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नेली सेनगुप्त

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कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन (1933) की अध्यक्ष रहीं कैम्ब्रिज, इंग्लैंड में पैदा हुईं। उन्होंने 1904 में सीनियर कैम्ब्रिज पास की। भारत के राष्ट्रवादी नेता यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त से प्रेम विवाह (1909) के पूर्व वे नेली ग्रे थीं।

नेली कांग्रेस अध्यक्ष पद संभालने वाली तीसरी महिला थीं। उनके पूर्व यह पद ऐनी बेसेंट (1917) और सरोजिनी नायडू (1925) ने सुशोभित किया था। ब्याह के बाद नेली उनके पति के साथ चटगाँव आईं और उनकी सहचरी के रूप में 1921 से स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। उन्होंने पति की जेल यात्राओं के दौरान आमसभाओं को संबोधित किया और जेल गईं। 'नेली के निधन पर अक्टूबर 1973 में प्रधानमंत्री (स्व.) इंदिरा गाँधी ने कहा था, 'इंग्लैंड में जन्म लेने के बावजूद, यह उनकी व्यक्तिगत निष्ठा, भारतीय समाज की सेवा और साहस का ही परिणाम था कि संकट के समय उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष जैसा जिम्मेदारी का पद दिया गया था।'
नेली सेनगुप्त ने 1931 में दिल्ली में अँगरेजों द्वारा गैर कानूनी घोषित सभा में आजादी की माँग के लिए भाषण देने के कारण चार माह की सजा भुगती। तीस के दशक में जब कई कांग्रेसी नायक जेल में थे, तब उन्होंने निर्भीक होकर राष्ट्रपे्रेम का प्रचार किया। 1933 के कोलकाता कांग्रेस के लिए चुने गए अध्यक्ष मालवीयजी जब पकड़े गए तब नेली एकमत से अध्यक्ष चुनी गईं।
प्रशासन की चेतावनी के बाद भी वे आमसभा में बोलीं और पकड़ी गईं। वे कोलकाता कॉर्पोरेशन की एल्डरमैन रहीं। 1940 व 46 में बंगाल लेजिस्लेटिव असेंबली में वे निर्विरोध चुनी गईं। विभाजन के बाद वे पाकिस्तान में रहीं और बाद में उपचार हेतु कोलकाता आईं, जहाँ उनका 1973 में निधन हुआ।

नेली के निधन पर अक्टूबर 1973 में प्रधानमंत्री (स्व.) इंदिरा गाँधी ने कहा था, 'इंग्लैंड में जन्म लेने के बावजूद, यह उनकी व्यक्तिगत निष्ठा, भारतीय समाज की सेवा और साहस का ही परिणाम था कि संकट के समय उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष जैसा जिम्मेदारी का पद दिया गया था।'
'इंग्लैंड में ही यतीन्द्र मोहन की भेंट नेली ग्रे नामक अँगरेज लड़की से हुई। दोनों में स्नेह हो गया। उन्होंने शादी कर ली और श्रीमती नेली सेनगुप्त भी यतीन्द्र के साथ ही हिन्दुस्तान आईं। जात्र मोहन और परिवार के अन्य लोग नेली से संतुष्ट और प्रसन्न रहे।

डॉक्टरों की राय पर वे अपनी पत्नी नेली सेनगुप्त के साथ अक्टूबर 1939 में इंग्लैंड गए। इंग्लैंड में वे अपने ससुराल गए। उनकी सास अपने दामाद व पुत्री को देखकर बहुत प्रसन्न हुईं। उन्हें गर्व भी हुआ कि उनका दामाद भारत का एक राष्ट्रीय स्तर का नेता बन गया है और उनकी पुत्री ने राष्ट्रीय आंदोलन में डटकर हिस्सा लिया है।' देशप्रिय यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त- कुशल शंकर ओझा (भारत के गौरव-नवाँ भाग)

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