दक्षिण भारतीय फिल्मों की जानी-मानी अभिनेत्री बीवी राधा का 10 सितंबर 2017 को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वे 70 साल की थीं। अभिनेत्री की इच्छा के अनुरूप उनके शव को मेडिकल कॉलेज को दान किया गया।

वर्ष 1948 में जन्मीं राधा ने 250 से अधिक दक्षिण भारतीय फिल्मों में काम किया है जिनमें कन्नड़, तमिल एवं तेगुलु आदि भाषा शामिल हैं। वे प्रसिद्ध कन्नड़ फिल्म निर्देशक केएसएल स्वामी की पत्नी थीं जिनका गत वर्ष निधन हो गया था।

अभिनेत्री ने वर्ष 1964 में कन्नड़ फिल्म 'नवकोटि नारायण' से फिल्मी सफर की शुरुआत की और इसके साथ ही उन्होंने अपना नाम राजलक्ष्मी से बदलकर राधा कर लिया।

शोभा सेन : 13 अगस्त 2017
चरित्र अभिनेता उत्पल दत्त की पत्नी एवं प्रसिद्ध अभिनेत्री शोभा सेन का 13 अगस्त 2017 को निधन हो गया। वे 93 वर्ष की थीं। बंगाली थिएटर और फिल्मों की पूर्व अभिनेत्री शोभा सेन का जन्म अविभाजित बंगाल के फरीदपुर जिले में वर्ष 1923 में हुआ था। सेन ने थिएटर और फिल्मों में अपना करियर
बनाने से पहले कलकत्ता के बेथुने कॉलेज से पढ़ाई की। थिएटर और अभिनय के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिए सेन को संगीत नाटक अकादमी
पुरस्कार से भी नवाजा गया। शोभा सेन ने अपने पति उत्पल दत्त के साथ तिनेर तोलोवार, नबन्ना, बैरिकेड और तितुमीर नामक नाटकों में काम कर थिएटर के क्षेत्र में विशेष पहचान बनाई।

शोभा सेन ने 1955 में अपनी पहली बंगाली फिल्म 'भगवान कृष्ण' से अपने फिल्मी करियर
की शुरुआत की। सेन ने मृणाल सेन के निर्देशन में बनी फिल्म 'एक अधूरी कहानी', 'एकदिन प्रोतिदिन' और उत्पल दत्त की 'बैशाकी मेघ' और 'झार' में भी काम किया। सेन ने बासु भट्टाचार्य और गौतम घोष की फिल्मों में भी काम किया। शोभा सेन को नाट्य
एवं अभिनय के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 2010 में मदर टेरेसा अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया।

दसारी नारायण राव : 31 मई 2017
प्रसिद्ध फिल्म निर्माता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री दसारी नारायण राव का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 75 वर्ष के थे। तेलगू सिनेमा में अपने काम के लिए प्रसिद्ध राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक राव कांग्रेस पार्टी में सक्रिय नेता रहे राव संप्रग एक में केन्द्रीय मंत्री रहे। वह आंध्रप्रदेश से कांग्रेस सांसद थे। वह 2004-2006 और 2006-2008 तक दो बार केन्द्रीय कोयला राज्यमंत्री रहे।

राव मुख्य रूप से मेघसंदेशम, गोरीनाटकू, प्रेमाभिषेकम, बंगारू कुटुंबम और स्वरगम नरकम के निर्देशक के रूप में लोकप्रिय रहे। उन्होंने दक्षिण भारतीय सिनेमा के सुपरस्टार रहे एनटी रामा राव और अक्किनेनी नागेश्वर राव के साथ मिलकर कई सुपरहिट फिल्में दी हैं।
रीमा लागू : 18 मई 2017
हम आपके हैं कौन और कल हो न हो जैसी फिल्मों में शानदार अभिनय के लिए जानी जाने वाली अभिनेत्री रीमा लागू का 18 मई 2017 को निधन हो गया। वे 59 वर्ष की थीं।

