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Written By भाषा

महिला आरक्षण : लेखिकाओं की नजर में

महिला आरक्षण विधेयक

Womens Day 2010 | महिला आरक्षण : लेखिकाओं की नजर में
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महिला आरक्षण विधेयक के बारे में हिन्दी की वरिष्ठ लेखिकाओं का मानना है कि यह विधेयक स्त्रियों का वाजिब हक है और इसमें वर्ग विभेद की बात कर रोड़े अटकाना पुरूषों का वर्चस्व कायम रखने की साजिश है।

लेखिका चित्रा मुद्ग
'अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति की महिलाओं को आरक्षण देने के नाम पर बखेड़ा करने वाली राजनीतिक पार्टियाँ समग्र स्त्री समाज के विकास में रोड़ा अटकाने का काम कर रही है।' हर सत्ता में पुरूषों का वर्चस्व कायम है और इसे बरकरार रखने के लिए इस तरह के रोड़े अटकाए जा रहे हैं।

महात्मा गाँधी ने भी कहा था कि महिलाओं को घर से बाहर निकालकर साथ लेकर चलना होगा तभी देश आजादी की लड़ाई बखूबी लड़ सकेगा और अब तो इक्कीसवीं सदी में देश को विकास की डगर पर चलना है।

मुझे इस सारे प्रकरण में राजनीतिक पार्टियों के मतभेद के पीछे सामंती सोच की बू आ रही है। पुरूष महिलाओं को विभिन्न वर्ग में बाँटकर उनकी चेतना पर अंकुश लगाना चाहते है और स्त्री को अपने स्व और अस्मिता की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि कानून बनाना एक बात है और उसका क्रियान्वयन करना अलग बात है। केवल यह विधेयक पारित हो जाने से महिला सशक्तिकरण नहीं होने वाला है और इसके बाद भी महिलाओं को लंबा फासला तय करना होगा। उर्मिला पवार जैसी दलित लेखिका ने लिखा है कि दलित बाहर तो उच्च वर्ग के साथ बराबरी की बात करता है, लेकिन घर में वह खुद अपने घर की स्त्री के साथ काफी खराब व्यवहार करता है।

हमारा सोचना है कि यदि विधेयक पारित होता है तो इसके जरिये संसद में पहुँचने वाली दूरदराज के इलाकों की महिला सदन में ‘आधी आबादी’ का ‘मॉडल’ होगी और वह महिला सशक्तिकरण के लिए कार्य करेगी।'

लेखिका ममता कालिय
महिला आरक्षण विधेयक वक्त की जरूरत है और महिलाओं ने जब खुद को हर क्षेत्र में साबित कर दिया है तो उन्हें आरक्षण देने में कैसी हिचक। लंबे समय से लटकते आ रहे इस विधेयक को पारित करने का यह सही वक्त है और वैसे तो 50 फीसदी आरक्षण होना चाहिए, लेकिन स्त्रियाँ केवल 33 फीसदी ही माँग रही है।

ग्रामीण इलाकों में आज भी स्त्रियों को दरकिनार कर दिया जाता है और महिला आरक्षण विधेयक का असली फायदा दूरदराज के इलाकों में रहने वाली ‘आधी दुनिया’ को मिलेगा।

लेखिका पद्मा सचदे
'सदियों से पुरूष यह मानता आया है कि दुनिया का संचालन वही करता है, जबकि हकीकत यह है कि बिना महिला के एक परिवार भी नहीं चल सकता है। बशीर बद्र का शेर है 'हम तुम दोनों मिलकर पूरे होते हैं। आधी-आधी एक कहानी हम दोनों।' इस दुनिया में हर औरत ने पुरूषों का अत्याचार सहा है और उसका वाजिब हक उसे मिलना ही चाहिए।

पंचायतों और संसद में कम संख्या में महिलाओं के चुने जाने को लेकर दिल में एक हूक सी उठती है। देश के सर्वोच्च पदों में महिलाएँ विभूषित है और हमारी सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री एक महिला ही थी।

पुरूषों की बजाय महिलाएँ अधिक संवेदनशील होती हैं और समस्याओं को बेहतर तरीके से समझ सकती है। महँगाई, बेरोजगारी, अशिक्षा, गरीबी और भुखमरी जैसी समस्याओं से महिलाएँ कारगर तरीके से निपट सकती है।