वेब पत्रकारिता ने दी मेरी कल्पनाओं को नई उड़ान

Last Updated: शुक्रवार, 19 सितम्बर 2014 (16:54 IST)
-डॉ. अभिज्ञात 
वेब पत्रकारिता का थ्रिल वे महसूस कर सकते हैं, जो अरसे तक प्रिंट मीडिया में कार्यरत रहे हैं। हालांकि वेब पत्रकारिता से जुडऩे की एक महत्वपूर्ण वजह मेरा कोलकाता लौटने की संभावना ही थी और कोलकाता के कारण ही उससे प्रत्यक्ष नाता टूट गया। मैं उन दिनों अमर उजाला, जालंधर में डेस्क पर कार्यरत था और कोलकाता लौटने से लिए एड़ी चोटी का जोर एक किए हुए था। जब मुझे पता चला कि वेबदुनिया का एक ब्यूरो कोलकाता में है तो मुझे कोलकाता वापसी की आशा की किरण दिखाई दी। मैंने तत्कालीन संपादक रवीन्द्र शाह को फोन किया तो उन्होंने बताया कि कोलकाता ब्यूरो में आपको भेजा जा सकता है, लेकिन कुछ दिन इंदौर मुख्यालय में रहकर वेब पत्रकारिता के तौर तरीके व खबरें, फोटो आदि अपलोड करने की तकनीक सीखनी होगी।
 
मैं आनन-फानन में जालंधर से इंदौर की ट्रेन पकड़ ली। मेरा तमाम बोरिया बिस्तर, कपड़े, मेरी साहित्यिक रचनाओं की डायरियां, किताबें, पॉकेट रेडियो और स्कूटर छोड़कर गया था और यह नहीं सोचा था कि अब जालंधर मेरी वापसी नहीं होगी। मेरे रूम पार्टनर सुखविंदर पाल सिंह चड्ढा को छोड़कर और किसी और को पता नहीं था कि इंदौर गया हूं और फिर इंदौर की आबोहवा, वेबदुनिया में कामकाज आत्मीय माहौल मुझे ऐसा रास आया कि मैं कई महीनों के लिए उसी का होकर रह गया। 
 
वेब पत्रकारिता का वह लगभग शुरुआती दौर था। उस समय तहलका पोर्टल नया-नया शुरू हुआ था और उसकी सनसनी से पूरे देश में हंगामा मचा हुआ था। मुझे वेबदुनिया के 23 सिटी चैनलों और ब्यूरो के कामकाज पर निगरानी का प्रभार मिला था और साथ ही मेरी साहित्यिक रुचि को देखते हुए साहित्य चैनल भी सौंपा गया। और सचमुच वेब मीडिया मुझे उन दिनों करिश्माई लगा...न पृष्ठ संख्या की अधिकता बाधक थी न उसके पाठक तक पहुंच में किसी प्रकार का व्यवधान।
 
जन माध्यम का सबसे अधिक सुगम और कारगर माध्यम बेव माध्यम मेरे हाथ लगा था..अब तक मैंने पाया था साहित्यिक लघु पत्रिकाएं अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए कितने कठिन संघर्ष से गुजरती हैं, सीमित प्रतियां ही प्रकाशित हो पाती हैं और उन्हें डाक से पाठकों तक पहुंचाने में आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। कई बार आर्थिक दिक्कतों के कारण प्रकाशन और प्रसार में विलम्ब लेखों को अप्रासंगिक बना देता है। मैंने लघु पत्रिकाओं को वेबदुनिया के साहित्य चैनल में पूरे सम्मान और चाव के साथ उसका हिस्सा बना दिया।
 
लघु पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख, कविता, कहानी वेबदुनिया में साभार प्रकाशित होने लगे, पत्रिकाओं के नए अंकों के मुखपृष्ठों की तस्वीर, पता, विषयसूची भी प्रकाशित किए जाते थे ताकि पाठक पत्रिका डाक से अपने यहां मंगा सकें। यह एक प्रकार से मुफ्त विज्ञापन भी था। इसका लघु-पत्रिकाओं ने जोरदार स्वागत किया और उन्होंने बदले में वेबदुनिया के बड़े-बड़े विज्ञापन नि:शुल्क प्रकाशित करना शुरू किया। इस प्रकार दोतरफे संवाद का एक व्यापक साहित्यिक प्लेटफार्म वेबदुनिया का साहित्य चैनल बन गया था।
 