रीमा ने कई टीवी कार्यक्रमों के अलावा मराठी और हिन्दी फिल्मों में भी काम किया था। उनके परिवार में बेटी मृण्मयी है और वे भी रंगमंच एवं फिल्मों में अभिनय करती हैं एवं रंगमंच निर्देशक हैं।

रीमा ने मैंने प्यार किया, साजन, वास्तव, कुछ-कुछ होता है और हम साथ-साथ हैं जैसी कई सुपरहिट फिल्मों में अभिनय किया है। इसके अलावा उन्होंने 'तू-तू, मैं-मैं और श्रीमान-श्रीमती जैसे लोकप्रिय टीवी धारावाहिकों में भी अभिनय किया था। उन्होंने 4 दशक तक अभिनय किया और वे नामकरण धारावाहिक में अभिनय कर रही थीं, जो स्टार प्लस पर प्रसारित होता है।

विनोद खन्ना : 27 अप्रैल 2017
फिल्म अभिनेता विनोद खन्ना का 70 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।। 27 अप्रैल 2017 की सुबह विनोद ने मुंबई में आखिरी सांस ली।

सत्तर के दशक में विनोद खन्ना का दबदबा था। उन्होंने खलनायक के रूप में अपना सफर शुरू किया और बाद में नायक बन कर छा गए। अमिताभ बच्चन और उनके बीच नंबर वन के सिंहासन के लिए मुकाबला था, लेकिन बाद में विनोद खन्ना ने संन्यास ले लिया और रजनीश के आश्रम चले गए। बाद में वे फिर फिल्म इंडस्ट्री में लौटे लेकिन पहले जैसी सफलता नहीं मिली।

किशोरी अमोनकर : 3 अप्रैल 2017
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में अपने उम्दा गायन से एक विशिष्ट मुकाम हासिल करने वाली किशोरी अमोनकर का 3 अप्रैल 2017 को निधन हो गया था। वे 84 वर्ष की थीं। अमोनकर का जन्म 10 अप्रैल 1932 को मुंबई में हुआ था। अमोनकर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की अग्रणी गायिकाओं में से एक थीं और वे जयपुर घराने से ताल्लुक रखती थीं। अमोनकर की मां जानी-मानी गायिका मोगुबाई कुर्दीकर थीं। उन्होंने जयपुर घराने के दिग्गज गायक अल्लादिया खान साहब से प्रशिक्षण हासिल किया था।

अपनी मां से जयपुर घराने की तकनीक और बारीकियां सीखने के दौरान अमोनकर ने अपनी खुद की शैली विकसित की जिस पर अन्य घरानों का प्रभाव भी दिखता है। उन्हें मुख्य रूप से खयाल गायकी के लिए जाना जाता था लेकिन उन्होंने ठुमरी, भजन, भक्ति गीत और फिल्मी गाने भी गाए।

जानी-मानी संगीतकार होने के अलावा अमोनकर एक लोकप्रिय वक्ता भी थीं। उन्होंने समूचे भारत की यात्रा करके व्याख्यान दिया। उन्होंने संगीत में रस सिद्धांत पर सबसे प्रमुख व्याख्यान दिया। कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें 1987 में पद्म भूषण और 2002 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। 2010 में वे संगीत नाटक अकादमी की फेलो बनीं।
कालिका प्रसाद भट्टाचार्य : 7 मार्च 2017
बंगाली लोक संगीत गायक कालिका प्रसाद भट्टाचार्य का 7 मार्च 2017 को सड़क दुर्घटना में निधन हो गया। घटना पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले के पलसित में हुई। वे 56 वर्ष के थे। दक्षिण कोलकाता के निवासी भट्टाचार्य बर्धमान जिले में एक स्कूल समारोह में हिस्सा लेने जा रहे थे जब यह हादसा हुआ।

'दोहर' के अलावा उन्होंने 'जत्तीश्वर' (2014), 'मोनर मानूष' (2010) और 'बहुबन माझी' (2017) जैसी फिल्मों में भी गीत गाए हैं।

ओमपुरी : 6 जनवरी 2017
बेहतरीन फिल्म अभिनेता ओमपुरी का 6 जनवरी 2017 को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। अपनी शानदार अदायगी से राष्ट्रीय औ


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