वेबदुनिया में मेरे पहुंचने से पहले केवल हंस पत्रिका ही वेबदुनिया की बेवसाइट पर थी। अब सैकड़ों पत्रिकाएं शामिल हो गई थीं। हमारे काम की गंभीरता को देखते हुए कई वरिष्ठ साहित्यकारों ने हमें यह आजादी दे दी थी कि हम उनकी समस्त रचनाओं में से जो चाहें अपने यहां प्रकाशित कर लें। वेबदुनिया के पेज व्यू में खासी बढ़ोतरी भी हुई थी। संपादक एवं वेबदुनिया के प्रबंध सम्पादक किशोर भुराडिय़ा का लगातार प्रोत्साहन मिलता रहा और ऐसा पारिवारिक माहौल था कि मैं देर रात तक कार्यालय में ही काम में जुटा रहता था। मेरा ड्यूटी समय केवल काम पर पहुंचने का होता था जाने का नहीं। वेब पत्रकारिता ने मेरी कल्पनाओं को पंख दे दिए थे। कैसे बेहतर प्रस्तुति हो, किन रचनाओं को दिया जाए, किन लेखकों का इंटरव्यू किया जाए, किसकी तस्वीर मंगाई जाए।
 
इधर, और मेरे कोलकाता लौटने की योजना पर पानी फिरता दिख रहा था। मैंने पुन: अपने आपको काम में झोंक दिया था, लेकिन कोलकाता जाने के लिए मन छटपटाता रहता..कोलकाता के उपनगर टीटागढ़ में मेरा घर था..मेरी पत्नी और बच्ची..जिन्हें मेरा इन्तजार था। 
 
इस बीच वेबदुनिया के सीईओ विनय छजलानी ने मुझे लाभगंगा वाले अपने कार्यालय में बुलवाया तो उन्होंने और नई योजनाओं पर काम करने को कहा..उन्हीं के आदेश पर मैं नई दुनिया कार्यालय गया और वहां की समृद्ध लाइब्रेरी में घंटों गुजारे। विनयजी से प्रोत्साहन पाकर मैं कई और नई योजनाएं बनाने में जुट गया। कई प्रमुख साहित्यकारों की समग्र रचनाओं की वेबसाइट पर सीडी में डिजिटल प्रस्तुति, देश के तमाम विश्वविद्यालय के शोधपत्रों को आनलाइन में सहयोग देने की योजना, लाइब्रेरियों के दुर्लभ दस्तावेजों की डिजिटल और ऑनलाइन प्रस्तुति का खाका मैं तैयार करने में जुट गया था। विनय जी ने मुझे नई दुनिया भी ज्वाइन करने का प्रस्ताव दिया था, जिसे मैंने इस डर से अस्वीकार कर दिया कि इससे मेरा कोलकाता लौटना असंभव हो जाएगा। 
 
अन्तत: कोलकाता लौटकर मैंने पाक्षिक पत्रिका उत्सव पूर्वरी में बतौर एसोसिएट एडिटर ज्याइन कर लिया..जिसके बाद दैनिक जागरण, जमशेदपुर होते हुए फिर कोलकाता सन्मार्ग में जम गया..। किशोर जी साहित्यिक अभिरुचि के हैं और एक प्रतिष्ठित साहित्यकार निर्मला भुराडिय़ा के पति हैं इसलिए उनसे मिलने की ललक बराबर बनी रहती है..हंस में मेरी कविताएं छपी थीं तो उन्होंने फोन पर उनकी प्रशंसा की थी जिससे मैं इंदौर व वेबदुनिया के पुराने दिनों में लौट गया था..।
(लेखक सन्मार्ग, कोलकाता में डिप्टी न्यूज एडिटर हैं)

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